मौजूदा चुनाव में भाषण-कला

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (17 सितंबर, 1950) और कन्हैया कुमार (13 जनवरी, 1987) पर एक साथ कम शब्दों में ही सही, विचार की सचमुच क्या कोई आवश्यकता है? ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में अरस्तू ने ‘दि आर्ट ऑफ रिटोरिक’ पुस्तक लिखी, जिसके दस अध्यायों में अलंकार शास्त्र, वाक्पटुता, वक्तृता और […]

रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

ravibhushan1408@gmail.com

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (17 सितंबर, 1950) और कन्हैया कुमार (13 जनवरी, 1987) पर एक साथ कम शब्दों में ही सही, विचार की सचमुच क्या कोई आवश्यकता है?

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में अरस्तू ने ‘दि आर्ट ऑफ रिटोरिक’ पुस्तक लिखी, जिसके दस अध्यायों में अलंकार शास्त्र, वाक्पटुता, वक्तृता और वाग्मिता पर विचार किया गया है. नरेंद्र मोदी की वक्तृता से प्रभावित प्रबुद्ध जनों को एक बार यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए. गुजराती भाषी होने के बाद भी उनकी हिंदी वक्तृता का आज कोई दूसरा उदाहरण नहीं है. अपनी भाषण-कला, जिसमें आंगिक क्रियाएं भी हैं, जो अभिनय के ‘अनिवायर्य पक्ष’ हैं, से वे श्रोताओं में प्रभाव उत्पन्न करते हैं. अपनी भाषा-शैली और नाट्य-शैली के कारण मोदी अधिक ‘पॉपुलर’ हैं. वहीं जेएनयू के छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार को एक प्रमुख वक्ता के रूप में ख्याति प्राप्त है.भाषण-कला में कन्हैया भी मोदी से कम नहीं हैं. मोदी के बाद कन्हैया देश के दूसरे प्रमुख वक्ता हैं.

मोदी और कन्हैया के भाषण में अंतर है. भाषण-कला और वक्तृता में दोनों दक्ष हैं. मोदी दृढ़संकल्पी और आत्मविश्वासी हैं. मोदी का जन्मस्थान वडनगर है. वहीं कन्हैया का जन्मस्थान बेगूसराय है और शिक्षा में वे मोदी से आगे हैं. फरवरी 2019 में कन्हैया ने पीएचडी की डिग्री हासिल की. वक्तृता और भाषण-कला में आज देश में उनके जैसा युवा कोई नहीं है.

उन्हें ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहकर प्रचारित किया गया. जेएनयू नौ फरवरी, 2016 के बाद सुर्खियों में आया. उसके पहले ‘पांचजन्य’ ने जेएनयू पर केंद्रित अंक निकाला था, जिसमें जेएनयू को ‘देश-विरोधी ताकतों का गढ़’ कहा गया था.

कन्हैया कुमार ने पिछले तीन वर्ष में प्रधानमंत्री की नीतियों और उनकी कार्य-पद्धतियों के साथ उनके किये गये वादों की बात कही है. खुली सभाओं में उन्होंने अनेक बार मोदी की कटु आलोचना की है और लोकतंत्र में सवाल पूछने के अधिकार को प्रमुख मानते हुए उनसे कड़े सवाल पूछे हैं.

नौजवान बेकार क्यों हैं? मंदिर-मस्जिद और हिंदू-मुस्लिम की बात क्यों जरूरी है? संसद के सामने संविधान की प्रति क्यों जलायी गयी? क्यों भाजपा के नेता संविधान के स्थान पर ‘मनुस्मृति’ लाना चाहते हैं? दस लाख करोड़ एनपीए क्यों है? एक साल में 12 हजार किसानों ने क्यों आत्महत्या की? प्रधानमंत्री को किसानों की चिंता क्यों नहीं है? क्यों उन्हें कॉरपोरेटों की चिंता है? सब कुछ मोदी की वजह से अच्छा और नेहरू की वजह से बुरा कैसे है? प्रधानमंत्री के वादे कहां गये? मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी क्यों नहीं मिलती?

पब्लिक सेक्टर की कंपनियां क्यों बंद की जा रही हैं? रेलवे के कुछ स्टेशन क्यों बेचे या ठेके पर दिये जा रहे हैं? शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट कम क्यों है? पटेल की मूर्ति बनाने का काम चीनी कंपनी को क्यों दिया गया? मुसलमानों को बाबर और लादेन की सजा क्याें दी जा रही है? मोदी के विचार कि कचरा साफ करने से आध्यात्मिक सुख मिलता है, मनुस्मृति के विचार हैं. पिछले तीन वर्ष से कन्हैया कुमार देश के प्रधानमंत्री से सवाल पर सवाल पूछ रहे हैं. ये तार्किक हैं और सोचने को प्रेरित करते हैं.

प्रधानमंत्री होने के बाद भी नरेंद्र मोदी तार्किक नहीं हैं. उन्होंने अभी तक एक भी प्रेस-कॉन्फ्रेंस नहीं की है. मोदी के यहां ‘मैं’ प्रमुख है. अभी आडवाणी ने अपने ब्लॉग में ‘नेशन फर्स्ट, पार्टी नेक्स्ट और सेल्फ लास्ट’ की बात कही है. मोदी के यहां ‘नेशन’ और ‘पार्टी’ से प्रमुख है ‘सेल्फ’.

उनका अर्थशास्त्र कॉरपोरेट अर्थशास्त्रियों का है. सत्रहवें लोकसभा का चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा जा रहा है. चुनाव में एक व्यक्ति-विशेष महत्वपूर्ण है भाजपा के लिए. व्यक्ति कितना ही बड़ा हो, वह देश का पर्याय नहीं हो सकता. कन्हैया बेगूसराय से भाकपा के प्रत्याशी हैं. वे अपना मुकाबला संविधान विरोधी शक्तियों से मानते हैं. नरेंद्र मोदी कांग्रेस के विरोधी हैं. कन्हैया मोदी और आरएसएस के विरोधी हैं. कन्हैया की चिंता में लोकतंत्र और संविधान की रक्षा है.

वे गरीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों और आदिवासियों के समर्थक हैं. मोदी के यहां इनकी चिंता नहीं है. मोदी में सारी शक्तियां केंद्रित हो चुकी हैं. आज राष्ट्रवाद का ‘रेटोरिक’ है. मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक भारतीय सेना को ‘मोदी की सेना’ कह रहे हैं. प्रधानमंत्री द्वारा आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन पर कांग्रेस ने चुनाव आयोग में शिकायत की है. अभी तक कन्हैया ने आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया है.

मोदी और कन्हैया दोनों एक दिन में कई-कई सभाएं कर रहे हैं. दोनों भाषण-कला में बेजोड़ हैं.

अरविंद केजरीवाल से बड़ी है कन्हैया की वक्तृता. वह कुछ अंशों में मोदी से भी बड़ी है, क्योंकि वे विवेक को जागृत करते हैं, जो मोदी के यहां नहीं है. कन्हैया निर्भीक, साहसी और हिम्मती हैं. वे नफरत के सामने मुहब्बत, तानाशाह के सामने जम्हूरियत और असमानता के सामने समानता को महत्व देते हैं. वे डरने को नहीं, लड़ने को प्रेरित करते हैं. उनकी राजनीति मूल्यों की है. दृष्टि तार्किक और वैज्ञानिक है.

समझ साफ और पैनी है. कन्हैया के भारत और मोदी के भारत में अंतर है. कन्हैया शायद ही वाराणसी जाकर प्रचार करें. और मोदी? क्या मोदी बेगूसराय जाकर कन्हैया के विरोध में और भाजपा प्रत्याशी गिरिराज सिंह के समर्थन में भाषण देंगे?

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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