विश्व बैंक में नौकरी पाने के लिए DU के इस 23 साल के युवक ने 'तरद्दु्दों' किया सामना, क्या आप जानते हैं?

जब आइवी लीग के स्नातक वत्सल नाहटा ने विश्व बैंक में नौकरी पाने की पूरी कहानी सोशल मीडिया पर शेयर किया, तो उसे कम से कम 15 हजार से अधिक लोगों ने लाइक किया. इसके अलावा, सैकड़ों लोगों ने उसकी तरद्दु्द को शेयर भी किया.

नई दिल्ली : दिल्ली यूनिवर्सिटी का श्रीराम कॉलेज काफी फेमस है, मगर फेमस रहने से क्या होता है. मेहनत कभी बेकार नहीं जाती और सफलता का कोई आसान रास्ता नहीं होता. मगर, आइवी लीग (Ivy League) से स्नातक वत्सल नाहटा ने इसे सही साबित किया. श्रीराम कॉलेज के अर्थशास्त्र का छात्र और येल विश्वविद्यालय के स्नातक वत्सल नाहटा ने विश्व बैंक की नौकरी काफी तरद्दु्दों (काफी कठिनाइयों या मुश्किलों) से पाई है. वत्सल नाहटा विश्व बैंक में नौकरी पाने के सपने को साकार करने के लिए काफी प्रयास करता रहा. मीडिया की रिपोर्ट्स की मानें, तो उसने तकरीबन 600 ईमेल भेजे होंगे और इसके बाद 80 से अधिक इंटरनेशनल फोन कॉल्स किए होंगे, तब उसे यह सफलता हाथ लगी. इंटरनेशनल कॉल करने पर लोगों को काफी पैसों का भुगतान करना होता है और एक छात्र के लिए पॉकेट मनी पर यह सब कर पाना इतना आसान नहीं है.

क्या है तरद्दुदों की कहानी

मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार, जब आइवी लीग के स्नातक वत्सल नाहटा ने विश्व बैंक में नौकरी पाने की पूरी कहानी सोशल मीडिया पर शेयर किया, तो उसे कम से कम 15 हजार से अधिक लोगों ने लाइक किया. इसके अलावा, सैकड़ों लोगों ने उसकी तरद्दु्द को शेयर भी किया. बता दें कि वत्सल नाहटा का विश्व बैंक में नौकरी पाने का सफर कोरोना के पहले वर्ष 2020 में शुरू हुआ, जब पूरी दुनिया में करोड़ों लोग कोविड-19 के जानलेवा वायरस के संक्रमण के शिकार हुए पड़े थे. लाखों लोगों की मौत हो गई थी और पता नहीं कितने घर उजड़ गए थे. उसी समय वत्सल नाहटा आइवी स्नातक के एक छात्र के तौर पर विश्व बैंक में नौकरी पाने के लिए तरद्दुदों को अपने सिर पर उठा लिया.

मैं क्या था और अब क्या हूं

विश्व बैंक में अपनी नौकरी पाने के सफर को साझा करते हुए वत्सल नाहटा ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि जिस समय कोरोना महामारी के दौरान दुनिया भर कंपनियां अपने कर्मचारियों की छंटनी कर रही थीं और लॉकडाउन की वजह से आर्थिक गतिविधियां ठप हो गई थीं, उस विषम परिस्थति में वे विश्व बैंक में नौकरी पाने की तैयारी कर रहे थे. नाहटा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि जब मैं आइवी स्नातक में पढ़ाई कर रहा था, तब मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी और दो महीने में मेरा कोर्स समाप्त होने वाला था. मैं येल यूनिवर्सिटी का छात्र था. मैं फिर विचार किया कि मैं क्या था और अब क्या हूं.

जॉब पोर्टल पर नौकरी मांगने में दिखाई होशियारी

नाहटा ने अपने तरद्दुदों को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा कि जब मेरे पास येल यूनिवर्सिटी की पढ़ाई खत्म होने के बाद केवल दो महीने का वक्त बचा था, तब मेरे माता-पिता ने फोन किया, लेकिन मैं उस समय मेरे मुंह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी. मेरी घिग्घी पूरी तरह से बंध गई. मैं उनसे कैसे बात कर रहा था, ये खुद मुझे ही पता नहीं. इसके बावजूद मुझे पूरा यकीन था कि मैं भारत वापस नहीं जाऊंगा और जब कभी भी मैं नौकरी करूंगा, तो मेरा वेतन डॉलरों में होगा. उन्होंने लिखा कि मैं सोशल नेटवर्किंग साइट और जॉब पोर्टल पर नौकरी मांगने से बचता रहा. पूरी तरह से जोखिम उठाया.

1500 से ज्यादा आवेदन और 600 से अधिक मेल

नाहटा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उसने दो महीनों में तकरीबन 1500 से ज्यादा आवेदन, 600 से अधिक मेल और 80 से अधिक इंटरनेशनल फोन कॉल्स किए. बावजूद इसके उसे कोई सफलता नहीं मिली. उन्होंने यह भी कहा कि 2010 की फिल्म ‘द सोशल नेटवर्क’ का ‘द जेंटल हम ऑफ एंग्जाइटी’ यूट्यूब पर उनका सबसे ज्यादा बजने वाला गाना बन गया. आखिरकार, मैंने अपनी रणनीति के तहत कई दरवाजे खटखटाए. मैंने मई के पहले सप्ताह तक 4 नौकरी की पेशकश की और विश्व बैंक को चुना. वे मेरे ऑप्ट के बाद मेरे वीजा को प्रायोजित करने के लिए तैयार थे और मेरे प्रबंधक ने मुझे पेशकश की विश्व बैंक के वर्तमान अनुसंधान निदेशक के तौर पर एक पद खाली है, जिसकी उम्र सीमा 23 साल है.

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तरद्दुदों से हार मत मानो

दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) से अर्थशास्त्र में स्नातक ने कहा कि कठिन दौर ने उन्हें कुछ चीजें सिखाईं. नेटवर्किंग की शक्ति जो उनका दूसरा स्वभाव बन गया, विश्वास है कि मैं किसी भी स्थिति में जीवित रह सकता हूं और यह महसूस करना कि आइवी लीग की डिग्री उसे इतनी दूर तक ले जा सकता था. नाहटा ने कहा कि अपने अनुभव को दुनिया के साथ साझा करने का उद्देश्य लोगों को जागरूक करना है.

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लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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