छोटा डंक बड़ा खतरा

हर वर्ष मलेिरया के कारण लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है. यह रोग मच्छरों के काटने से होता है. अब यह रोग ड्रग रेिजस्टेंट भी हो गया है, जो गंभीर िस्थति में सेरेब्रल मलेिरया का कारण बन जाता है. इसलिए मच्छरों से बचाव और समय रहते इलाज जरूरी है. इसके प्रति जागरूकता लाने […]

हर वर्ष मलेिरया के कारण लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है. यह रोग मच्छरों के काटने से होता है. अब यह रोग ड्रग रेिजस्टेंट भी हो गया है, जो गंभीर िस्थति में सेरेब्रल मलेिरया का कारण बन जाता है. इसलिए मच्छरों से बचाव और समय रहते इलाज जरूरी है. इसके प्रति जागरूकता लाने के लिए हर वर्ष 25 अप्रैल को ‘वर्ल्ड मलेरिया डे’ मनाया जाता है. िवशेषज्ञ दे रहे हैं जानकारी.
डॉ राजीव दुग्गल
कंसल्टेंट फिजिसियन, अभियान वेलनेस सेंटर, दिल्ली
पूरे विश्व में मलेिरया के कारण हर वर्ष लाखों लोगों को जान गंवानी पड़ती है. इसका वाहक मच्छर होने के कारण इसे रोकना मुश्किल होता जा रहा है. अब यह रोग पहले से कहीं अिधक खतरनाक हो गया है, क्योंिक अब इसका परजीवी ड्रग रेिजस्टेंट हो गया है. इस कारण पुरानी दवाओं जैसे-क्लोरोक्वीन आदि का इस रोग पर असर नहीं हो पा रहा है. इसके िलए अब कुछ नयी दवाएं आयी हैं, मगर फिर भी रोग के उपचार में काफी सतर्कता बरतनी पड़ती है.
क्या है ड्रग रेजिस्टेंट मलेरिया
मलेरिया प्लाज्मोडियम नाम के परजीवी से होनेवाली बीमारी है. यह एनोफिलीज नामक मादा मच्छर के काटने से होता है. एनोफिलीज मादा मच्छर रुके हुए पानी में पैदा होते हैं. मलेरिया के लक्षण मच्छर के काटने के लगभग सात दिनों के बाद नजर आने शुरू होते है.
ऐसा परजीवी की संख्या शरीर में बढ़ने के कारण होता है. यह मच्छर भी गंदगी में पनपते हैं. कई बार इलाज कराने के बाद भी मलेरिया से राहत नहीं मिल पाती है. ऐसा ड्रग रेजिस्टेंट होने की वजह से होता है. लगातार एक ही तरह की दवाओं का प्रयोग होने और इसका पूरा डोज नहीं लेने से इसका परजीवी ड्रग रेिजस्टेंट हो जाता है. ऐसे में दवाओं का असर नहीं होने से मरीज की हालत अधिक खराब होने लगती है. हालांकि अब कुछ ऐसी दवाइयां आ गयी हैं, जो ड्रग रेजिस्टेंट मलेरिया से निबटने में कारगार साबित हो रही हैं. लेकिन इसके लिए समय पर इलाज काफी जरूरी है.
कैसे होती है पुिष्ट
ड्रग रेजिस्टेंट और साधारण मलेरिया के लिए रैपिड टेस्ट नामक जांच करानी जरूरी है. इसमें खून में प्लाज्मोडियम नामक परजीवी की मौजूदगी का प्रतिशत निकाला जाता है. इससे रोग की गंभीरता का अनुमान लगाया जा सकता है. प्रतिशत कम रहने पर इसके लक्षण नहीं भी प्रकट हो सकते हैं. इसके अलावा पॉलीमरेज चेन रिएक्शन भी करा सकते हैं.
इलाज की प्रक्रिया
ड्रग रेजिस्टेंट मलेिरया की एक खािसयत यह है िक इसमें जरूरी नहीं कि ठंड के साथ हर दूसरे या तीसरे दिन बुखार आये. इलाज के लिए पांच-छह दवाओं की जरूरत पड़ रही है.
वैसे अगर इलाज लगातार हो, तो मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो जाता है. शुरुआत में डॉक्टर जांच करा कर एंटी मलेरियल ड्रग्स से मलेरिया पर काबू पाने का प्रयास करते हैं. अगर एंटी मलेरियल ड्रग्स से मलेरिया कंट्रोल नहीं हो रहा है, तो दूसरे ड्रग्स का इस्तेमाल किया जाता है. मरीज को नियमित रूप से डॉक्टर से मिल कर जांच करानी चाहिए. यदि बुखार खत्म भी हो गया है, तो भी खुद से दवाओं का सेवन करना बंद न करें. डॉक्टर से जांच करा कर ही मलेरिया की दवाएं लेनी बंद करनी चाहिए. कई बार ठीक होते-होते बीमारी का वापस लौट आना आम बात है. इसलिए ट्रीटमेंट के साथ सावधानी भी बेहद जरूरी है.
लापरवाही पड़ सकती है महंगी
यदि आप मलेरिया जोन में हैं और बुखार होने पर डॉक्टर से बिना जांच कराये घर पर ही खुद से दवाई का सेवन करते हैं, तो यह आपके लिए घातक साबित हो सकता है. इससे शुरू में बुखार चला जायेगा, मगर यह पूरी तरह से ठीक नहीं हो पायेगा. अर्थात् मलेिरया के परजीवी शरीर में मौजूद रहेंगे.
धीरे-धीरे यह बुखार विकराल रूप धारण कर लेगा. इसके अलावा बिगड़े हुए मलेरिया से आपको कई अन्य समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है. यदि मलेरिया बिगड़ जाता है, तो सेरेब्रल मलेिरया और किडनी फेल्योर होने का खतरा भी हो सकता है. इसके अलावा इस रोग में मिरगी जैसा दौरा पड़ने की भी आशंका होती है. अत: यदि आप मलेरिया जोन में हैं, तो बुखार होते ही डॉक्टर से जांच करा कर उपचार जरूर शुरू करा दें.
बातचीत व आलेख : कुलदीप तोमर
घातक है ड्रग रेजिस्टेंट मलेरिया
अब मलेरिया का एक खतरनाक रूप ड्रग रेजिस्टेंट मलेरिया सामने आया है. इस रोग में मलेिरया की पारंपरिक दवाइयों का असर नहीं हो पाता है. यह रोग यदि दिमाग तक पहुंच जाये, तो इससे सेरेब्रल मलेरिया हो सकता है और रोगी की मृत्यु भी हो सकती है. अत: मलेिरया का संदेह होते ही उपचार जरूरी है.
फेल्सिफेरम का इन्फेक्शन है जानलेवा
डॉ डी बराट
पूर्व एचओडी, मेडिसिन आइजीआइएमएस, पटना
मलेरिया के परजीवी कई प्रकार के होते हैं. इसमें फेल्सिफेरम सबसे खतरनाक है. इसी का प्रसार अधिक है और यह ड्रग रेजिस्टेंट भी हो चुका है.
मलेरिया के उपचार के लिए सबसे आसानी से उपलब्ध दवा क्लोरोक्वीन है. पहले मलेरिया का उपचार इससेहो जाता था. मगर अब मलेरिया परजीवी इस दवा के प्रति रेजिस्टेंट हो चुके हैं. पूरे साउथ इस्ट एशिया में मलेरिया परजीवी ड्रग रेजिस्टेंट हो चुका है.
यह समस्या दवा की कम डोज कम दिनों तक लेने के कारण होती है. इससे रोग पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता है और बार-बार एक ही दवाई लेने के कारण जीवाणु में म्यूटेशन हो जाता है और यह ड्रग रेजिस्टेंट हो जाता है. इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि यदि आॅफिस जाते समय बीच रास्ते में पानी बरसने लगे, तो एक-दो दिन आप परेशान होंगे, लेकिन उसके बाद आप हमेशा अपने पास छाता रखेंगे, जिससे बारिश का आपके ऊपर कोई असर नहीं होगा. यही काम परजीवी भी करता है. अगर आप पूरा डोज नहीं लेते हैं, तो परजीवी जीवित रह जाते हैं और दवाई के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं.
बच्चों और गर्भवती को है अधिक खतरा
बच्चों और गर्भवती महिलाओं में इसका खतरा अधिक होता है, क्योंकि इन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता सामान्य लोगों की तुलना में कम होती है. गर्भवती को इससे कई परेशानियां भी हो सकती हैं. एक बात यह भी ध्यान रखनी चाहिए कि किसी को यदि मलेरिया नहीं हुआ है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसे इन्फेक्शन नहीं ही हुआ होगा. कम मात्रा में परजीवी के शरीर में पहुंचने पर इसके लक्षण प्रकट नहीं होते हैं और शरीर भी इनके खिलाफ रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है.
किस प्रकार घातक है फेल्सिफेरम का इन्फेक्शन
फेल्सिफेरम के कारण होनेवाला मलेरिया काफी घातक होता है. इसके कारण दो-तीन दिन में ही रोगी की मृत्यु भी हो सकती है. इस रोग के लक्षण रोगी को भ्रमित भी कर सकते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि इसके लक्षण फ्लू जैसे होते हैं.
इसके इन्फेक्शन के कारण बुखार आ भी सकता है और नहीं भी आ सकता है. सिर दर्द और थकान होती है. लोग फ्लू समझ कर इसके उपचार में लापरवाही बरतते हैं. इस कारण यह बाद में गंभीर हो जाता है. इसका परजीवी खून में रेड ब्लड सेल्स के अंदर रहता है. यहीं विकास करता है और इसके माध्यम से पूरे शरीर में फैलता है. यह तेजी से अपनी संख्या को बढ़ा कर खून की नलियों को जाम कर देता है. यदि यह किडनी की खून की नली को जाम कर दे, तो किडनी फेल हो सकती है और रोगी की मृत्यु हो जाती है. यदि यह दिमाग में पहुंच जाये, तो इससे सेरेब्रल मलेरिया हो सकता है. अत: यदि मरीज मलेरिया जोन में है और उसे बुखार आता है, तो बुखार को रेजिस्टेंट मलेरिया मान कर ही इसका इलाज किया जाता है.
ऐसे होता है उपचार
इसका उपचार एसीटी (आर्टिमिसिलीन कॉम्बिनेशन थेरेपी) से किया जाता है. इसके लिए दो दवाइयां आती हैं – आर्टिनिथर और आर्टिसुनेट. ज्यादातर आर्टिसुनेट का इन्जेक्शन और टैबलेट का ही प्रयोग होता है. फेल्सिफेरम भी दो प्रकार का होता है. इसमें से एक प्रकार से रोग गंभीर हो सकता है और यह किडनी फेल्योर और सेरेब्रल मलेरिया का कारण बन सकता है और दूसरे प्रकार में मरीज ज्यादा गंभीर नहीं होता है.
पहले प्रकारवाले में मरीज को सेरेब्रल मलेरिया हो सकता है. इसमें मरीज को खास तौर पर सिर में दर्द और चमकी आ सकती है. ऐसे में रोगी को आर्टिसुनेट दिया जाता है. अगर आर्टिसुनेट से रोगी को फायदा नहीं हो, तो क्विनिन दी जाती है. दूसरे प्रकार में आर्टिनिथर और ल्यूमेसेंट्रिन का कॉम्बिनेशन दिया जाता है.
बातचीत : अजय कुमार
जीन मोडिफाइड मॉस्किटो
डॉ केके अग्रवाल
सीनियर कंसल्टेंट फीजिशियन, मूलचंद अस्पताल, दिल्ली
मच्छर और मच्छर जनित रोगों से बचाव के लिए नयी तकनीक पर तेजी से रिसर्च चल रहे हैं. ऐसी ही एक नयी तकनीक है जीन मोडिफाइड मॉस्किटो. इस तकनीक के माध्यम से जनलेवा बिमारियां फैलानेवाले मच्छरों को आसानी से खत्म किया जा सकता है.
जीन मोडिफाइड मॉस्किटो नाम की इस तकनीक में मच्छरों के जीन में इस प्रकार के बदलाव किये जा रहे हैं, जिससे ये मलेरिया परजीवी के वाहक नहीं बन सकेंगे. ऐसा इसमें पैरासाइट रेजिस्टेंट जीन डालने के कारण संभव हो पाया है. इस तरह की मादा मच्छर जब नये मच्छरों को जन्म देंगीं, तो उनमें भी यह गुण मौजूद रहेगा. ऐसे मच्छरों से मानव में कोई भी रोग नहीं पनप सकेगा.
अभी यह काम लैब में किया जा रहा है. इस तरह के नये मच्छरों के वातावरण में पहुंचने से पुराने मच्छर, जो मानव के लिए जनलेवा साबित हो रहे हैं, की संख्या धीरे-धीरे कम हो जायेगी. यह बिल्कुल ऐसा है जैसे-किसी दफ्तर में कर्मचारियों को धीरे-धीरे करके पूरी तरह से बदल दिया जाये. मान लीजिए किसी दफ्तर में 15 कर्मचारी हैं, तो सबसे पहले पांच नये कर्मचारी शामिल कर लिये जाएं, उसके बाद पांच निकाल दिये जायेंगे. यही प्रक्रिया पुन: दोहरायी जायेगी. ऐसा करके धीरे-धीरे सभी कर्मचारी बदल जायेंगे. यूरोपीय देशों में यह तकनीक बड़े स्तर पर इस्तेमाल की जा रही है और इसके इस्तेमाल से वहां अच्छा रिस्पांस भी मिल रहा है. भारत में अभी इस तकनीक पर रिसर्च चल रहा है.
भारत में क्या है समस्या
हमारे देश में इस तकनीक को लागू करने में कई कई तरह की अड़चनें हैं. सबसे बड़ी समस्या पुराने मच्छरों को पनपने से रोकने की है. यदि रोग जनित मच्छरों की संख्या पर काबू नहीं पाया जायेगा, तो यह तकनीक फेल हो सकती है. दूसरा देश में बड़े स्तर पर इस तकनीक को लागू किया जाये, तभी यह सफल हो पायेगी. इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा कदम उठाये जाने की जरूरत है.
लक्षणों को पहचानना जरूरी है
– तेज बुखार रहना
– उल्टी लगना व जी मिचलाना
– कमजोरी महसूस होना
– थकावट रहना
– खून की कमी
– आंखों में पीलापन आना
– ट्रीटमेंट के बाद भी मरीज को आराम न हो पाना
कब होता है सेरेब्रल मलेरिया
मलेरिया के ट्रीटमेंट में यदि देरी हो जाये या इस पर ड्रग्स का असर न हो, तब इसके परजीवी का प्रतिशत शरीर में काफी बढ़ जाता है. यह िदमाग में भी पहुंचता है. तब मलेरिया सेरेब्रल मलेरिया में बदल जाता है.
यह सीधे मस्तिष्क को प्रभावित करता है. इसके कारण मस्तिष्क की नसें जाम हो जाती हैं. इसे काबू करना अत्यधिक कठिन होता है. यदि दो से तीन दिन के अंदर इस पर काबू न पाया जा सके, तो मरीज बेहोशी की हालात में पंहुचने लगता है और मल्टिपल आॅर्गेन फेल्योर होने का खतरा भी बढ़ जाता है. इस अवस्था में दो-तीन दिन में रोगी की मृत्यु भी हो सकती हैै.
प्राकृतिक उपायों से भागेंगे मच्छर
– नीम के तेल को नारियल तेल के साथ मिला कर त्वचा पर लगाने से मच्छर से खुद को बचा सकते हैं. यह मिश्रण आठ-दस घंटे तक काम करता है.
– नीबू और नीलगिरी के तेल को मिला कर त्वचा पर लगाने से भी मच्छरों से बचा जा सकता है. इस मिश्रण में प्राकृतिक एंटीसेप्टिक के गुण होते हैं.
– लौंग के तेल को भी नारियल तेल के साथ मिला कर खुली त्वचा पर लगा कर मच्छरों से निजात पायी जा सकती है. लौंग की तेज गंध के कारण मच्छर आपके शरीर से दूर ही रहते हैं.
– घर में अजवाइन पाउडर छिड़क कर आप घर के मच्छरों को भगा सकते हैं.
– लहसुन की फलियों को पीस कर पानी
में उबाल लें. इस घोल से पूरे घर में
छिड़काव करें, ऐसा करने से मच्छर घर में नहीं आयेंगे.
– तुलसी के पौधे को खिड़की और गेट के पास रखें, इससे मच्छर घर में प्रवेश नहीं करते हैं.

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