अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं राजनीति में व्याप्त तनावों और चिंताओं की पृष्ठभूमि में आयोजित हुई विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के प्रमुखों की बैठक के परिणाम संतुलित रहे हैं.
सम्मेलन में आने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन, जापान, जर्मनी और भारत के संबंध में जो तीखी बातें कही थीं, उससे यह आशंका पैदा होना स्वाभाविक था कि जी-20 के ओसाका शिखर सम्मेलन में अमेरिका और चीन के व्यापार युद्ध अधिक सघन हो सकता है, राष्ट्रपति ट्रंप मेजबान जापान को नाराज कर सकते हैं, जर्मनी और यूरोपीय संघ भला-बुरा कह सकते हैं तथा शुल्कों को लेकर भारत पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं, परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ और ट्रंप भारत, जापान, यूरोपीय देशों आदि जैसे सहयोगियों के प्रति न केवल प्रशंसा से भरे थे, बल्कि वे चीन और रूस जैसे परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों से भी संबंध सामान्य करने के लिए उत्साहित दिखे. उनके तेवर में बदलाव का एक नतीजा यह हुआ है कि आयोजन में शामिल नेताओं के साझा बयान में संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों से जूझने की कोई बात नहीं कही गयी.
उल्लेखनीय है कि ट्रंप प्रशासन नियमों पर आधारित बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार-वाणिज्य तथा मुक्त व्यापार के सिद्धांतों के उलट अमेरिकी हितों के अनुरूप संरक्षणवाद की नीति पर अग्रसर है. ऐसा लगातार दूसरी बार इस बैठक में हुआ है कि खुले बाजार की नीति तथा वैश्विक व्यापार में पारदर्शिता और स्थायित्व पर जोर तो दिया गया है, पर इसे नुकसान पहुंचानेवाले संरक्षणवाद का उल्लेख नहीं किया गया है.
फिलहाल राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन पर आयात शुल्कों में बढ़ोतरी की अपनी नीति को स्थगित कर दिया है. वे रूस से तुर्की के हथियार खरीदने के मसले पर भी नरम दिखे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात में अमेरिकी राष्ट्रपति की सहजता से संकेत मिलता है कि आयात शुल्कों और विशेष व्यापारिक छूट को लेकर जारी तनाव में कुछ शिथिलता आयी है.
भारत की दृष्टि से देखें, तो प्रधानमंत्री की अन्य नेताओं से मुलाकातों और बातचीत के सिलसिले से फिर एक बार यह साबित हुआ है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में हमारे देश की प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी जारी है तथा राष्ट्रीय हितों के साथ वैश्विक शांति व समृद्धि के लिए प्रधानमंत्री मोदी जुटे हुए हैं.
भारत के बढ़ते आत्मविश्वास को कुछ अन्य अहम बातों से भी समझा जा सकता है. भारत-जापान संबंधों की मजबूती और दोनों प्रधानमंत्रियों की नजदीकी के बावजूद भारत ने डिजिटल डेटा के निर्बाध प्रसार के घोषणापत्र पर सहमति नहीं दी, जो प्रधानमंत्री शिंजो आबे का प्रयास था और जिसमें अमेरिका और अन्य विकसित देशों की सहमति भी थी. भारत का कहना है कि इस तरह के मसलों के बारे फैसले विश्व व्यापार संगठन में लिये जाने चाहिए.
सूचना तकनीक के अगले चरण 5जी पर भी भारत का ऐसा ही रुख है. इस प्रकार अपनी प्राथमिकताओं के साथ वैश्विक सहयोग बढ़ाने की भारत की नीति सही गति और दिशा के साथ अग्रसर है, जिसके प्रमुख आधार प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व और नये भारत का आत्मविश्वास हैं.
