शरीर की कमजोरी को दूर करता है चित्रक

चित्रक मुख्यत: पहाड़ी स्थानों व जगलों में पाया जाने वाला प्रमुख औषधीय पौधा है़ यह पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, खासिया पहाड़,सिक्कम, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यों में पाया जाता है़. इसका वानस्पतिक नाम पलम बैंगो जिलेनिका है़ यह पलमबोजीनेसी परिवार का पौधा है़ विभिन्न भाषाओं में इसे भिन्न नामों […]

चित्रक मुख्यत: पहाड़ी स्थानों व जगलों में पाया जाने वाला प्रमुख औषधीय पौधा है़ यह पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, खासिया पहाड़,सिक्कम, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यों में पाया जाता है़. इसका वानस्पतिक नाम पलम बैंगो जिलेनिका है़ यह पलमबोजीनेसी परिवार का पौधा है़ विभिन्न भाषाओं में इसे भिन्न नामों से जाना जाता है़.

संस्कृत : चित्रक, अग्नि, दहन पाचन संस्थान पर काम करने के कारण

हिंदी : चीता, चित्रक

मराठी : चित्रमूल

गुजराती : चित्रो

बंगला : चीता

तेलगु : चित्रमूल

अंगरेजी : लेडवर्ट

ये हैं प्रजाति

पुष्पभेद के अनुसार इसकी तीन जातियां है : श्वेत, रक्त, नीला. परंतु श्वेत व रक्त चित्रक की उपलब्धता के कारण इसका प्रयोग ज्यादा किया जाता है़ इसका पौधा बहुवर्षीय, झाड़ीनुमा, चार से छह फुट ऊंचा होता है़ तना गोल, पतला व हल्के भूरे रंग का होता है़ पत्ते एकांतर, तीन इंच लंबे, 1.5 इंच चौड़े व हरे रंग का होता है़ पुष्प गुच्छों में पुष्पदंड चार से 12 इंच लंबा अजेक शाखा से युक्त श्वेत या लाल रंग के होते है़ं शीतकाल सितंबर से नवंबर माह में लगते है़ं पुष्प रोएदार होते है़ं फल शिम्बी के जैसा लंबा व गोल होता है़ फल के अंदर एक लंबा बीज होता है़ जड़ मोटे व गुच्छे में होती है़ बाहर से भूरा व अंदर से सफेद रंग का होता है़

उपयोगी भाग : जड़ व तना

यह है उपयोग

यह कफवात शामक है़ स्वाद में कड़वा होता है़ यह लीवर की क्रिया को सुधारता है, जिससे पाचन क्रिया ठीक होती है़ स्वास्थ्य वृद्धि होती है़ यह ज्वर में उपयोगी है़ इसमें प्रयोग से ज्वर ठीक होता है़ ज्वर के बाद की कमजोरी को दूर करता है़ इसकी जड़ के छिलका के प्रयोग से भूख बढ़ती है़ यह बदहजमी, पेचिश व चर्म रोग में लाभदायक है़ यह स्वेदजनन है़ यह पौधा त्वचा रोग को नष्ट करता है़ यह जोड़ों के दर्द, उल्टी, घाव, खुजली आदि में उपयोगी है़

बवासीर : इसकी जड़ का चूर्ण एक ग्राम दही या छाछ के साथ प्रयोग करना चाहिए़

चर्म रोग : इसके जड़ का चूर्ण सिरका व दूध के साथ मिला कर लेप किया जाता है़

मधुमेह : इसकी जड़ की छाल का काढ़ा प्रतिदिन प्रयोग में लाया जाता है़

दस्त व अतिसार : इसके मूल का चूर्ण एक दो ग्राम दिन में तीन बार प्रयोग करना चाहिए़

राेग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने व पेट की कृमि दूर करने में इसकी जड़ का चूर्ण घी, शहद, दूध या पानी के साथ प्रतिदिन प्रयोग करना चाहिए़

नीलम कुमारी

टेक्निकल ऑफिसर झाम्कोफेड

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