ब्रिक्स : बांग्लादेश ने गंवाया अवसर

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में बांग्लादेश की अनुपस्थिति ने एक महत्वपूर्ण अवसर को खो दिया है. यह लेख बताता है कि कैसे यह निर्णय देश के आर्थिक और विकास संबंधी हितों को प्रभावित कर सकता है, खासकर जब वह विकास के अगले चरण की तैयारी कर रहा है. पढ़िए स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू के प्रोफेसर डॉ. संजय भारद्वाज का लेख

यह सच है कि ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में शामिल होने या न होने का फैसला भारत-बांग्लादेश के शाश्वत रिश्ते को नहीं बदल सकता. पर तारिक रहमान को ब्रिक्स के इस मौके का इस्तेमाल बांग्लादेश के हितों को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहिए था. ब्रिक्स एक ऐसा बहुपक्षीय मंच है, जहां भारत और चीन, दोनों के साथ बांग्लादेश अपने हितों पर बात कर सकता है. इस शिखर सम्मेलन से उसका दूर रहना घरेलू राजनीति में एक संदेश जरूर दे सकता है, पर इसकी कीमत बांग्लादेश के आर्थिक और विकास संबंधी हितों को चुकानी पड़ सकती है. बांग्लादेश ऐसे समय में एक बड़ा अवसर खो देगा, जब वह अपने विकास के अगले चरण की तैयारी कर रहा है.

भारत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स देशों के शासनाध्यक्षों के साथ ही बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को भी सम्मेलन के आउटरीच सत्र में शामिल होने का न्योता दिया था. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारत की मेजबानी में 2023 में हुए जी-20 सम्मेलन में भागीदारी कर बांग्लादेश की ग्लोबल साख बढ़ायी थी. ढाका के लिए ब्रिक्स का यह आमंत्रण दक्षिण एशिया की अपनी क्षेत्रीय भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक मंच पर अपनी बात रखने का मौका था.

बांग्लादेश को भारत की ओर से मिला यह दूसरा आमंत्रण था. विगत फरवरी में भी भारत ने तारिक रहमान को द्विपक्षीय यात्रा का प्रस्ताव दिया था. ब्रिक्स के 11 सदस्य दुनिया की करीब 49.5 फीसदी आबादी, लगभग 40 फीसदी वैश्विक जीडीपी और करीब 26 फीसदी वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं. बांग्लादेश 2021 से न्यू डेवलपमेंट बैंक की सदस्यता के जरिये इस आर्थिक नेटवर्क का हिस्सा रहा है. ब्रिक्स के तीन बड़े सदस्य-भारत, चीन और रूस-बांग्लादेश के प्रमुख बुनियादी ढांचा साझेदारों में शामिल हैं. रूस की रोसटॉम कंपनी ईश्वरदी में रूपुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र बना रही है, जो बांग्लादेश की पहली परमाणु ऊर्जा परियोजना है, जिसके चालू होने पर बांग्लादेश की बिजली जरूरतों का 10-12 फीसदी पूरा हो जाने की उम्मीद है. चीन ने कर्णफुली सुरंग, पायरा बिजली परियोजना और पद्मा ब्रिज रेल लिंक समेत कई परियोजनाओं को वित्तीय मदद दी है.

भारत भी लंबे समय से बांग्लादेश के साथ ऋण समझौतों, कनेक्टिविटी और ऊर्जा परियोजनाओं में जुड़ा है. अखौरा-अगरतला रेल लिंक, खुलना-मोंगला पोर्ट रेल लाइन और रामपाल में मैत्री सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट इसके उदाहरण हैं. ब्रिक्स बांग्लादेश को इन देशों के साथ एक ही मंच पर जुड़ने का अवसर देता है. बांग्लादेश के लिए यह अपने हितों पर बात करने का अवसर भी है. व्यापार, निवेश, तकनीक और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर वह अपनी प्राथमिकताएं सामने रख सकता है. ब्रिक्स एक ऐसा बहुपक्षीय मंच है, जहां भारत और चीन, दोनों के साथ बांग्लादेश अपने हितों पर बात कर सकता है. इसके बावजूद उसके ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल न होने के पीछे घरेलू राजनीति और बाहरी दबाव, दोनों हैं. पहली वजह संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र और ब्रिक्स सम्मेलन की तारीखों का टकराव है.

दूसरी वजह यह है कि बांग्लादेश शेख हसीना से अलग अपनी राजनीतिक पहचान बनाना चाहता है. शेख हसीना का प्रत्यर्पण और भारत से उनका सार्वजनिक संबोधन अब बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन चुका है. प्रधानमंत्री तारिक रहमान पर इस मुद्दे को संभालने का भारी दबाव है. उनके घरेलू राजनीतिक आधार का एक हिस्सा हसीना के दौर के बाद भारत से अपनी दूरी साफ तौर पर दिखाना चाहता है. इसलिए ढाका यह सोच-समझकर तय कर रहा है कि भारत के कितना नजदीक जाना है. तीसरा पहलू अमेरिका के साथ तारिक रहमान के संबंधों का है. बांग्लादेश दरअसल अपने विकास के एक अहम मोड़ पर है. उसे आगामी नवंबर में ‘एलडीसी’ यानी अल्प-विकसित देशों की श्रेणी से बाहर निकलना था. यह उसके 'विजन 2041' के लक्ष्य से भी जुड़ा है.

लेकिन अब वह समयसीमा तीन साल बढ़ाने की मांग कर रहा है, ताकि व्यापार और निवेश को मजबूत किया जा सके, निर्यात प्रतिस्पर्धा बनाये रखी जा सके और अर्थव्यवस्था को स्थिर किया जा सके. समयसीमा बढ़ाने के मुद्दे पर अंतिम फैसला इस महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र शुरू होने के बाद होने की उम्मीद है, जिसमें उसे अमेरिका का समर्थन चाहिए. जबकि ब्रिक्स को कई बार पश्चिम और अमेरिका विरोधी मंच के रूप में भी देखा जाता है. ब्रिक्स में तारिक रहमान के न आने का यह भी कारण हो सकता है.

शिखर सम्मेलन में तारिक रहमान के शामिल न होने का यह फैसला घरेलू राजनीति से जुड़ा हो सकता है, लेकिन इसका असर कूटनीतिक स्तर पर भी पड़ेगा. बांग्लादेश ऐसे समय में एक बड़ा अवसर खो देगा, जब वह अपने विकास के अगले चरण की तैयारी कर रहा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से के सामने अपनी जगह मजबूत करना चाहता है. संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षता कर रहे बांग्लादेश को भरोसेमंद साझेदारियों और नये आर्थिक बाजारों की जरूरत है, साथ ही उसे किसी भी तरह के अलगाव से भी बचना होगा.

हालांकि, तारिक रहमान के सामने वॉशिंगटन, नयी दिल्ली और बीजिंग- तीनों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाये रखने की चुनौती भी है. भारत और बांग्लादेश के रिश्ते सिर्फ इतिहास और संस्कृति तक सीमित नहीं हैं. दोनों देश भूगोल, व्यापार, ऊर्जा, श्रम और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गहराई से जुड़े हैं. भारत के पूर्वोत्तर तक पहुंचने के लिए बांग्लादेश एक अहम भू-सेतु है. नदियों से लेकर ऊर्जा और लोगों की आवाजाही तक दोनों देशों की कई जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. दोनों के बीच शेख हसीना के प्रत्यर्पण, तीस्ता जल बंटवारा, गंगा जल संधि का नवीनीकरण, सीमा पर उलझन और रुकी हुई बुनियादी ढांचा परियोजनाएं जैसे विवाद भी हैं. तारिक रहमान की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के आने के बाद दोनों देशों ने कुछ हद तक रिश्तों को दोबारा बेहतर बनाने की इच्छा दिखाई है.

भारत में केंद्र और पश्चिम बंगाल में एक ही राजनीतिक दल की सरकार होने से जल विवादों और दूसरे साझा मुद्दों पर सहयोग की नयी गुंजाइश दिखती है. पर यह परस्पर निर्भरता घरेलू राजनीति एवं बाहरी भू-राजनीतिक दबावों से प्रभावित हो रही है. जून में चीन की अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान तारिक रहमान ने तीस्ता नदी परियोजना पर चीन के साथ सहयोग और मोंगला बंदरगाह के आधुनिकीकरण से जुड़े समझौतों को आगे बढ़ाया. वहीं भारत को अपने ही क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव से रणनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. बांग्लादेश के फैसलों का भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा पर, खासकर बेहद संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर असर पड़ता है. भारत ने वीजा सेवाएं फिर शुरू कर, रेलवे और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को दोबारा शुरू करने पर बात कर बांग्लादेश से अपने रिश्ते सुधारने के संकेत दिये हैं. नये उच्चायुक्त की नियुक्ति भी इसका उदाहरण है. ब्रिक्स का निमंत्रण भी इसी क्रम में एक और कदम था.

यह भी सच है कि एक शिखर सम्मेलन में शामिल होने या न होने का फैसला इस रिश्ते को नहीं बदलता. लेकिन तारिक रहमान को ब्रिक्स के इस मौके का इस्तेमाल बांग्लादेश के हितों को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहिए था. सम्मेलन से उनका दूर रहना घरेलू राजनीति में एक संदेश जरूर दे सकता है, लेकिन इसकी कीमत अंततः बांग्लादेश के आर्थिक और विकास संबंधी हितों को चुकानी पड़ सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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