भारत से आयात की जाने वाली कई वस्तुओं पर अमेरिका द्वारा जबरदस्त टैरिफ लगाये जाने के बावजूद वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़े बता रहे हैं कि इस वर्ष अगस्त में भारत का अमेरिका को निर्यात बढ़ा. बीते वर्ष की इसी अवधि की तुलना में यह 6.7 फीसदी बढ़कर 35.1 अरब डॉलर हो गया. भारी टैरिफ के बावजूद भारत का अमेरिका के बाजारों में निर्यात बढ़ाना एक उपलब्धि मानी जायेगी.
जब अमेरिका ने रूस के खिलाफ कड़े आर्थिक कदम उठाने की घोषणा की, तो उसके तहत ऊंची शुल्क दर की भी घोषणा की. रूस पर आर्थिक दबाव डालने की कोशिश में अमेरिका ने भारत पर कुल 50 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है. उसका कहना है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है, जिससे वह यूक्रेन से लड़ाई जारी रख पा रहा है. अमेरिका का मानना है कि यदि रूस आर्थिक रूप से पंगु हो जाये, तो वह लड़ाई बंद कर देगा और इसीलिए वह भारत तथा चीन के साथ दबाव की राजनीति कर रहा है. पर भारत भारी टैरिफ के बावजूद पीछे नहीं हट रहा है और रूस से तेल खरीदना कम नहीं कर रहा है. नतीजा, अमेरिका लगातार टैरिफ बढ़ाने की नीति पर काम कर रहा है.
दिलचस्प यह है कि भारत से आयात की जाने वाली कई वस्तुओं पर अमेरिका द्वारा जबरदस्त टैरिफ लगाये जाने के बावजूद वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़े बता रहे हैं कि इस वर्ष अगस्त में भारत का अमेरिका को निर्यात बढ़ा. बीते वर्ष की इसी अवधि की तुलना में यह 6.7 फीसदी बढ़कर 35.1 अरब डॉलर हो गया. भारत के लिए अमेरिका बहुत बड़ा बाजार है और भारत के निर्यात गंतव्य के तौर पर अमेरिका पहले स्थान पर है. यदि पूरे वर्ष की बात करें, तो भी अमेरिका को हमारा निर्यात बढ़ा है. हालांकि, भारत को न झुकता देख अमेरिका ने उस पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया है. यानी कुल 50 प्रतिशत टैरिफ. इसका असर सितंबर के अंत में जो आंकड़े आयेंगे, उससे देखा जा सकेगा. पर फिलहाल इतने टैरिफ के बावजूद भारत का अमेरिका के बाजारों में निर्यात बढ़ाना एक उपलब्धि है. वहां के ग्राहकों में भारत के प्रति जो आकर्षण व वफादारी है, उसका यह जीता-जागता उदाहरण है.
भारत और अमेरिका ने पिछले वर्ष लगभग 94 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार किया, जिसमें भारत की ओर से लगभग 60 अरब डॉलर का निर्यात हुआ था. विदित हो कि दोनों देशों के बीच औपचारिक व्यापार बीती सदी के नौवें दशक में शुरू हुआ, जो तेजी से बढ़ता गया. भारत अमेरिका को सभी प्रकार के उत्पाद भेजता है, जिसमें इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, स्मार्टफोन, टेलीकॉम पुर्जे, दवाइयां शामिल हैं. यह निर्यात लगभग 10 अरब डॉलर का है और इसमें दवाइयों के फॉर्मूलेशन भी शामिल हैं. अमेरिका में इनकी बहुत मांग है, क्योंकि ये बहुत सस्ती हैं. इसी कारण ट्रंप प्रशासन ने इन्हें अतिरिक्त टैरिफ से मुक्त रखा है. भारत मशीनरी और मैकेनिकल अप्लायंसेज का, जिनमें इंडस्ट्रियल बॉयलर भी शामिल हैं, भी निर्यात करता है. भारत में बने सोने के आभूषणों और रत्नों की भी अमेरिका में बहुत मांग है. दशकों से वहां इनका निर्यात होता आ रहा है. भारतीय अमेरिकी, गुजराती मूल के लोग, इनकी बड़े पैमाने पर खरीदारी करते हैं.
भारत में तराशे गये हीरों की भी अमेरिका में काफी मांग है. हीरों को तराशने में भारत अव्वल है और यहां से यूरोपीय देशों को भी हीरे भेजे जाते हैं. एक और दिलचस्प आइटम है पेट्रोल. भारत के पश्चिमी तट पर स्थित रिफाइनरियों में आयातित कच्चे तेल को रिफाइन करके विदेश भेजा जाता है, अमेरिका भी उसका एक खरीदार है. यह निर्यात चार अरब डॉलर से भी ज्यादा का है. इसके अतिरिक्त, पेट्रोलियम उत्पाद भी अमेरिका भेजे जाते हैं. भारत में बने कपड़ों की भी यूरोप-अमेरिका में बड़ी मांग है. भारत रेडीमेड गारमेंट का बड़ा उत्पादक है और उसने पिछले वित्त वर्ष में अमेरिका को 5.33 अरब डॉलर का उत्पाद निर्यात किया था. भारत सी-फूड के निर्यात में भी काफी आगे है. यहां से बड़े पैमाने पर झींगे का निर्यात किया जाता है. भारत फ्रोजन सी-फूड का भी निर्यात करता है. बासमती चावल तथा भारतीय मसालों की भी अमेरिका में बहुत मांग है. पिछले वर्ष लगभग दो अरब डॉलर के ये उत्पाद निर्यात किये गये थे.
भारत से अमेरिका को बड़े पैमाने पर आइटी उत्पादों का भी निर्यात होता है. सर्विस क्षेत्र में जहां भारत ने अकेले अगस्त में लगभग 34 अरब डॉलर का निर्यात किया था, वहीं 17.45 अरब डॉलर का आयात भी किया. इसका अर्थ यह हुआ कि भारत का कुल निर्यात 16.61 अरब डॉलर का रहा. अमेरिका से भारत के व्यापारिक रिश्ते 1990 के दशक के बाद से लगातार सुधरते रहे हैं. पर डोनाल्ड ट्रंप के नकारात्मक और कुछ हद तक भारत विरोधी रुख से इस पर बुरा असर पड़ा है. ट्रंप का कहना है कि भारत व्यापार में अमेरिका से लाभ उठाता रहा है और वह हमसे कम सामान खरीदता है. फिलहाल दोनों देशों के बीच 500 अरब डॉलर के व्यापार पर समझौता वार्ता चल रही है, जिसमें अभी कुछ अड़चन आयी है.
भारत लगातार यह मांग कर रहा है कि अमेरिका एक ऐसा टैरिफ ढांचा तैयार करे, जिसके तहत अन्य देशों के मुकाबले भारतीय निर्यातकों को ग्लोबल मार्केट में स्पष्ट बढ़त मिल सके, तभी जाकर वह अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर मुहर लगायेगा. भारत ने यह भी साफ कर दिया है कि वह कृषि उत्पादों को भारत में बिना ड्यूटी के नहीं आने देगा, क्योंकि इसका बुरा असर हमारे विशाल कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा, जिसमें करोड़ों लोग काम करते हैं. अब देखना है कि अमेरिका भारत की आपत्तियों पर क्या कदम उठाता है. जाहिर है, उसे अपनी कठोर शर्तों को कम करना होगा, तभी बात बन पायेगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
