RSS के प्रचार प्रमुख ने कहा-‘एक मंदिर, एक कुआं और एक श्मशान'' के विचार का प्रवर्तक है संघ

नयी दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि वह सभी के लिए ‘एक मंदिर, एक कुआं और एक श्मशान’ के विचार का प्रवर्तक है और जाति आधारित भेदभाव को स्वीकार नहीं करता है. आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार ने कहा कि संघ प्रेम एवं करुणा की भावना […]

नयी दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि वह सभी के लिए ‘एक मंदिर, एक कुआं और एक श्मशान’ के विचार का प्रवर्तक है और जाति आधारित भेदभाव को स्वीकार नहीं करता है. आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार ने कहा कि संघ प्रेम एवं करुणा की भावना पर आधारित समरस समाज का मुखर प्रवर्तक है.

उन्होंने कहा, ‘हम चाहते हैं कि सभी लोग सौहार्द के साथ रहें जहां किसी तरह का जाति आधारित भेदभाव नहीं हो.’ कुमार ने कहा, ‘हम जाति आधारित भेदभाव को स्वीकार नहीं करते हैं. संगठन की स्थापना के बाद से ही आरएसएस ‘एक मंदिर, एक कुआं और एक श्मशान’ के विचार का प्रवर्तक रहा है.’ उन्होंने मीडिया में आयी उन खबरों को आधारहीन बताया जिसमें कहा गया है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में आंतरिक बैठक में कहा था कि भाजपा नेताओं का दलितों के घर जाना और खाना खाना पर्याप्त नहीं है तथा नेताओं को दलितों को अपने घरों में भी आमंत्रित करना चाहिए. कुमार ने कहा कि पिछले कुछ दिनों में ऐसी कोई बैठक नहीं हुई.

साल 2014 में दशहरे के मौके पर संघ के वरिष्ठ प्रचारकों ने इस बात पर जोर दिया था कि हिंदू समाज का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जिसमें जातियों का भेदभाव मिट जाये, जहां जातियों के चलते गांवों में अलग-अलग कुएं, अलग-अलग मंदिर और अलग-अलग श्मशान ना हों. संघ के वरिष्ठ प्रचारक एकात्म यात्रा के दौरान यह कह चुके हैं कि हमें समाज के उस वर्ग को करीब लाना होगा जो हमसे दूर है. संघ ‘एक मंदिर, एक कुआं और एक श्मशान’ अभियान को उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे प्रदेशों में आगे बढ़ा रहा है. आरएसएस के सेवा विभाग ने इस उद्देश्य के लिए सामाजिक समरसता एवं सद्भाव अभियान चलाने का निर्णय किया है. इस उद्देश्य के लिए विभिन्न संतों एवं साधु समाज का सहयोग लिया जायेगा. इस वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर मध्यप्रदेश में इस तरह के एक अभियान की शुरुआत की गयी जो अगले साल मकर संक्राति तक चलेगी.

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