डेटा सुरक्षा महत्वपूर्ण

पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार करार दिये जाने के बाद सरकार के सामने नागरिकों के निजी डेटा की हिफाजत की जिम्मेदारी आ खड़ी हुई. पहली बार सरकार इंटरनेटी युग में डेटा के प्रबंधन और उसके आदान-प्रदान के सवालों पर संजीदगी से सोचने को बाध्य हुई, अन्यथा आधार विधेयक को […]

पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार करार दिये जाने के बाद सरकार के सामने नागरिकों के निजी डेटा की हिफाजत की जिम्मेदारी आ खड़ी हुई. पहली बार सरकार इंटरनेटी युग में डेटा के प्रबंधन और उसके आदान-प्रदान के सवालों पर संजीदगी से सोचने को बाध्य हुई, अन्यथा आधार विधेयक को लोकसभा में पेश करते वक्त उसका तर्क था कि निजता का हक ऐसा नहीं कि उस पर वैधानिक तरीके से पाबंदियां न लगायी जा सकें.
डेटा की निगरानी और अंकुश का वैधानिक ढांचा खड़ा करने की जिम्मेदारी के मद्देनजर बनी न्यायाधीश बीएन श्रीकृष्ण समिति ने अपनी सिफारिशें तथा प्रस्तावित विधेयक का मसौदा सरकार को दे दिया है. मसौदे की सबसे अच्छी बात यह है कि उसमें व्यक्तिगत निजता की सुरक्षा सर्वप्रमुख मानते हुए ही डेटा के सृजन, संग्रह, भंडारण, सत्यापन और विनियम की व्यवस्था है. यह उलझन अब नहीं रही है कि निजी डेटा का व्यावसायिक इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है और किन स्थितियों में इसे गैरकानूनी माना जायेगा तथा इस बाबत शिकायत, सुनवाई और दंड या जुर्माने की व्यवस्था क्या होगी.
मसौदे में साफ कहा गया है कि यदि किसी सरकार, कंपनी, नागरिक या संस्था का जुड़ाव डेटा के प्रबंधन से है, तो उसे यह काम ‘न्यायसंगत’ और ‘उचित-अनुचित के विवेक’ के साथ करना होगा, ताकि व्यक्ति की निजता सुरक्षित रहे. यह भी कहा गया है कि उतनी ही सूचनाएं एकत्र की जाएं, जितनी किसी वैधानिक उद्देश्य के लिए जरूरी हों, इसकी पूरी जानकारी उक्त व्यक्ति को दी जाये तथा कुछ अपवादों को छोड़कर बाकी मामलों में अनुमति से ही डेटा संग्रह हो. बेशक, इस समिति ने व्यक्ति की निजता की चिंता करते हुए विधान बनाने की दिशा में एक बुनियादी काम किया है, परंतु विशेषज्ञों ने विधेयक के मसौदे की अनेक गंभीर कमियों की तरफ भी संकेत किया है.
दूरसंचार नियामक प्राधिकरण की सिफारिश थी कि अपने डेटा पर मालिकाना हक व्यक्ति का हो और बाकी हरेक को उस डेटा का संरक्षक माना जाना चाहिए. प्रस्ताव में मिल्कियत पर विचार नहीं किया गया है. यह भी स्पष्ट नहीं है कि किसी खास उद्देश्य के लिए एकत्र डेटा का इस्तेमाल हो जाये और अन्य उद्देश्यों के लिए उसकी जरूरत न हो, तो उस डेटा का क्या किया जाना चाहिए. मसौदे में डेटा को मिटाने की बात नहीं है, चाहे व्यक्ति रजामंद हो या नहीं. अगर डेटा में किसी तरह की सेंधमारी होती है, तो कायदे से इसकी सूचना पहले संबंधित व्यक्ति को दी जानी चाहिए.
प्रस्तावित विधेयक में इस संबंध में सूचना देने और कानूनी कार्रवाई करने का हक नियामक प्राधिकरण को दिया गया है. स्थानीय स्तर पर डेटा भंडारण और कानून के उल्लंघन की स्थिति में जुर्माने की रकम कम होने पर भी जानकारों ने सवाल उठाये हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार विधेयक को अंतिम रूप देने से पहले सवालों और आशंकाओं पर पूरा ध्यान देगी.

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