मेरी प्रेम कहानी की शुरुआत वैसे ही थी जैसे आप सबकी हुई होगी. मैं आम सा दिखने वाला साधारण लड़का, जिसे कोई पलट कर भी ना देखे. मेरे प्रेम में कुछ खास था, तो सिर्फ तुम थी. बला की खूबसूरत. कोई देख ले, तो नजर हटाने का मन ना करे. मेरी और आपकी प्रेम कहानी में, ये फर्क हो सकता है कि वह आज की तरह डिजिटल नहीं था. ये उस जमाने का प्यार था, जो नोटबुक में छिपकर सफर करता था. आज तो बस टाइप किया और कह दिया सबकुछ. हमारे जमाने में भावनाएं जाहिर करने के लिए शब्द ढूंढने पड़ते थे. अच्छी हैंडराइटिंग और कई रंग के पेन, आपकी भावनाएं जाहिर करने में मदद करते थे. फिर उतनी ही मेहनत उस तक पहुंचाने में. मां-बाप की मौजूदगी में बेटी को नोटबुक में छिपाकर प्रेम पत्र देना आसान है क्या? मुझे ये पता नहीं कि कैसे और कब, लेकिन उसे देखने के बाद हिम्मत आ गयी थी मुझमें. इतनी भी नहीं कि उससे जाकर कह सकूं कि सुनो प्यार करता हूं तुमसे, लेकिन आंखों ही आंखों में कई बार कहा था मैंने. प्यार की शुरुआत की कहानी फिर कभी. बस इतना समझ लीजिए कि प्रेम पत्र से शुरू हुआ सफर रिलायंस के फ्री कॉलिंग तक पहुंच गया था. ये हो सकता है मेरी कहानी आपसे मिलती जुलती हो, लेकिन ईश्वर ना करे आपकी कहानी मेरी कहानी की तरह मोड़ ले.
होली के दिन हर बार की तरह इस बार भी मैं तुम्हारे घर पर था. तुम्हारी मां मुझे हर त्योहार में इतने प्यार से बुलाती कि मैं मना नहीं कर पाता. फिर इस बार तो उन्होंने तुम्हारे आने की खबर देते हुए कहा- बेटा श्रेया आयी है कल ही, तुम घर आओ, आते ही उसने तुम्हारे लिए पूछा, राजवीर आता है? बेटा मैंने बता दिया है कि तुम हर सप्ताह आते हो, उसके बाद तो तुम ही हो जो हमारा इतना ध्यान रखते हो. इसके पापा की दवाई, रसोई की गैस और बिजली का बिल, सबका हिसाब तो तुम्हारे पास ही है. मैंने श्रेया से कहा कि कल होली है, तुम जरूर आओगे. श्रेया नाराज है तुमसे. कह रही है, जब भी फोन पर मैंने बात करनी चाही तुमने फोन ही रिसीव नहीं किया. और मैंने भी बता दिया है कि तुम हमेशा उसके लिए पूछते हो.
मैंने ये भी बता दिया कि कई बार तुम हमारे घर पर होते थे जब इसका फोन आता था और तुम हर बार मुझे मना कर देते थे. मुझे पता है कि तुम इसलिए नाराज हो कि इसकी शादी की बात हमने तुम्हें देर से बतायी. बेटा हम क्या करते? अचानक रिश्ता आया और श्रेया के पापा की बीमारी तो तुम जानते हो. मैं श्रेया का नाम सुनकर ही चुप हो गया था. समझ नहीं आ रहा था क्या कहूं. मन तो था कि कह दूं कि आंटी नहीं आ पाऊंगा, शहर से बाहर हूं. किसी काम से कल ही शहर निकल रहा हूं या कोई और बहाना बना लूं, लेकिन पता नही क्यूं मैंने दिमाग की सुगबुगाहट सुनी ही नहीं. श्रेया का नाम सुनकर ही दिल हावी हो जाता था पहले भी और आज भी, कह दिया, हां आंटी कल जरूर आऊंगा. इतना कहकर मैंने फोन रख दिया. डर था कहीं श्रेया मां से फोन छीनकर बात ना करने लगे.
फोन रखा तो उन पुरानी यादों में खो गया. प्यार का यही महीना हमारे अलग होने की यादों से जुड़ा था. 14 फरवरी रात के एक बजे तक फोन पर बात की थी हमने. सुबह से तुम गायब थे. दोपहर के एक बजे तक मेरे 100 से ज्यादा फोन का और 50 से ज्यादा एसएमएस का कोई जवाब नहीं दिया था तुमने. 1 बजकर 5 मिनट पर एक मेसेज आया, लिखा था- मेरे घर की छत पर आकर मिलो. मैं भागा-भागा घर पहुंचा और सीधा छत पर, तुम्हें देखते ही समझ गया था कि ये आखिरी मुलाकात है. लाल आंखें और बहते आंसुओं ने जैसे सबकुछ कह दिया था. तुम दौड़कर मेरी तरफ आयी और गले लगा लिया. मैंने इतने कसकर कर पकड़ रखा था, तुम्हें समझना चाहिए था मैं रोक रहा हूं तुम्हें. मत जाओ… तुम्हारी आंखों के आंसू नहीं देखना चाहता था मैं उस वक्त, बस तुम्हें महसूस कर रहा था. आंखें बंद थीं.
थोड़ा सा डर था कि कहीं तुम ये ना कह दो बस हो गया, अब जाने दो. इसी डर से थोड़ी देर बाद मैंने ही छोड़ दिया तुम्हें. मेरी आंखों में नहीं देख रहे थे तुम. नजरें झुक गयी थीं तुम्हारी. मैं आखिरी बार ही सही अपना चेहरा देखना चाहता था तुम्हारी आंखों में. शायद उस वक्त तुम्हारी झुकी आंखें भी कह रही थीं अब यह सपना तोड़ दो.
मुझे देर हो जायेगी. मैं जाऊं? यही कहा था ना तुमने? क्या कहता मैं, उस वक्त… हां चली जाओ? कितना मुश्किल था मेरे लिए अपनी जिंदगी से कहना हां चली जाओ मुझे अकेला छोड़कर. तुमने तो मेरे जवाब का भी इंतजार नहीं किया… और अपने कदम आगे बढ़ाने लगी. धीरे-धीरे तुम मुझसे दूर जा रही थी ऐसा लगा था.
सब टूट रहा था मेरे अंदर. तुम्हारे साथ रहने के सपने, तुमसे हुई पहली मुलाकात, तुम्हारा पहली बार हाथ पकड़ना, तुम्हारा पहली बार गले लगाना, तुम्हारा पहली बार रूठ जाना, तुम्हारा पहली बार खुलकर हंसना, सब याद आ रहा था. तुम्हें दूर जाता देखकर लग रहा था अब रुकोगे, वापस मुड़ोगे और दौड़कर मेरे गले से लग जाओगे. पर तुमने तो एक बार पलट के देखा भी नहीं.
कल होली है और आज होलिका दहन. तुम्हें एक बार देखने की ललक इतनी थी कि कल का इंतजार किसे था? मैं तो आज और अभी देखना चाहता था तुम्हें. चौराहे पर आग जल रही थी. महसूस कर रहा था जैसे लपटें मेरे अंदर से उठ रही थी कहीं. मैं तुम्हारी नजरों से दूर खड़ा तुम्हारे घर के रास्ते पर पलकें बिछाये इंतजार कर रहा था. बार बार घड़ी पर नजर जा रही थी. रात के तकरीबन आठ बजकर 10 मिनट हो चुके थे. कुछ संकेंड के बाद तुम नजर आयी. चौराहे पर जल रही होलिका की रोशनी में तुम और लाल नजर आ रही थी. बाल बांध रखे थे तुमने, कभी लिपस्टिक नहीं लगाती थी तुम, लेकिन इस बार लाल रंग की लिपस्टिक तुम्हारे बदल जाने का एहसास करा रही थी. पीले रंग की साड़ी, हाथों में ढेर सारी चूड़ियां. बिल्कुल वैसी जैसी कई बार मेरे सपनों में नजर आयी थी तुम, सुबह चाय लेकर मुझे जगाती हुई. दूर खड़ा एक टक मैं तुम्हें देखा जा रहा था. तुम्हारी आंखें भी भीड़ में किसी को ढूंढ रही थी. क्या तुम्हें मेरे आसपास होने का एहसास था.
ये हमारी दूसरी मुलाकात है. पहली मुलाकात में मैं रात भर सो नहीं पाया था. क्या कहूंगा, कैसे कहूंगा और दूसरी मुलाकात में मैं खुद को कैसे रोकूंगा, कैसे बताऊंगा कि मैं खुश हूं तुम्हारे बिना. तुमसे वहां की बातें पूछूंगा, थोड़ी दूर बैठूंगा ताकि तुम्हारे बेहद पास होकर तुमसे दूर होने का एहसास ना कर सकूं. रात गुजर रही थी और मैं तुम्हारे छत पर ही लेटा तुमसे दूर जाने के बहाने ढूंढ रहा था. ये अधूरा सफर था और तुमसे मेरी दूसरी मुलाकात…
