नयी दिल्ली : तेज रफ्तार जिंदगी में चीजों को धीरे समझना, अपना नाम सुनकर कोई प्रतिक्रिया न देना, आसपास के माहौल से एकदम अलहदा रहना, गति, दिशा और ऊंचाई का अनुमान न लगा पाना आत्मकेंद्रित अथवा ऑटिज्म के शिकार लोगों के शुरुआती लक्षण हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि आॅटिज्म के शिकार लोगों को अगर सही मार्गदर्शन मिले तो धीरे-धीरे उनकी जिंदगी रफ्तार पकड़ लेती है. उनका मानना है कि शहरों में तो इस बीमारी से निबटने की दिशा में कई प्रयास हो रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय और जमीनी कार्यकर्ताओं को इससे जोड़ा जाना चाहिए, ताकि इससे निबटने की राहें आसान हो सकें.
‘एक्शन फाॅर आॅटिज्म’ की डाॅ निधि सिंघल ने बताया, कई बड़े वैज्ञानिक, चित्रकार और अभिनेता अपने बचपन में आॅटिज्म से पीड़ित रहे हैं. यदि हम जागरूकता फैला पाये तो आॅटिज्म से बच्चे को उबारने के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है. उन्होंने कहा, देश में सीखने वालों और सिखाने वालों का अभाव है. यदि हम आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, एनएनएम, सर्वशिक्षा अभियान से जुड़े लोगों और शिक्षकों को अच्छी जानकारी दें, तो ग्रामीण स्तर तक आॅटिज्म के बारे में जागरूकता फैला सकेंगे.
उन्होंने बताया कि हाल में आये मानसिक स्वास्थ्य विधेयक में आॅटिज्म को मंदबुद्धि (इंटलेक्चुअल डिसएबेलिटी) की श्रेणी में डाल दिया गया है, जबकि एक अलग तरह का विकार है. ऐसा ऐसे वक्त में किया गया जब पूरी दुनिया इससे लड़ने की तैयारी कर रही है. आॅटिज्म के बारे में सरकार को अपने आंकड़ों की सही तरह से जांच करनी चाहिए.
एक मोटे अनुमान के अनुसार, देश में डेढ़ करोड़ बच्चे आॅटिज्म से पीड़ित हैं और वर्तमान में 60 में एक बच्चा इस बीमारी से ग्रस्त है. इसको ‘आॅटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआॅर्डर’ कहा जाता है. इसके तीन स्तर होते हैं. ‘आॅटिज्म सेंटर फाॅर एक्सीलेंस’ की निदेशक डाॅ अर्चना नायर ने कहा कि शिक्षक और अभिभावक मिलकर आॅटिज्म से बच्चे को उबार सकते हैं.
इसकी थैरेपी बहुत आसान है जिसको माता-पिता भी सीख सकते हैं. हालांकि यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन उचित मार्गदर्शन और सहयोग से इसके शिकार व्यक्ति के जीवन को पटरी पर लाने में मदद की जाती है. उन्होंने कहा कि महंगे इलाज और विशेष शिक्षा होने के कारण यदि सरकार इससे लड़ने में सहयोग करे तो राह आसान हो सकती है.
ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभाव में मर्ज का सही पता नहीं लग पाता, इसलिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डाॅ समीर कलानी ने प्रदूषण के कारण आॅटिज्म के मामले बढ़ने के बारे में पूछने पर बताया कि गर्भावस्था के दौरान आबोहवा में प्रदूषण और पति के धूम्रपान करने के कारण भी बच्चे को यह बीमारी हो सकती है.
उन्होंने बताया कि जब वह मुंबई के एक अस्पताल में कार्यरत थे, वहां ग्रामीण आॅटिज्म पीड़ित बच्चों को लेकर आते थे. दिल्ली में ऐसा नहीं देखा. कई दफा लोग अनजाने भय के कारण बच्चे को डाॅक्टर या विशेष स्कूलों के पास नहीं लाते, जो बच्चे के लिए बेहद नुकसानदेह है. लोग यदि खुलकर आॅटिज्म पर बात करेंगे, तो इसके प्रति जागरूकता आयेगी और बीमारी का सामना बेहतर तरीके से किया जा सकेगा.
