इसी शहर में सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक हजरत मखदूम साहब की मजार भी यहीं है, जो बिहारशरीफ 65 वर्ष की आयु में आये और 122 वर्ष की उम्र तक यहां शोषित पीड़ित दलित मानव समुदाय की सेवा में जीवन लगा दिया. इसी शहर में बिहार के कई स्वाद भी जिंदा हैं. हम शुरुआत मैदा और बेसन से बनने वाली झिल्ली जिसे लट्ठो भी कहते हैं, इसी से करते हैं. झिल्ली का सौंधा स्वाद लोगों को खूब आकर्षित करता है.
टेस्ट ऑफ बिहार: नहीं भूल पायेंगे बिहारशरीफ की टेढ़ी-मेढ़ी झिल्ली का स्वाद
पटना: 10वीं शताब्दी में पाल राजवंश की राजधानी रहा नालंदा जिले का मुख्यालय बिहारशरीफ अपने समृद्ध इतिहास के लिए जाना जाता है. बिहारशरीफ़ में जहां एक विशाल बौद्ध बिहार ओदंतपुरी के अवशेष हैं, यहां तंत्रशास्त्र का विश्वविद्यालय भी था. इसी शहर में सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक हजरत मखदूम साहब की मजार भी यहीं है, जो […]

पटना: 10वीं शताब्दी में पाल राजवंश की राजधानी रहा नालंदा जिले का मुख्यालय बिहारशरीफ अपने समृद्ध इतिहास के लिए जाना जाता है. बिहारशरीफ़ में जहां एक विशाल बौद्ध बिहार ओदंतपुरी के अवशेष हैं, यहां तंत्रशास्त्र का विश्वविद्यालय भी था.
गुड़ के साथ ही भूरे रंग का होता है प्रयोग
मैदा और बेसन से तैयार होने वाला झिल्ली या लट्ठो का पहले अंगुली के अाकार के टेढ़ा मेढ़ा शक्ल दिया जाता है, फिर इसे गुड़ या भूरा में लपेटा जाता है. इसके पहले मैदा या बेसन को अच्छी तरह गुड़ या भूरा में रिफाइन ऑयल के साथ भूना जाता है फिर उसे आकार देकर गर्म किया जाता है और अंत में ठंडा करने के बाद परोसा जाता है. इसका स्वाद करारे भूने बेसन के साथ हल्का मीठा होता है जो बुनियादी तौर पर नाश्ते की मिठाई मानी जाती है. बिहारशरीफ में बरसों से झिल्ली बनाने वाले कारीगर संतोष कुमार कहते हैं कि यह मगध का बहुत पुराना स्वाद है.
सौ रुपये में मिलता है एक किलो लट्ठो
बेसन की झिल्ली का स्वाद ज्यादा बेहतर होता है क्योंकि यह करारा होता है वहीं मैदा थोड़े वक्त के बाद मुलायम हो जाता है तो स्वादहीन हो जाता है. अभी सौ रुपये किलोग्राम मिलने वाली झिल्ली को आप एयरटाइट कंटेनर में रखकर दस से पंद्रह दिनों तक चला सकते हैं.