अंशुमाली रस्तोगी
व्यंग्यकार
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तमाम तरह की समस्याओं के बीच एक समस्या से हम आज भी पार नहीं पा सके हैं, वह है ‘मर्दाना कमजोरी’! जब इस किस्म के इश्तहार दीवारों पर लिखे और अखबारों में छपे देखता हूं, तो महसूस होता है कि मेडिकल साइंस द्वारा इतनी तरक्की करने के बाद भी यह समस्या अब भी जस की तस बनी हुई है.
इश्तहार देखकर लगता है कि मुल्क की आधे से ज्यादा आबादी इसी समस्या से जूझ रही है! गली-कूचों में खुले ‘शर्तिया इलाज’ के दवाखाने और सड़क किनारे लगे ‘बड़ी से बड़ी बीमारी को खत्म करने का अचूक नुस्खा’ टाइप टेंट इस बात का प्रमाण हैं.
इधर, जब से इंटरनेट का असर घर-घर तक हुआ है, तब से तो हर बंदा खुद ही डॉक्टर हो गया है. उसे जो भी, जैसा भी मर्ज हो, वह उसे गूगल पर सर्च कर अपना इलाज खुद ही कर रहा है! बल्कि अपने जाननेवालों को बता भी रहा है कि फलां रोग के लिए फलां नुस्खा बेहतर रहेगा.
अच्छा, मैं अक्सर ही एक बात सोचा करता हूं कि मर्दाना कमजोरी जैसे रोग पुरुष के ही हिस्से सबसे ज्यादा क्यों आये हैं? जबकि पुरुष तो बेहद बलशाली होता है. न केवल स्त्री पर, बल्कि दीन-दुनिया सब पर राज करता है.
मजाल है जो पुरुष का कोई बाल भी बांका कर सके! फिर भी वह ‘मर्दाना कमजोरी’ के आगे हारा हुआ है! लेकिन वह इस कमजोरी को ‘स्वीकार’ नहीं करेगा. ऐसे ‘हारे हुए मर्द’ हमारे आस-पास न जाने कितने हैं, जिनकी एक टांग घर में, तो दूसरी टांग दवाखाने में रहती है. कमजोरी से निजात पाने को जाने क्या-क्या नहीं करते. इस पर कोई सवाल उठा दे, तो उस पर यों भड़क उठते हैं, मानो उसने उनकी दुखती रग पर हाथ धर दिया हो.
मेरे विचार में, मर्द को अब खुद को ‘शक्तिशाली’ कहना-मानना छोड़ ही देना चाहिए! मुझे तो वह स्त्री से कल भी हारा हुआ नजर आता था और आज भी हारा हुआ ही नजर आ रहा है! अगर मैं गलत हूं, तो ये सारे नुस्खे पुरुषों पर ही क्यों लागू होते हैं, स्त्री पर क्यों नहीं? क्या इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए? मैंने ऐसा कम ही सुना है कि किसी स्त्री ने इन दवाखानों के चक्कर लगाये हों. या दीवारों पर उनके लिए कथित इश्तहार देखने में आये हों.
‘मर्दाना कमजोरी’ से लड़ रहा मर्द कैसे दुनिया-समाज को संभाल पायेगा, यह सोचकर ही मैं घबराने लगता हूं. है न कितना अजीब कि एक तरफ दुनिया इतनी तेजी से डिजिटल हुई जा रही है, निरंतर बदल रही है, लेकिन वहीं दूसरी तरफ कुछ मर्द अब भी अपनी मर्दाना कमजोरी का शर्तिया इलाज तंत्र-मंत्र युक्त दवाइयों की पुड़ियों और दीवारों पर चिपके इश्तहारों में खोज रहे हैं.
अभी अखबार में छपे एक विज्ञापन को देख रहा हूं, जो ‘खोई ताकत’ को पाने का राज बता रहा है. ताकत अगर ऐसे ही खोती रही और पुरुष ऐसे ही विज्ञापनों में इसे पाने का हल पाता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब स्त्री को ‘एक ताकतवर पुरुष’ पाने के विज्ञापन अखबारों में छपवाने पड़ेंगे.
