शुभकामनाओं का सीरियल ऑफर

आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार puranika@gmail.com उस राजनीतिक दल के नेता ने हैप्पी न्यू इयर, मकर संक्रांति, गणतंत्र दिवस और होली तक की शुभकामनाएं एक ही पोस्टर में दे डाली थीं. मैंने निवेदन किया, थोड़ा और आगे बढ़ जाते और स्वतंत्रता दिवस, दशहरा और दीवाली भी इसी पोस्टर में निबटा देते. नेताजी ने बताया कि आगे […]

आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
उस राजनीतिक दल के नेता ने हैप्पी न्यू इयर, मकर संक्रांति, गणतंत्र दिवस और होली तक की शुभकामनाएं एक ही पोस्टर में दे डाली थीं. मैंने निवेदन किया, थोड़ा और आगे बढ़ जाते और स्वतंत्रता दिवस, दशहरा और दीवाली भी इसी पोस्टर में निबटा देते.
नेताजी ने बताया कि आगे की शुभकामनाएं मई, 2019 के बाद देखी जायेंगी. मई, 2019 के बाद क्यों? क्योंकि इसके बाद तय हो जायेगा कि जनता ने उन्हें लोकसभा चुनावों में जिताया है या हराया है. नेताजी अगर जीत गये, तो जनता के शुभकामी बने रहेंगे, वरना काहे को दें शुभकामनाएं फोकट में. फोकट में कोई गाली नहीं देता, शुभकामनाएं क्यों दे!
बात में दम है. शुभकामनाएं एक्सचेंज ऑफर के तहत दी जाती हैं, राजनीतिक शुभकामनाएं तो खालिस एक्सचेंज ऑफर होती हैं. जीतोच्छुक नेता वैसे अल्प-ज्ञात त्योहार भी निकाल लाता है, जिन्हें मनानेवाले उसे वोट दे सकते हैं. चंपा षष्ठी और सुभद्रा पूर्णिमा की बधाई भी जनता को दे सकता है.
विरंगल उत्सवम् और वराह जयंती की शुभकामनाएं भी दे सकता है. अगर वोट न मिलने हों, तो वह होली-दीवाली तक को भूल सकता है. नेता शुभकामनाओं का निवेश करता है पोस्टरों में, बैनरों में, उसे वोटों का रिटर्न चाहिए होता है. मेरे मुहल्ले के एक नवोदित नेता हैप्पी न्यू इयर से लेकर क्रिसमस तक सबकी शुभकामनाओं वाले पोस्टर लगवाते थे मुहल्ले में. चुनाव हार गये, अब सिर्फ अपनी शराब की दुकान पर बैठते हैं.
एक शराबी ने उनसे कहा- भईया, पब्लिक बहुत बेवफा टाइप है. आपने इतनी शुभकामनाएं दीं, कुछ न मिला आपको. आप एक एक पऊआ शराबियों को बांट देते, तो कसम से हर शराबी आपको वोट देता.
दुकानदार नेताजी ने कुछ कहा नहीं, पर सच यह था कि पऊआ बांटने में रकम लगती है, शुभकामनाएं बांटने में कुछ न लगता. एक दिन मुझे तमाम सड़कों पर पोस्टर दिखायी दिये, जिसमें एक दल के राजनेता को उस दल के प्रबुद्ध प्रकोष्ठ के उप महासचिव चुने जाने की बधाई दी गयी थी.
बधाई क्षेत्र की जनता की ओर से दी गयी थी. मैं भी उसी क्षेत्र की जनता में शामिल हूं, पर मुझे पता ही न चला कि मेरी तरफ से किसी ने किसी को बधाई दे दी है. मैं न उन नेता को जानता, न प्रबुद्ध प्रकोष्ठ को जानता. पर, मेरी तरफ से बधाई जा चुकी थी. जनता का यही हाल होता है, जब तक उसे कुछ पता चल पाता है, उसका सब कुछ जा चुका होता है. जिस नेता को मैं पिछले चुनाव में वोट देकर आया था, वह बाद में बहुत बड़ा भू-माफिया निकला, पर जब तक यह पता चला, तब तक वोट जा चुका था.
अगली बार वह नेता किसी और क्षेत्र से चुनाव लड़ लेगा. मेरे जानने या न जानने से नेताजी को कुछ न फर्क पड़ता. अप्रैल-मई, 2019 के चुनावों के बाद कई नेता पब्लिक के शुभचिंतक न रहेंगे, हालांकि वे अब भी शुभचिंतक हैं, इसमें भी शक किया जा सकता है.

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