पटना : दुनिया में सबसे प्यारा रिश्ता मां और बच्चे का होता है. लेकिन अब मां बनना भी बेहद खर्चीला होता जा रहा है. इसका कारण डिलिवरी के लिए सिजेरियन ऑपरेशन का बढ़ता ट्रेंड है. समाज के संपन्न तबके के बीच सिजेरियन की लोकप्रियता चिंताजनक रूप से बढ़ती जा रही है. नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 18 प्रतिशत बच्चे सिजेरियन से हो रहें हैं. आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में ही सिजेरियन डिलिवरी दोगुनी बढ़ी है. आने वाले समय में इसके और भी बढ़ने का अनुमान है.
इस भारी डिमांड के कारण सिजेरियन ऑपरेशन पर खर्च भी बढ़ता जा रहा है. निजी अस्पतालों में यह खर्च 30 हजार से लेकर दो लाख तक हो सकता है. इससे मिडिल क्लास की पॉकेट पर असर पड़ रहा है. नतीजा यह भी हो रहा है कि कई ऐसे कपल जो अपना दूसरा बच्चा चाहते हैं वह सिजेरियन में होने वाले खर्च को देखते हुए बच्चे को टाल रहें हैं. देश में इस तरह के ऑपरेशन के बढ़ने से सरकार भी चिंतित है. कुछ समय पहले राज्यसभा में केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने एनएचएफएस की चौथी रिपोर्ट से सदन को अवगत कराया था. स्वास्थ्य मंत्रालय इस आंकड़े की गंभीरता को समझते हुए राज्यों को दिशा – निर्देश जारी कर चुका है.
क्यों बढ़ रहें हैं सिजेरियन के मामले : सिजेरियन की बढ़ती संख्या पर एसकेएमसीएच, मुजफ्फरपुर में प्रोफेसर डॉ आभा रानी सिन्हा कहती हैं कि समाज में तेजी से बदलाव आ रहा है. अब छोटी फैमिली होने के कारण कपल्स रिस्क लेना नहीं चाहते. अक्सर वह खुद कहते हैं कि आप सिजेरियन ही कर दें. कई महिलाएं भी लेबर पेन से बचना चाहती हैं. कई तो अपनी पसंद की डेट में डिलिवरी करवाने के लिए यह करवाते हैं. जिन महिलाओं का पहला बच्चा सिजेरियन से होता है उनका दूसरा बच्चा भी अक्सर सिजेरियन से ही करना पड़ता है. ऐसे में अगर पहले में ही गैरजरूरी होने पर रोक दिया जाता तो दूसरी बार इसकी नौबत नहीं आने की संभावना रहती. सिजेरियन का एक बड़ा कारण एज फैक्टर भी है, अब महिलाएं 30 के बाद भी बड़ी संख्या में मां बन रहीं हैं.
इसके कारण बॉडी नाॅर्मल डिलिवरी नहीं करा पाती. कई महिलाएं खासतौर से शहरी और संपन्न तबके की गर्भावस्था के दौरान फिजिकल वर्क नहीं करती इससे भी नॉर्मल डिलिवरी में दिक्कत आती है. इस सवाल के जवाब पर कि क्या डॉक्टर अपने फायदे के लिए सिजेरियन को बढ़ावा देते हैं डॉ आभा रानी सिन्हा कहती हैं कि हम डॉक्टर पहले उन्हें समझाते हैं कि गैर जरूरी सिजेरियन करना सही नहीं होगा. डॉक्टर मां और बच्चे के स्वास्थ्य और जान बचाने के लिए सिजेरियन का फैसला लेते हैं. डॉक्टर दिल और दिमाग दोनों के साथ फैसला लेते हैं. हालांकि वह स्वीकार करती हैं कि इस पर निंयंत्रण करने वाली कोई खास संस्था नहीं है.
सिजेरियन से ये हो सकते हैं नुकसान
गाइनोकॉलजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) डॉक्टरों के मुताबिक सिजेरियन के बाद रिकवरी में वक्त लगता है जबकि नॉर्मल डिलीवरी के बाद महिला बहुत जल्दी अस्पताल से घर जाने लायक हो जाती है. सिजेरियन डिलीवरी के दौरान कई बार बहुत ज्यादा खून भी निकल जाता है. इससे कई बार कमजोरी, शरीर में दूध न बनने और डिप्रेशन जैसी परेशानी भी हो सकती हैं. सिजेरियन के बाद औरतों में मोटापा और डायबिटीज होने की आशंका भी कई गुना बढ़ जाती है.
सिजेरियन से बचते हैं अच्छे डॉक्टर
आइएमए बिहार के पूर्व प्रेसीडेंट डॉ सहजानंद सिंह कहते हैं कि अच्छे डॉक्टर तुरंत सिजेरियन नहीं करते. बच्चे और मां की जान बचाने के लिए सिजेरियन का फैसला डॉक्टर लेते हैं. पढ़ा लिखा और सपंन्न तबका इसे ज्यादा करवाता है. वह कहते हैं कि स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ होने वाली मीटिंग में आइएमए की ओर से अक्सर कहा जाता है कि आप गैर जरूरी सिजेरियन डिलिवरी कराने से बचें.
नॉर्मल डिलिवरी में लगता है समय
विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन कहती है कि गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए ज्यादा वक्त दिया जाए. इसमें ये भी कहा गया है कि बच्चे के जन्म के लिए ‘वन सेंटीमीटर रूल’ व्यावहारिक नहीं हैं और इसे पत्थर की लकीर नहीं माना जा सकता. प्रसव से पहले बच्चा हर घंटे एक सेंटीमीटर नीचे की तरफ खिसकता है. इसे ही मेडिकल साइंस की भाषा में ‘वन सेंटीमीटर रूल’ कहते हैं.
