-वाशिंगटन डीसी से हरिवंश- 24.09.94 की सुबह नींद विमान में ही खुली. डेल्ट एयरलांइस, अमेरिका विमान सेवा है. पैन एम दशकों पूर्व खत्म हो गया. अब डेल्ट एयरलांइस हैं. दिल्ली-फ्रैंकफर्ट की यात्रा है. दिल्ली विमान रात 2.40 पर उड़ा लगभग सुबह 3.00 बजे. विमान में लगे टीवी सेट पर सूचनाएं आती हैं. फ्रैंकफर्ट-दिल्ली दूरी 3723 […]
By Prabhat Khabar Digital Desk | Updated at :
-वाशिंगटन डीसी से हरिवंश-
24.09.94 की सुबह नींद विमान में ही खुली. डेल्ट एयरलांइस, अमेरिका विमान सेवा है. पैन एम दशकों पूर्व खत्म हो गया. अब डेल्ट एयरलांइस हैं. दिल्ली-फ्रैंकफर्ट की यात्रा है. दिल्ली विमान रात 2.40 पर उड़ा लगभग सुबह 3.00 बजे. विमान में लगे टीवी सेट पर सूचनाएं आती हैं. फ्रैंकफर्ट-दिल्ली दूरी 3723 मील है. अमेरिका अब भी मील पैमाना कायम रखे हुए हैं. उनके यहां किलोमीटर,मीटर, लीटर का प्रचलन नहीं हो पाया है. पुराना टेक है. फिर भी अपनी उस पहचान को अमेरिका कायम रखे हुए है. यह संकेत है कि तीसरी दुनिया के देशों की तरह आधुनिकता के कथित प्रवाह में भी अपना पुराना रूप, रस, गंध वह नहीं छोड़ा, जो वह गढ़ता है, वही दूसरे देशों के लिए आधुनिकता का पैमाना है.
दिल्ली से विमान के उड़ते ही सूचना दी जाती है. उड़ान 9 घंटे 13 मिनट में फ्रैंकफर्ट पहुंचेगा. तेरह मिनट का तात्पर्य है तेरह. चौदह या पंद्रह न होना. अमेरिका की ताकत का एक राज यह भी है. विमान में संकेत से बताया जाता है कि फ्रैंकफर्ट तक जाने का मार्ग क्या है. टीवी पर साफ-साफ तसवीर आती है. इयरफोन में स्पष्ट आवाज विमान पाकिस्तान के सिंध इलाके से गुजरेगा. देर तक नींद नहीं आती. जो अपना मुल्क था. जिसमें आज भी अपने लोग बसते है. जिनकी पीड़ा, जिनका दुख-दर्द अपना लगता है, आज वे कितनी दूर हो गये हैं. दोनों (भारत-पाक) के शासकों के सौजन्य से.
इच्छा होती है कि इस देश की धरती को नजदीक से देखता. अंधेरे में 8000-9000 फीट नीचे देखने की ललक है. पर एक शून्य, डरवाना अंधेरे के सिवा और क्या है? अचानक विमान परिचारिका आ कर कहती हैं, रात का समय है. खिड़की बंद कर लें, रोशनी बाहर दिखाई न दे. आसमान में भी भय है.
सुबह नींद खुलती है. पहली बार इतना बड़ा रेगिस्तान देखता हूं. सूर्य की किरणें पसर रही हैं. कहीं-कहीं लीक जैसा लगता है. सोच कर सिहरन होती है. फिर अथाह समुद्र. अचल और निर्विकार दिखता है. फिर पहाड़ों की श्रृंखला. शायद अफगानिस्तान की सरहद पार कर रहे हैं. विशालकाय पहाड़ों पर छोटी-छोटी बस्तियां हैं. यूरोप के पहाड़ों पर करीने से बसी बस्तियां हैं. मानव श्रम और सृजन की क्षमता का अद्भुत प्रतीक. सृजन, चुनौती है. संकल्प का प्रतिरूप है. पौरूष की पहचान. भारत शायद सृजन का यह रूप भूल गया है. हिंदी इलाकों, खासतौर से बिहार में तो पिछले 45 वर्षों में सृजन की भूमि ही बंजर हो गयी है.
आठ बज रहे हैं. एक घंटे बाद जहाज फ्रैंकफर्ट में उतरेगा. पहाड़ों के बहुत ऊपर विमान उड़ रहा है. खूब धूप है, पर चांद दिख रहा है. साफ और बहुत सुंदर. नीचे पहाड़ों पर कहीं-कहीं घने बादल छाये हैं दूर-दूर तक पहाड़ों की बड़ी-बड़ी चोटियां दिखाती हैं. रंग मटमैला. धुंध में लिपटीं. शायद सदियों से. दुनिया कितनी सुंदर है. विस्तृत-व्यापक. हम कितने छोटे हैं? जहां ठौर है, वही हमारी दुनिया है. पृथ्वी का यह फैलाव, समुद्र की व्यापकता, पहाड़ों की गोद, नीले अक्षत आसमान का सौंदर्य और फिर पूरा सौर्यमंडल. यह उदात्त दृष्टि जीवन का संकुचन खोलती है. संकीर्णता से ऊपर उठाती है. संघर्ष-हिंसा और नफरत से भरे समाज में शायद यही सार्वभौम दृष्टि के ठेकेदार बन गये हैं कथित संत, महात्मा या आध्यात्म की दुकान चलानेवाले. इस अद्भुत विरासत को इन ठेकेदारों के दायरे से निकालने में ही कल्याण है.
विमान उतरने में घंटे भर की देर है. 11900 मीटर की ऊंचाई पर विमान उड़ रहा है.लगभग 40,000 फीट ऊपर. 848 किमी प्रति घंटा की रफ्तार है. विमान के बाहर (माइनस) – 61 डिग्री तापमान है. बगदाद के ऊपर उड़ते हुए, बुडापेस्ट-वियना के ऊपर से गुजरा. आल्पस पर्वत श्रृंखला की बगल से. इंस्तांबुल के ऊपर भी. इन स्थानों का कितना बहुरंगी इतिहास रहा है. भरा-पूरा, पर आज आधुनिकता की रौ में कितने लोगों को यह याद है!
विमान भारतीय समय से 9.00 बजे ही उतर गया. फ्रैंकफर्ट में सुबह के आठ बजे है. खूबसूरत हवाई अड्डों में से एक.
एक ही साथ पांच-पांच जहाजें उड़ान भरती-उतरती हैं.फ्रैंकफर्ट से रवानगी. दिन 2.08 में समय था, 1.20 का. हवाई पट्टियों की व्यस्तता के कारण विलंब. विमान 767-300 है. विशालकाय. राइन नदी के किनारे-किनारे. ब्रूसेल्स के ऊपर से. राजधानी बॉन के बगल से. विमान उड़ता है. 4.08 में वाशिंगटन पहुंचने की घोषणा. 35000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान है.
फ्रैंकफर्ट विशाल हवाई अड्डा है. अंदर से अति खूबसूरत और साफ-सुथरा. बंबई-दिल्ली इसके गांव लगते हैं. हवाई अड्डे के ऊपर आसपास घने जंगल दीखते हैं. जर्मनी में काफी जंगल है. ग्रीन पार्टी का आंदोलन रंग ला रहा है. दूसरी ओर भारत के आबाद जंगल उजड़ रहे हैं. फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे के बाहर विमानों की भरमार है, तो हवाई अड्डे के अंदर सुंदर दुकानों की . भारी तादाद में यात्री है. भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी अच्छी संख्या में है.
दुनिया में प्रतिभा, क्षमता और काम में इस उपमहाद्वीप के लोग कहीं भी चमक सकते हैं. पर अपने-अपने मुल्क में असहाय हैं. किसी भी काम को सुंदर और प्रेरक तरीके से करना कला है. यह कला हमें सीखनी पड़ेगी.