अगर गर्भ में हो बच्‍चा उलटा तो डिलीवरी में रखें इन बातों का खास ख्‍याल

गर्भ में बच्चा अपनी पोजीशन बदलता रहता है. समय पूरा होने पर सेफैलिक पोजीशन (cephalic position) में आ जाता है. यानी कि बच्चे का सिर नीचे और पैर ऊपर की तरफ. जन्म के समय बच्चे को सिर की तरफ से ही निकाला जाता है. तीन से पांच फीसदी मौकों पर बच्चे का सिर ऊपर की […]

गर्भ में बच्चा अपनी पोजीशन बदलता रहता है. समय पूरा होने पर सेफैलिक पोजीशन (cephalic position) में आ जाता है. यानी कि बच्चे का सिर नीचे और पैर ऊपर की तरफ. जन्म के समय बच्चे को सिर की तरफ से ही निकाला जाता है. तीन से पांच फीसदी मौकों पर बच्चे का सिर ऊपर की ओर होता है. इस पोजीशन को ब्रीच पोजीशन (breech position) कहते हैं.

यह प्रेगनेंसी के 37 से 40 सप्ताह के बीच हो सकता है. इस पोजीशन को प्रसव के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता. इस पोजीशन में सिर अटकने का खतरा बना रहता है. इसमें बच्चे को ऑक्सीजन की कमी का खतरा भी होता है. इसके अलावा बच्चे की गर्भनाल पर भी दबाव पड़ता है, जिससे ऑक्सीजन बंद हो जाता है. ऐसी स्थिति में मरीज को सर्जरी की सलाह दी जाती है.

हालांकि, ऐसा नहीं है कि इस हालात में नॉर्मल डिलिवरी नहीं हो सकती है. चूंकि, बच्चों का सिर शुरुआत में बड़ा होता है और धर छोटा, इसलिए प्रसव के दौरान अनहोनी से बचने के लिए सर्जरी की सलाह दी जाती है.

जांच के लिए कर सकते हैं अल्ट्रासाउंड : जांच के दौरान बच्चे का पोजीशन का अनुमान डॉक्टर लगा लेते हैं. इसके लिए वे अल्ट्रासाउंड की मदद लेते हैं. प्रेगनेंसी के शुरुआती दिनों में अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह डॉक्टर नहीं देते हैं. क्रिटीकल कंडीशन होने पर दो सप्ताह के अंतराल पर भी अल्ट्रासाउंड कराना पड़ता है.

उपाय और सलाह :

– 36वें से 37वें हफ्ते में बच्चे को घुमा कर उसके सिर को सेफैलिक पोजीशन में किया जा सकता है.

– यह महिला के लिए थोड़ा पीड़ाजनक है, पर 40-50 प्रतिशत केस में यह उपाय सफल पाया गया है (यदि इसमें कोई खास गतिरोध नहीं हो).

– बीपी बढ़े होने, रक्तस्राव हो या फिर बच्चा स्वस्थ नहीं हो, तो इसकी सलाह नहीं दी जाती है. इसके अलावा यदि इससे पहलेवाला बच्चा सीजेरियन तरीके से हुआ हो, तो भी इसकी सलाह नहीं दी जाती है.

– ब्रीच कंडीशन में बच्चे की डिलेवरी के समय हमेशा एक्सपर्ट डॉक्टर का सहारा लेना चाहिए क्योंकि उन्हें पता होता है कि बच्चे के सिर, हाथ और पांव को कैसे निकालना है. साथ ही उन्हें नाल की भी पूरी जानकारी होती है.

– एक्सपर्ट डॉक्टर बच्चे के हार्टबीट पर हमेशा नजर रखते हैं. उसके डिहाड्रेशन की स्थिति का भी ध्यान रखते हैं.

– साथ ही इस तरह के कंडीशन में डिलिवरी से पहले ही शिशु रोग विशेषज्ञ को वहां मौजूद रहना आवश्यक होता है.

डॉ मीना सामंत, प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञ कुर्जी होली फेमिलीहॉस्पिटल, पटना से बातचीत पर आधारित.

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