नेशनल कंटेंट सेल : उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में सीमावर्ती गांवों के आदिवासियों को राशन का पूरा कोटा नहीं मिल पाने की वजह से उन्हें नेपाली बाजार से मिलने वाले चीनी अनाज पर निर्भर रहना पड़ रहा है. क्षेत्र में राशन की आपूर्ति बढ़ाने की मांग को लेकर शुक्रवार को यहां धारचूला के उपजिलाधिकारी आरके पांडेय से मिलने आये व्यास घाटी के प्रतिनिधिमंडल के एक आदिवासी नेता कृष्णा गर्ब्याल ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा दिये जा रहे राशन का कोटा उनकी जरूरत से कम पड़ रहा है. इस कारण ग्रामीणों को नेपाली बाजार में बिकने वाले चीनी अनाज पर निर्भर रहना पड़ता है.
उन्होंने कहा कि ग्रामीण गर्बियांग के पास भारत और नेपाल को जोड़ने वाले काली नदी पर बने पुल को पार करते हैं और अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए पड़ोसी देश के टिंकर और चांगरू गांवों के बाजार से राशन खरीदते हैं. गर्बयाल ने बताया कि सरकार हर परिवार को प्रति महीने पांच किलो गेहूं और दो किलो चावल देती है, जो बहुत कम है. इससे भी बड़ी बात यह है कि उन्हें पिछली बार राशन मानसून शुरू होने से पहले मिला था.
व्यास नदी घाटी में बसते हैं सात गांव, जहां नहीं पहुंच रहा राशन
दरअसल, धारचूला उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का सुदूरवर्ती इलाका है. यहां की व्यास नदी घाटी में सात गांव बसते हैं. इनमें बूंदी, गूंजी, गर्ब्यांग, कुटी, नपलचु, नभी और रोंकॉन्ग शामिल हैं. इन गांवों में तकरीबन 400 परिवार रहते हैं. ये लोग नमक और चीनी जैसी वस्तुओं के लिए भी चीन पर निर्भर हैं. इनकी रोजमर्रा की जरूरत की चीजें चीन से पूरी हो रही हैं. इसमें कुकिंग तेल, चावल, रिफाइंड, सब्जियां-मसाले और गेहूं वगैरह भी शामिल है. इन्हें ये वस्तुएं नेपाल के रास्ते मिल रही हैं.
कई महीनों से बाधित हैं सड़कें
इस घाटी तक जाने वाली सड़क पिछले कई महीनों से बाधित है. लिहाजा, उत्तराखंड सरकार की ओर से मिलने वाला राशन इन तक पहुंच नहीं पा रहा. राज्य सरकार द्वारा मुहैया करायी गयीं चीजें किसी तरह घाटी तक पहुंच भी पा रही हैं, वे इन गांवों के लोगों के लिए कम पड़ रही हैं. लिहाजा, वे नेपाल के रास्ते चीन से आने वाला नमक, कुकिंग तेल, चावल, रिफाइंड, सब्जियां-मसाले और गेहूं लेने को मजबूर हैं.
धारचूला से होती है कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग के इन गांवों में आपूर्ति
कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग के इन गांवों में धारचूला से खाने-पीने की वस्तुओं की आपूर्ति होती है. धारचूला से 100 से 105 किमी दूरी पर बसे इन गांवों में घोड़े, खच्चर से माल पहुंचाया जाता है. इस समय धारचूला से गुंजी तक सड़क बनाने के लिए पहाड़ काटे जा रहे हैं. धारचूला से 56 किमी दूर गर्बाधार के आगे ब्लास्टिंग के कारण पहाड़ों से मलबा, बोल्डर गिरने का डर है. इस वजह से घोड़े, खच्चर इन रास्तों पर नहीं जा रहे हैं. इस कारण सीमांत गांवों में खाने-पीने की वस्तुएं नहीं पहुंच पा रही हैं. ऐसे में ये ग्रामीण सीतापुल से नेपाल के छांगरु तिंकर पहुंच कर वहां से चीन का रिफाइंड, चावल, सब्जियां, मसाला आदि ला रहे हैं.
क्या कहतें धारचूला के उपजिलाधिकारी
इस मामले में धारचूला के उपजिलाधिकारी आरके पांडेय ने कहा कि मानसून शुरू होने से पहले हेलीकॉप्टर द्वारा व्यास घाटी के ग्रामीणों के लिए राशन भेजा गया था, जबकि ऊंचाई पर बसे गांवों के लिए अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर का राशन अभी भेजा जायेगा. उन्होंने कहा कि सड़क मार्ग की मरम्मत जारी रहने के कारण प्रशासन को व्यास घाटी तक राशन पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टर की उपलब्धता पर निर्भर रहना पड़ता है और इसके लिए प्रशासन सेना के संपर्क में भी है, ताकि उनके हेलीकॉप्टरों का प्रयोग किया जा सके.
चीन की वस्तुओं का कीमत स्युगर में
वस्तु चीन का रुपया भारत का रुपया
नमक का पैकेट 10 स्युगर 110 रुपये
रिफाइंड पांच लीटर 70-80 स्युगर 770-880 रुपये
चावल 10 किलो 55-64 स्युगर 605-715 रुपये
नोट : चीन की मुद्रा युआन को स्थानीय भाषा में ग्रामीण स्युगर कहते हैं. एक स्युगर की कीमत करीब 11 रुपये आंकी जाती है.
