उत्तरप्रदेश की राजनीति ने एक बार फिर नाटकीय करवट ली है. पिछले कई वर्षों से एक दूसरे के राजनीतिक दुश्मन सपा और बसपा ने एक बार फिर हाथ मिला लिया है.
25 वर्ष बाद अगर दोनों पार्टियां फिर एक मंच पर हैं, तो इसके अलग मायने और मकसद हैं. पिछले विधानसभा चुनावों से सीख लेते हुए सपा ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से दूर रहना ही बेहतर माना है. राजनीतिक पंडित अनुमान लगा रहे हैं कि अगर 2014 का वोट पैटर्न दोहराया गया, तो भाजपा के वोट प्रतिशत कम रह सकते हैं.
गठबंधन चाहे भाजपा की अगुआई में बने या कांग्रेस की या फिर अन्य की, केवल गठबंधन बन जाने से चुनाव परिणाम का फैसला नहीं हो सकता. गठबंधन एक विशेष मुद्दे पर बनना चाहिए और उसमें शामिल पार्टियों के मुद्दे भी समान होने चाहिए. भले ही सपा-बसपा ने भाजपा के साथ कांग्रेस को भी निशाने पर लिया हो, लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी का ख्याल रखना यह नहीं कहता कि इन दोनों दलों से समान दूरी बनाये रखी जायेगी.
अमन सिंह, बरेली, उत्तर प्रदेश
