II भूपेंद्र यादव II
राज्यसभा सदस्य
राष्ट्रीय महासचिव, भाजपा
bhupenderyadav69@gmail.com
उच्चतम न्यायालय का एससी/एसटी एक्ट पर निर्णय आने के बाद देश में एक प्रकार की तनाव की स्थिति पैदा हो गयी है. कुछ दिनों से न्यायपालिका के निर्णय अनेकानेक कारणों से चर्चा का विषय बन रहे हैं.
प्रत्येक केस की स्थिति भिन्न होती है, उनके तथ्य, प्रकरण आदि भी भिन्न होते हैं, ऐसे में कानूनी तौर पर विशेष ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि चाहे कोई भी मामला हो, संबंधित कानूनी प्रक्रिया का सम्यक प्रकार से पालन हुआ है या नहीं. किसी एक घटना या मामले को आधार मानकर एक ऐतिहासिक सामाजिक विषय को एक आदेश द्वारा निरस्त कर देना न्यायपूर्ण निर्णय की कसौटी पर सही सिद्ध नहीं होता.
जिनको भी देश की संवैधानिक शक्तियों पर विश्वास है, वे उन तथ्यों को भली-भांति जानते हैं और समाज-हित में संवैधानिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार को नैतिक दायित्व मानते हैं.
यह राजनीतिक स्वार्थ का विषय नहीं है, यह हमारी आंतरिक शांति व सुरक्षा का विषय है, परंतु दुर्भाग्य से राजनीतिक विरोध इतना नकारात्मक हो चुका है कि संवैधानिक संस्थाओं से जुड़ा प्रत्येक मुद्दा, जिस पर कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है, उसे नजरअंदाज कर किसी भी मुद्दे को सामाजिक तनाव के रूप में परिणत करके सरकार पर थोपने की विपक्ष द्वारा नकारात्मक राजनीति निंदनीय है. न्यायपालिका का निर्णय उसका अपना स्वतंत्र निर्णय है, जिस पर निश्चित रूप से सरकार द्वारा यथासंभव कार्यवाही की जा रही है.
जब जेएनयू में देश-विरोधी नारे लगे, तब जरूरत थी कि विपक्ष के नेता छात्रों को यह समझाते कि देश के हित में नारे लगाने चाहिए, लेकिन वे देश-विरोधी नारे लगने को ही सरकार की विफलता के रूप में प्रचारित करने लगे.
ऐसे ही, गत वर्षों में जब कुछ लेखकों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया, तब विपक्ष को सकारात्मक भूमिका निभाते हुए आगे आकर कहना चाहिए था कि यह एक साझी संस्कृति का देश है, परंतु विपक्ष ने उसे भी सामाजिक तनाव का विषय बना दिया. इतने बड़े देश में हम एक बड़ी सांस्कृतिक परंपरा को लेकर चल रहे हैं.
हमारे देश में संस्कृति का जो इतिहास लिखा गया है, उनमें किसी भी व्यक्ति के जीवन के अच्छे-बुरे दोनो पक्षों की चर्चा की गयी है, क्योंकि दोनों के जीवन में स्वाभाविक रूप से चयन के अवसर रहते हैं, परंतु मनुष्य अपनी गरिमा अनुकूल चुनाव कर चरित्र बनाता है. ऐसे में, अगर केवल अच्छे पक्ष को ही जीवन का एकांतिक सत्य मान लेते हैं, तो यह भी अनुचित है और बुरे पक्ष को ही पकड़कर बैठ जाते हैं, तो यह भी उचित नहीं कहा जा सकता. समय, काल और परिस्थिति के हिसाब से इतिहास में घटनेवाली घटनाओं से हमें आनेवाले समय का आकलन करना होगा. मूल्यों का चुनाव करना होगा.
अब यहां प्रश्न उठता है कि आनेवाला समय क्या होगा?
आनेवाला समय भारत में एक ऐसा समय होना चाहिए, जिसमें हम नवीन प्रौद्योगिकी और तकनीक के साथ अपने सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर आगे बढ़ें. हम बहुत से मामलों में दुनिया की नकल करते जा रहे हैं, परंतु हमारे सांस्कृतिक मूल्य आज वैश्विक मांग बन रहे हैं.
दुनिया भारत को देखने के लिए आती है, तो वह इसलिए नहीं आती कि भारत ने कोई बहुत बड़ी भौतिक तरक्की कर ली है, बल्कि भारत के पास जो एक सांस्कृतिक जीवनधारा है, वह दुनिया को अपनी ओर खींचती है और वैचारिक रूप से प्रभावित करती है. हमने सदियों से उदार समरस जीवन को जीया है स्वार्थ, हिंसा, प्रलोभन के षड्यंत्र हुए हैं, परंतु वे स्वीकार्य मूल्य नहीं रहे.
आज हमारी स्वस्थ परंपरा के विषय हमारे विश्वविद्यालयों से गायब होते जा रहे हैं. मानविकी विषयों का महत्व हम प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्रों में समाप्त करते जा रहे हैं. जबकि मानविकी मानवीय उत्कृष्टता को प्राप्त करने की विधा है. जीवन की सहजता और सरलता को हम खोते जा रहे हैं. आज की जो सबसे बड़ी समस्या है, वह तरक्की की नहीं, साधनों के समान बंटवारे की है. केंद्र की सरकार ने अपने चार साल के शासन में इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि साधनों का बंटवारा अंतिम व्यक्ति तक समान रूप से हो. प्रत्येक व्यक्ति तक जीवन की न्यूनतम सुविधाएं पहुंच जायें.
बिजली के लिए सौभाग्य योजना हो, चिकित्सा के लिए इंद्रधनुष योजना हो, आर्थिक सशक्तिकरण के लिए जनधन योजना हो, भ्रष्टाचार न हो इसके लिए आधार योजना हो, साधनों के समान वितरण हेतु ऐसी ही बहुत सी नीतियों और योजनाएं इस सरकार द्वारा लागू की गयी है. अनेक कर के बजाय एक कर हो, इसके लिए जीएसटी लाया गया. लेकिन, कभी भी इन विषयों पर विपक्ष की तरफ से कोई तार्किक उत्तर या चर्चा नहीं की गयी है. विपक्ष द्वारा उन्हीं विषयों को मुद्दा बनाया गया, जो भावनात्मक रूप से समाज में तनाव पैदा करते हों.
यही कारण है कि पिछले चार साल से कांग्रेस लगभग हर चुनाव हारी है. देश में नकारात्मक तथा अलोकतांत्रिक दुष्प्रचार न हो, इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान दिवस प्रत्येक वर्ष मनाने का निर्णय लिया. यदि देश में संविधान के प्रावधानों के प्रति वास्तविक जानकारी का विस्तार हो जाये, तो अफवाहों से तनाव बढ़ने की घटनाओं पर स्वतः रोक लग जायेगी. आश्चर्य है कि लगातार हारनेवाले राहुल गांधी आज कांग्रेस के सेनापति बन गये हैं.
जिस व्यक्ति की तीन पीढ़ियां गणतंत्र दिवस परेड की साक्षी हों, वह एनसीसी नहीं जानता. राहुल गांधी की यह जानकारी दर्शाती है कि वे भारत, भारतीय युवा और सेना के प्रति कितने गंभीर हैं. कांग्रेस सांकेतिक उपवास को भी तीन-चार घंटे का ही मानती है. उनके प्रमुख नेता सुबह से शाम तक भी राजघाट पर किसी प्रकार का संयम या स्वनियंत्रण नहीं दिखा पाये और पेट पूजा के बाद उपवास करनेवाले उपवास की परिभाषा ही बदल रहे हैं.
हम उपवास करने या न करने पर अपनी राय रख सकते हैं, परंतु दो समय के भोजन समय में अंतराल लेना तो उपवास नहीं कहा जायेगा. कांग्रेस की यदि यही नीति है, तो यह उसे ही मुबारक! देश कांग्रेस की इन कुरीतियों से बहुत आगे बढ़ चुका है और देश में सबको साथ लेकर आगे बढ़ना चाहिए.
इस देश की संसद सब विषयों का सही तरीके से सकारात्मक जवाब दे सकती है, लेकिन दुर्भाग्यवश विपक्ष उसको भी नहीं चलने दे रहा है. संसद चले, विषयों पर चर्चा हो और अपनी ऐतिहासिक सामाजिक विरासत को हम आगे बढ़ायें, यही देश की अपेक्षा है.
