जब क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की लूटी थी तिजोरी, 30 मिनट में हिला दिया था ब्रिटिश साम्राज्य

9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने काकोरी स्टेशन पर ट्रेन रोककर सरकारी खजाना लूटा. यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी.

Kakori Train Action: 9 अगस्त भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उस साहस, रणनीति और बलिदान की याद है जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी. आज से 101 साल पहले, 9 अगस्त 1925 की रात कुछ ऐसा हुआ, जिसने अंग्रेजी शासन को यह एहसास करा दिया कि भारत के क्रांतिकारी अब केवल भाषण या विरोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सीधे साम्राज्य की आर्थिक नस पर वार करने की क्षमता रखते हैं.

यह घटना इतिहास में 'काकोरी ट्रेन एक्शन' के नाम से दर्ज है. इसे अक्सर काकोरी ट्रेन डकैती कहा जाता है, लेकिन क्रांतिकारियों के लिए यह कोई डकैती नहीं थी. उनका मानना था कि वे जनता से वसूले गए उसी धन को वापस ले रहे थे, जिसका इस्तेमाल अंग्रेज भारतीयों को गुलाम बनाए रखने के लिए कर रहे थे.

एक सपना, एक संगठन और आजादी के लिए पैसों की जरूरत

1920 के दशक में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की तैयारी कर रहा था. संगठन के पास जोश था, युवा थे, लेकिन हथियार खरीदने और नेटवर्क चलाने के लिए धन नहीं था.

धन जमा करने के लिए रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आज़ाद, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, सचिंद्रनाथ बख्शी समेत कई साथियों ने फैसला किया कि अंग्रेजों के सरकारी खजाने को निशाना बनाया जाएगा. इसके लिए एक योजना बनाई गई. योजना बेहद गोपनीय थी और लक्ष्य था, सरकारी खजाना, आम जनता नहीं.

9 अगस्त 1925 की रात बदल गया इतिहास

सहारनपुर से लखनऊ जा रही 8-डाउन पैसेंजर ट्रेन जब लखनऊ से पहले काकोरी स्टेशन के पास पहुंची, तभी चेन खींचकर ट्रेन रोक दी गई. डिब्बों में बैठे यात्रियों को लगा कि शायद कोई सामान्य घटना हुई है. लेकिन अगले ही पल एक बुलंद आवाज गूंजी "घबराइए मत... शांत बैठिए. हम सरकार का वह पैसा लेने आए हैं जो हमारा है." यह आवाज थी रामप्रसाद बिस्मिल की.

सिर्फ सरकारी खजाना, यात्रियों का एक रुपया भी नहीं लिया

क्रांतिकारी सीधे गार्ड के डिब्बे की ओर बढ़े, क्योंकि वहीं सरकारी राजस्व का लोहे का संदूक रखा था. फिर लोहे का भारी संदूक नीचे उतारा गया. उसे तोड़ने में कुछ समय लगा. अंततः संदूक खुला और उसमें रखी सरकारी नकदी को चादर में बांध लिया गया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि किसी यात्री से न पैसा छीना गया और न किसी को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया गया.

एक ऐसी गलती, जिसका अफसोस जीवनभर रहा

ऑपरेशन लगभग सफलतापूर्वक पूरा हो चुका था. इसी दौरान एक यात्री अहमद अली अचानक बीच में आ गए. अफरा-तफरी में चली एक गोली उन्हें लग गई. गोली युवा क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त की पिस्तौल से चली थी. अहमद अली की मौत इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी और दुखद घटना बनी. बाद में कई क्रांतिकारियों ने इसे अनचाही त्रासदी बताया.

अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती

करीब आधे घंटे में पूरा अभियान समाप्त हो गया. क्रांतिकारी सरकारी धन लेकर अलग-अलग रास्तों से निकल गए. बताया जाता है कि बाद में यह धन संगठन के काम और हथियार खरीदने की योजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जाना था.

इस अभियान ने अंग्रेजों को पहली बार यह महसूस कराया कि भारतीय क्रांतिकारी अब उनके प्रशासनिक और आर्थिक ढांचे को सीधे चुनौती दे रहे हैं.

ब्रिटिश सरकार ने छेड़ दिया सबसे बड़ा अभियान

घटना के अगले ही दिन पूरे उत्तर भारत में हड़कंप मच गया. सीआईडी, पुलिस और खुफिया एजेंसियों को सक्रिय कर दिया गया. करीब 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया. कई महीनों तक जांच चली. अंग्रेजों ने सरकारी गवाह बनाए और क्रांतिकारी नेटवर्क को तोड़ने की हर संभव कोशिश की. हालांकि चंद्रशेखर आजाद पुलिस की पकड़ में कभी नहीं आए.


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18 महीने तक चला मुकदमा

काकोरी षड्यंत्र केस ब्रिटिश भारत के सबसे चर्चित मुकदमों में से एक बन गया. देशभर के अखबार इस पर नजर रखे हुए थे. मुकदमे के दौरान क्रांतिकारियों ने अदालत को भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपने विचार रखने का मंच बना दिया.

फांसी की सजा... लेकिन झुके नहीं क्रांतिकारी

6 अप्रैल 1927 को काकोरी षड्यंत्र मामले में अदालत ने फैसला सुनाया. जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई. सचिंद्रनाथ सान्याल को आजीवन कारावास (ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ) और मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष के कठोर कारावास की सजा मिली. उस समय फरार चल रहे अशफाक उल्ला खान बाद में गिरफ्तार हुए और अलग मुकदमे में उन्हें भी फांसी की सजा सुनाई गई.

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देशभर में उठा विरोध का तूफान

फांसी की सजा के खिलाफ पूरे देश में प्रदर्शन हुए. उस समय के कई बड़े नेताओं मदन मोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय और मोहम्मद अली जिन्ना ने भी दया याचिका या सजा कम करने की मांग का समर्थन किया. लेकिन ब्रिटिश सरकार नहीं झुकी.

17 और 19 दिसंबर 1927, जब भारत ने अपने सपूत खो दिए

17 दिसंबर 1927 को राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को तय तारीख से पहले गोंडा जेल में फांसी दे दी गई. 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में रामप्रसाद बिस्मिल, फैजाबाद जेल में अशफाक उल्ला खान, इलाहाबाद (नैनी) जेल में ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दे दी गई. लेकिन फांसी के समय भी इन क्रांतिकारियों के चेहरे पर भय नहीं, बल्कि मातृभूमि के लिए गर्व था.

क्यों ऐतिहासिक है काकोरी ट्रेन एक्शन?

काकोरी की घटना केवल सरकारी खजाना लूटने की कहानी नहीं थी. यह एक राजनीतिक संदेश था कि भारत के क्रांतिकारी अंग्रेजी शासन की आर्थिक व्यवस्था को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं. इस घटना के बाद क्रांतिकारी आंदोलन को पूरे देश में नई पहचान मिली. आगे चलकर यही आंदोलन भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और अन्य युवाओं के लिए प्रेरणा बना.

इस घटना से जुड़ी और अधिक जानकारी के लिए आप भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार और नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया विजिट कर सकते हैं.


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लेखक के बारे में

By दीपक कुमार गुप्ता

दीपक कुमार गुप्ता 'प्रभात खबर डिजिटल' में कंटेंट राइटर हैं. इससे पहले वे 'ईटीवी भारत' में करीब ढाई साल तक कार्यरत रहे. उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. 2021 से वे पत्रकारिता से जुड़े हैं और इस दौरान 'न्यूज प्लस', 'अंतर्कथा विजन न्यूज' और 'पब्लिक ऐप' के साथ भी काम कर चुके हैं.

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