उकसावे की कार्रवाई से बचे पाकिस्तान

क्या 1965 और 1971 दोहराये जाने के दहलीज तक हम पहुंच चुके हैं? क्या दोनों मुल्कों में तल्खी इतनी बढ़ गयी है कि युद्ध से ही इसका फैसला करना पड़ेगा? क्या पाकिस्तान को कश्मीर से इतना प्यार हो गया है की इसके एवज में शेष चारों प्रांतों के नागरिकों की बलि चढ़ाने को तैयार है? […]

क्या 1965 और 1971 दोहराये जाने के दहलीज तक हम पहुंच चुके हैं? क्या दोनों मुल्कों में तल्खी इतनी बढ़ गयी है कि युद्ध से ही इसका फैसला करना पड़ेगा? क्या पाकिस्तान को कश्मीर से इतना प्यार हो गया है की इसके एवज में शेष चारों प्रांतों के नागरिकों की बलि चढ़ाने को तैयार है?
क्या पाकिस्तान को अपने खस्ताहाल आर्थिक स्थिति पर थोड़ा भी मलाल नहीं है?
क्या पाकिस्तानी सेना को मसूद अजहर, हाफिज सईद एवं सैयद सलाहुद्दीन का शेष विश्व से ज्यादा जरूरत है? आज पाकिस्तान को किसी भी तरह के उकसावे की कार्रवाई से बचना चाहिए, क्योंकि भारत एक बड़ा मुल्क है, वह युद्ध को बर्दाश्त कर लेगा. मगर पाकिस्तान नहीं. युद्ध एवं गृह युद्ध का क्या नतीजा होता है, आज यमन, सीरिया, सूडान, सोमालिया, अफगानिस्तान आदि देशों के भयावह हालात से देखा जा सकता है.
जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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