GetCompanion एक ऐसा स्टार्टअप है जो लोगों की भागदौड़ से भरी जिंदगी में मौजूद उसी खाली जगह को भरना चाहता है. यह एक ऐसा मंच है, जहां लोगों को किसी ऐप, बॉट या मशीन नहीं, बल्कि एक सच्चा इंसानी साथ मिलता है, कोई जो सुने, समय दे और बिना जज किए साथ रहे.
इस पहल की संस्थापक श्रद्धा चतुर्वेदी हैं, जिन्होंने PwC, Deloitte और KPMG जैसी वैश्विक कंपनियों में सफल करियर बनाया. कॉर्पोरेट दुनिया में लंबे अनुभव के दौरान उन्होंने देखा कि बाहर से सफल दिखने वाले कई लोग भीतर से टूटे, थके और अकेले हैं. उसी अनुभव ने उन्हें एक नया रास्ता चुनने की प्रेरणा दी. उनका मानना है कि लोगों को सलाह नहीं, बल्कि किसी की मौजूदगी चाहिए होती है. कोई जो बिना जज किए सुने, समय दे, साथ बैठे और यह एहसास दिलाए कि आप अकेले नहीं हैं. जानते हैं श्रद्धा के इस अनोखे स्टार्टअप के बारे में विस्तार से.
सवाल : GetCompanion क्या है? आसान शब्दों में बताइए.
बहुत आसान शब्दों में कहूं तो GetCompanion एक ऐसा मंच है, जहाँ आपको एक सच्चा इंसानी साथ मिलता है. यहाँ आप किसी बॉट, मशीन या नकली पहचान से बात नहीं करते. यहाँ एक वास्तविक इंसान होता है, जो आपको सुनता है, समय देता है और बिना किसी जजमेंट के साथ रहता है. यह न डेटिंग प्लेटफॉर्म है, न थेरेपी सेवा. यह उन दोनों के बीच की एक सुरक्षित जगह है, जहाँ सिर्फ मानवीय जुड़ाव है.
सवाल : आप PwC, Deloitte, KPMG जैसी दुनिया की बड़ी कंपनियों में काम कर चुकी हैं. फिर आपने यह सब छोड़कर यह काम क्यों शुरू किया?
अगर करियर की बात करूँ तो सब कुछ बहुत व्यवस्थित और सुरक्षित था. PwC, Deloitte, KPMG जैसी बड़ी कंपनियों में 15 साल से ज़्यादा काम किया. भारत, यूके और साउथ अफ्रीका जैसे देशों में काम करने का अनुभव मिला. इसके बाद हमने ISSC बनाई, वह भी लगातार प्रॉफिट में रही. लेकिन ISSC चलाते हुए एक बात बार-बार सामने आई. जिन लोगों के साथ हम काम कर रहे थे, वे अपने काम में बहुत अच्छे थे, सफल थे, लेकिन भीतर से थके हुए और अकेले दिखते थे. कई लोग खुलकर अपनी बात भी नहीं कह पाते थे.
यह बात सिर्फ भारत में नहीं, दूसरे देशों में भी दिखी. तब समझ आया कि यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि समाज में बढ़ती बड़ी समस्या है. जब मैंने आँकड़ों पर ध्यान दिया तो पता चला कि भारत में 30 करोड़ से अधिक लोग अकेलेपन का अनुभव कर रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसे जनस्वास्थ्य की गंभीर चिंता मान चुका है. मुझे अपना जयपुर का बचपन याद आया, जहाँ साथ होना बहुत सहज था. आज शहरों में जुड़ाव अपने आप नहीं मिलता, उसे बनाना पड़ता है. यहीं से GetCompanion का विचार आया कि अगर भावनात्मक सहारा सहज रूप से नहीं मिल रहा, तो उसे सुरक्षित, सम्मानजनक और व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध कराया जाए.
सवाल : जब आपने पहली बार कहा कि लोग पैसे देकर किसी से बात कर सकते हैं, तो लोगों की प्रतिक्रिया क्या थी?
जब हमने इस विचार पर काम शुरू किया, तो यह सिर्फ अंदाज़ा नहीं था. हमने शोध किया, दुनिया भर के अध्ययन देखे और लोगों के व्यवहार को समझा. तब साफ हुआ कि अकेलापन कोई छोटी या सीमित समस्या नहीं है. विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे गंभीर जन-स्वास्थ्य समस्या मानता है. हार्वर्ड विश्वविद्यालय के लंबे अध्ययन भी बताते हैं कि खुशहाल और स्वस्थ जीवन का सबसे बड़ा आधार अच्छे रिश्ते और सार्थक जुड़ाव हैं. जब यह समझ हमारे पास आई, तब हमें भरोसा हुआ कि हम सही दिशा में काम कर रहे हैं.
लेकिन जब हमने लोगों से कहा कि हम ऐसा मंच बना रहे हैं जहाँ लोग किसी से बात करने के लिए भुगतान करेंगे, तो शुरुआत में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ मिलीं. कुछ लोगों ने पूछा, क्या लोग इसके लिए पैसे देंगे? लेकिन जैसे-जैसे बात आगे बढ़ी, वही लोग कहने लगे कि उनके पास भी कोई ऐसा नहीं है जिससे वे बिना डर या संकोच के बात कर सकें. हम सब अक्सर कहते हैं “मैं ठीक हूं”, जबकि हर बार सच ऐसा नहीं होता.
सवाल : भारत में लोग अकेलेपन को समस्या नहीं मानते. आप इस सोच को कैसे देखती हैं?
मुझे लगता है कि हम अभी भी अकेलेपन को सही तरह से समझ नहीं पाए हैं. हम मान लेते हैं कि अगर किसी के पास परिवार है या लोग आसपास हैं, तो वह अकेला नहीं हो सकता. लेकिन अकेलापन लोगों की कमी नहीं है. अकेलापन वह स्थिति है, जब इंसान लोगों के बीच रहकर भी भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ महसूस न करे. भारत में यह विरोधाभास साफ दिखता है. हम भीड़भाड़ वाले शहरों, घरों और दफ्तरों में रहते हैं, फिर भी लोग भीतर से अकेले हैं.
युवा तुलना और पहचान के दबाव में हैं. नौकरीपेशा लोग तनाव और थकान से जूझ रहे हैं. बुजुर्ग परिवार के बीच रहकर भी अकेलापन महसूस करते हैं. अगर आँकड़े देखें तो भारत में 30 करोड़ से अधिक लोग इससे गुजर रहे हैं. दुनिया भर में हर चार में से एक वयस्क अकेलेपन का अनुभव करता है. सबसे बड़ी बात यह है कि डिजिटल संपर्क बढ़ा है, लेकिन इंसानी जुड़ाव कम हुआ है. हम जुड़े हुए दिखते हैं, पर जुड़ा हुआ महसूस नहीं करते. अकेलापन कमजोरी नहीं, बल्कि एक संकेत है कि इंसान को साथ चाहिए.
सवाल : अभी आपकी इस सर्विस को कैसा रिस्पांस मिल रहा है?
हमारी प्रत्यक्ष सेवा गुरुग्राम में खासतौर पर वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों के लिए बहुत उपयोगी रही है. हमारे साथी बुजुर्गों को मोबाइल और कंप्यूटर चलाना सिखाते हैं. कोई संगीत सीख रहा है, कोई अपने पुराने शौक फिर से जी रहा है. कई बार माता-पिता अपने बच्चों के लिए भी साथी बुक करते हैं, ताकि बच्चे स्क्रीन से हटकर खेल और गतिविधियों की ओर जाएँ. यह मंच युवाओं, विद्यार्थियों, तनाव से गुजर रहे लोगों और बुजुर्गों- सभी के लिए है. सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया है. महिला उपयोगकर्ताओं के लिए महिला साथी, पुरुषों के लिए पुरुष साथी, और सभी साथी प्रशिक्षित पेशेवर होते हैं.
सवाल : Companion का कस्टमर से रिश्ता क्या होता है? क्या दुरुपयोग का डर नहीं है?
Companion का रिश्ता एक सुरक्षित, सम्मानजनक और सीमाओं पर आधारित मानवीय जुड़ाव है. यह न दोस्ती है, न डेटिंग, न थेरेपी. यह ऐसा साथ है जहाँ एक प्रशिक्षित व्यक्ति आपको सुनने, समझने और भावनात्मक सहारा देने के लिए मौजूद होता है. यहाँ मकसद किसी को बदलना नहीं, बल्कि उसके साथ मौजूद रहना है. आज की तेज़ जिंदगी में यही सबसे ज़्यादा कम है. जहां तक दुरुपयोग की बात है, हमने शुरू से ही सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा है. हर साथी का पुलिस सत्यापन, पहचान जाँच और पृष्ठभूमि जाँच होती है. प्रत्यक्ष मुलाकात के लिए उपयोगकर्ता का आधार आधारित केवाईसी और पता सत्यापन भी ज़रूरी है.
महिला के लिए महिला साथी, पुरुष के लिए पुरुष साथी की व्यवस्था है. वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग देखभाल व्यवस्था रखी गई है. साथियों की पहचान गोपनीय रखी जाती है. हर सत्र के बाद प्रतिक्रिया ली जाती है और निगरानी व्यवस्था रहती है.
सवाल : क्या कभी आपको खुद भी ऐसे सहारे की जरूरत महसूस हुई?
हाँ, बिल्कुल हुई. और मैं इसे पूरी ईमानदारी से स्वीकार करती हूँ. अक्सर लोग मान लेते हैं कि जो व्यक्ति बड़े पद पर है, सफल है, उसे भावनात्मक सहारे की ज़रूरत नहीं होगी. लेकिन सच इससे अलग है. कामकाजी जीवन में लगातार दबाव रहता है- समय सीमा, ग्राहक, टीम, जिम्मेदारियाँ. धीरे-धीरे आप ऐसे स्थान पर पहुँच जाते हैं जहाँ आप सबकी सुनते हैं, सबको दिशा देते हैं, लेकिन आपको सुनने वाला कोई नहीं होता.
PwC में काम करते समय कई बार मुझे लगा कि काश कोई ऐसा हो जो बस मुझे सुने. कई बार डर भी होता था कि अगर अपनी परेशानी बताई, तो लोग मुझे कमजोर न समझ लें. मैं खुशकिस्मत रही कि मेरे पति इस क्षेत्र से जुड़े हैं और मैं उनसे खुलकर बात कर पाती थी. लेकिन हर किसी के पास यह सहारा नहीं होता. और जब आप दो बच्चों की माँ भी हों, तब जिम्मेदारियाँ और बढ़ जाती हैं. आप सबके लिए मौजूद रहते हैं, लेकिन कभी-कभी आपको भी किसी की ज़रूरत होती है. शायद इसी वजह से GetCompanion मेरे लिए सिर्फ एक व्यापारिक विचार नहीं था, बल्कि मेरे अपने अनुभवों से निकला एक प्रयास था.
सवाल : क्या अब यह मान लें कि हम रिश्तों को अब कंज्यूमर की तरह देखने लगे हैं?
नहीं, मैं ऐसा नहीं मानती कि हम रिश्तों को बाजार या लेन-देन की चीज़ बना रहे हैं. रिश्ते आज भी भावनाओं, अपनापन और भरोसे पर टिके हैं, और हमेशा रहेंगे. उनकी जगह कोई नहीं ले सकता. असल में बदलते समय ने हमारे सहारे के पुराने तरीके बदल दिए हैं. शहरी जीवन, छोटे परिवार, काम का दबाव और एक शहर से दूसरे शहर जाना, इन सबने लोगों को व्यस्त तो रखा है, लेकिन भीतर से दूर भी किया है. लोग यहाँ दोस्ती खरीदने नहीं आते. लोग यहाँ समय, ध्यान और एक सुरक्षित जगह पाने आते हैं — और आज की तेज़ जिंदगी में यही सबसे दुर्लभ चीज़ है. यह रिश्तों का बाज़ार नहीं, बल्कि इंसानी ज़रूरत को समझने की कोशिश है. जैसे शारीरिक स्वास्थ्य जरूरी है, वैसे ही भावनात्मक स्वास्थ्य भी जरूरी है.
सवाल : आप अपनी टीम का चुनाव कैसे करते हैं और उन्हें कैसे ट्रेनिंग देते हैं?
हमारे सभी साथी प्रशिक्षित पेशेवर हैं. चयन के समय सहानुभूति आधारित मनोवैज्ञानिक परीक्षण लिया जाता है. इसके बाद उन्हें बातचीत, व्यवहार, सीमाओं और संवेदनशील परिस्थितियों को संभालने की प्रशिक्षण दी जाती है. हर सप्ताह विशेषज्ञों द्वारा आगे की सीख और प्रशिक्षण भी दिया जाता है. हर सत्र के बाद प्रतिक्रिया ली जाती है. गुणवत्ता, व्यवहार और किसी भी शिकायत की निगरानी की जाती है.
सवाल : कोई ऐसा अनुभव, जब आपको लगा कि आपने सही काम शुरू किया?
हां, ऐसे कई अनुभव हैं जिन्होंने मुझे भरोसा दिया कि यह समाज की ज़रूरत है. हमारे एक कस्टमर की पत्नी ने अपने पति के लिए हमसे संपर्क किया. उनके पति डॉक्टर थे और डिमेंशिया से गुजर रहे थे. वे पहले बहुत अच्छे से बातचीत करते थे, लेकिन पुरानी बातें भूलने लगे थे और धीरे-धीरे खुद को कमरे तक सीमित कर लिया था. उनकी पत्नी चाहती थीं कि कोई धैर्य से उनसे बात करे और उनके जीवन में फिर से उत्साह लाए. हमारे साथी ने पहले ही दिन बहुत संवेदनशीलता और धैर्य से उनसे बात की और उन्हें कमरे से बाहर लिविंग रूम तक ले आए. यह परिवार के लिए बहुत बड़ा बदलाव था. बाद में उन्होंने लंबी अवधि के लिए सर्विस जारी रखी.
सवाल : क्या आपके पुराने सहकर्मियों ने पूछा कि आप यह क्या कर रही हैं?
हाँ, बिल्कुल पूछा, और यह स्वाभाविक भी था. जब आप बड़ी कंपनियों में अच्छा करियर बनाकर अचानक अकेलेपन जैसे विषय पर काम शुरू करते हैं, तो लोगों को यह बदलाव थोड़ा अलग लगता है. कई लोगों ने पूछा कि इतना स्थिर करियर छोड़कर यह क्यों? मेरा जवाब हमेशा सीधा रहा, यह कोई छोटी या कल्पना की समस्या नहीं, बल्कि बहुत वास्तविक समस्या है. शुरुआत में लोगों को संदेह था, लेकिन धीरे-धीरे वही लोग समझने लगे. आज कई लोग सराहना करते हैं और कुछ लोग दूसरों को भी हमारे पास भेजते हैं.
सवाल : आने वाले समय में आप इसे कहां देखती हैं?
मैं GetCompanion को सिर्फ एक स्टार्टअप के रूप में नहीं देखती, बल्कि आने वाले समय की सामाजिक जरूरत के रूप में देखती हूं. जैसे आज शारीरिक स्वास्थ्य जरूरी है, वैसे ही भविष्य में भावनात्मक स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी माना जाएगा. अभी हमारा ध्यान दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई जैसे बड़े शहरों में इसे भरोसेमंद और सुरक्षित मंच के रूप में स्थापित करने पर है, जहाँ लोग बिना झिझक आ सकें. लेकिन आगे की सोच इससे बड़ी है. मैं चाहती हूं कि 2030 तक लोग अकेलेपन को कमजोरी नहीं, सामान्य मानवीय जरूरत के रूप में देखें. भावनात्मक सहारे को सिर्फ थेरेपी तक सीमित न माना जाए, बल्कि उसे जीवन का जरूरी हिस्सा समझा जाए. सपना बहुत सरल है, ऐसा समाज जहां डिजिटल दुनिया के बीच इंसानी जुड़ाव खो न जाए. GetCompanion उसी दिशा में एक कदम है, जहां किसी से बात करना विलासिता नहीं, सामान्य और सुलभ बात हो.
