कांग्रेस के लिए गले की फांस बना धर्मनिरपेक्षता!

-रजनीश आनंद- आज कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने एक ऐसा बयान दिया है, जिससे राजनीति में नयी बहस छिड़ सकती है. एंटनी ने कहा है कि कांग्रेस की यह विचारधारा रही है कि वह सभी वर्गों के लोगों के साथ समान व्यवहार करेगी, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अल्पसंख्यकों के साथ […]

-रजनीश आनंद-

आज कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने एक ऐसा बयान दिया है, जिससे राजनीति में नयी बहस छिड़ सकती है. एंटनी ने कहा है कि कांग्रेस की यह विचारधारा रही है कि वह सभी वर्गों के लोगों के साथ समान व्यवहार करेगी, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अल्पसंख्यकों के साथ निकटता के कारण इस सिद्धांत का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि बहुसंख्यक जनता में यह संदेह घर कर गया है कि पार्टी अल्पसंख्यकों को ज्यादा तरजीह देती है, जिससे उनकी उपेक्षा हो रही है. यह बयान तिरुअनंतपुरम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान एके एंटनी ने दिया है. उन्होंने यह बयान उस वक्त दिया है जब कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद विचार मंथन के दौर से गुजर रही है. भले ही एंटनी ने यह बयान केरल में दिया है, लेकिन इस बयान का असर राष्ट्रव्यापी है. एंटनी का कहना है कि अल्पसंख्यकों से निकटता सांप्रदायिक ताकतों को उस क्षेत्र में पैठ बनाने का निमंत्रण है.

एंटनी ने कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर क्यों उठाये सवाल

अगर हम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली हार का मंथन करें, तो उसके एक कारणों में यह जरूर शुमार होगा कि कांग्रेस पर यह लेबल लग गया है कि वह हिंदू विरोधी पार्टी है. देश के किसी भी हिस्से में अगर दंगे की आग फैलती है, तो कांग्रेसियों की सहानुभूति मुसलमानों के प्रति होती है, जबकि दंगाग्रस्त तो हिंदू भी होते हैं. दोनों की पीड़ा तो समान ही होती है. कांग्रेस के इस रवैये से आम जनमानस में यह संदेश घर कर गया है कि यह पार्टी हिंदुओं का दर्द नहीं समझती है, परिणाम यह हुआ है कि उत्तरप्रदेश जैसे प्रदेश में जहां मुसलमानों की आबादी काफी है, भाजपा 80 में से 71 सीट जीतकर आयी है. भाजपा एक ऐसी पार्टी है, जो हमेशा हिंदू कार्ड खेलती है और देश के किसी भी हिस्से में अगर हिंदू प्रताडि़त होते हैं, तो वह उनके लिए मजबूती से आवाज उठाती है. राममंदिर के समय से ही भाजपा के साथ हिंदुओं का एक वोट बैंक बन चुका है. इस स्थिति से कांग्रेस को नुकसान हो रहा है, जिसे इंगित करना एंटनी ने आवश्यक समझा.

कई बार नजर आयी है कांग्रेस की छद्म धर्मनिरपेक्षता

मुजफ्फरनगर दंगा : उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जब दंगे की आग भड़की, तो कई निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. यह दंगा क्यों शुरू हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार थे, अगर इस बात को दरकिनार कर दिया जाये, तो इसमें कोई दोराय नहीं है कि दंगे की आंच दोनों संप्रदायों के लोगों तक पहुंची और दर्द भी दोनों को एक सा ही हुआ था. फिर सभी वर्गों को एक समान मानने और उनके साथ न्याय करने की बात करने वाली पार्टी कांग्रेस आखिर क्यों सिर्फ मुसलमानों के आंसू पोंछने गयी. राहुल गांधी मुजफ्फरनगर गये, तो लेकिन हिंदुओं का दर्द नहीं बांटा.

असम हिंसा : असम में मई माह में हिंसा हुई थी, जिसमें लगभग 30 लोगों की हत्या की गयी थी. बताया जाता है कि मरने वाले सभी मुसलमान थे और उन्हें बांग्लादेशी घुसपैठिया करार देकर मार दिया गया, जबकि इसका कारण यह था कि उन्होंने बोडोलैंड के उम्मीदवारों के खिलाफ मतदान किया था. जब असम में हिंसा फैली थी, उस वक्त कांग्रेस सहित सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने नरेंद्र मोदी को दंगे के लिए जिम्मेदार ठहराया था. जबकि असम में कांग्रेस की सरकार थी और केंद्र में भी कांग्रेस की ही सरकार थी.

शाहबानो प्रकरण : 1986 में शाहबानो मामले में जिस प्रकार राजीव गांधी की सरकार ने उच्चतम न्यायालय के फैसले को पलटने के लिए कानून बनाया, उसके बाद कांग्रेस की ऐसी छवि बन गयी कि वह मुसलमानों की हिमायती है. राजीव गांधी सरकार के इस फैसले का आम जनता ने स्वागत नहीं किया था, क्योंकि शाहबानो एक बुजुर्ग महिला थी और उसके पास जीवनयापन का कोई साधन नहीं था, ऐसे में उसे गुजारा भत्ता से वंचित करना मानवीय नहीं था.

रामजन्म भूमि का ताला खुलवाना और शिलान्यास की अनुमति : शाहबानो प्रकरण के बाद कांग्रेस ने यह महसूस किया कि उसके हिंदू वोटर नाराज हैं, तो उसने विवादित रामजन्म भूमि का ताला खुलवा दिया और 1989 में राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति भी दे दी. कांग्रेस का यह निर्णय काफी विवादित था, क्योंकि एक ओर तो वह शाहबानो को गुजारा भत्ता से वंचित करके मुसलमानों की हिमायती बन गयी थी, वहीं दूसरी ओर रामजन्म भूमि का ताला खुलवाकर उसने मुसलमानों से बैर कर लिया था. इस बात से हम सभी वाकिफ हैं कि बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि को लेकर काफी अरसे से विवाद चल रहा है और अभी भी यह मामला कोर्ट के पास विचाराधीन है. फिर आखिर क्यों कांग्रेस पार्टी ने उक्त फैसला किया, जबकि वह सभी लोगों को एक समान मानने का दावा करती है.

मुसलमानों का इस्तेमाल करती आयी है कांग्रेस पार्टी

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत वर्ष में मुसलमानों को कांग्रेस पार्टी इस्तेमाल करती आयी है. अगर देश की सभी पार्टियों को इस लिस्ट में शामिल कर दें, तो गलत नहीं होगा. भाजपा(जिस पर मुसलमान भरोसा नहीं करते) के अलावा अन्य सभी पार्टियों ने खुद को मुसलमानों का हिमायती बताया है. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर जब इतने हितैषी इस कौम के हैं, तो इनकी इतनी दुर्दशा क्यों है? क्यों आज भी एक आम मुसलमान दो वक्त की रोटी सही से नहीं खा पाता. महिलाएं शोषित हैं, समाज में घोर अशिक्षा है, आखिर क्यों? देश में अगर कहीं भी कोई अपराध होता है, तो अपराधी मुस्लिम बस्ती से ही पकड़े जाते हैं? इसका कारण मात्र यह है कि मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक समझा गया. उनमें इस बात का डर पैदा कर दिया गया कि बहुसंख्यक हिंदू उनका विरोधी है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था. परिणाम यह हुआ कि मुसलमान तुष्टिकरण की नीति का शिकार हो गया और कांग्रेस पार्टी हर जरूरत के समय उसका इस्तेमाल करने लगी.

धर्मनिरपेक्षता पर कांग्रेस में पहली भी छिड़ी है बहस

बटला हाउस एनकाउंटर : बटला हाउस एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिद्दीन के कुछ आंतकवादी मारे गये थे. इस मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए कांग्रेस ने काफी हंगामा किया था. सलमान खुर्शीद ने तो यहां तक कहा था कि सोनिया गांधी इस एनकाउंटर के वीडियो को देखकर रो पड़ी थीं. दिग्विजय सिंह ने भी इस मामले पर खूब हंगामा किया था, क्योंकि उन्हें वोट बैंक की चिंता थी. लेकिन पी चिदंबरम ने उस वक्त भी इन बातों का विरोध किया था और कहा था कि यह एनकाउंटर बिलकुल सही था और इस केस को पुन: खुलवाने की जरूरत नहीं है.

सोमनाथ मंदिर का निर्माण : अगर कांग्रेस के इतिहास को खंगालें, तो कई बार ऐसे संदर्भ मिलते हैं, जब कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े किये गये. सोमनाथ मंदिर के निर्माण के वक्त भारत के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने यह उल्लेख किया था कि देश की बहुसंख्यक जनता को नाराज करके उनकी उपेक्षा करके देश में धर्मनिरपेक्षता कायम नहीं की जा सकती है.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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