Asam Tourism : ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित असम का Sri Surya Pahar: हिंदू-जैन-बौद्ध धर्म का संगम स्थल

यदि आपका असम घूमने जाने का प्लान है, तो गोलपाड़ा जिला स्थित ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित श्री सूर्य पहाड़ के दर्शन अवश्य करें. यह स्थल पुरातात्विक महत्व का है.

असम प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है. यहां की हरियाली व मनोरम दृश्य आपको तरोताजा कर देते हैं. यहां आप चाय बगान, वन्यजीव अभ्यारण्य समेत तमाम मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं. पर इस बार हम आपको लेकर चल रहे हैं राज्य के गोलपाड़ा जिला स्थित हिदू, बौद्ध और जैन धर्मों के संगम स्थल श्री सूर्य पहाड़. यह स्थल असम के सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत स्थलों में से एक है.

Rock-Cut Sculpture के लिए प्रसिद्ध

ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित श्री सूर्य पहाड़, जिसे श्री सूर्ज्य पहाड़ के नाम से भी जाना जाता है, असम के गोलपाड़ा शहर से लगभग 13 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है. यह स्थल एक पहाड़ी क्षेत्र है, जो अपने पुरातात्विक अवशेषों के लिए जाना जाता है. लगभग 1400 एकड़ (583.33 हेक्टेयर) क्षेत्र में फैला यह स्थल सात चोटियों से बना है. पुरातात्विक महत्व के कारण आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) ने राष्ट्रीय महत्व के इस स्थल को संरक्षित किया हुआ है. यह एक ऐतिहासिक स्थल भी है जो अपनी टेराकोटा, चट्टानों को काटकर बने अनेक शिवलिंग, मन्नत स्तूप (votive stupa) और अद्भुत व उत्कृष्ट हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों के देवी-देवताओं की नक्काशीदार आकृतियों (rock-cut sculpture) के लिए प्रसिद्ध है. इस तरह का कॉम्बिनेशन मिलना अत्यंत दुर्लभ है. इस कारण इस स्थल का महत्व और बढ़ जाता है. ‘सूर्य की पवित्र पहाड़ी’ के रूप में प्रसिद्ध, श्री सूर्य पहाड़, यद्यपि अब खंडहर में तब्दील हो चुका है, फिर भी यह प्राचीन असम के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास की गहरी समझ देता है. सूर्य पहाड़ नाम इस बात का संकेतक है कि संभवत: यह स्थल सूर्य देव की पूजा से जुड़ा था. क्योंकि सूर्य देव की पूजा असम के लोगों के जीवन में प्रमुख स्थान रखती है.

कलिका पुराण में है मिलता है उल्लेख

सूर्य पहाड़ प्राचीन असम में मौजूद दो सूर्य मंदिरों में से एक है. इसका उल्लेख ‘कालिका पुराण’ में मिलता है. इस स्थल पर की गयी पुरातात्विक खुदाई में विभिन्न युगों की कलाकृतियां प्राप्त हुई हैं. यहां मिली टेराकोटा और पत्थर की मूर्तियां हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मों के संगम को दर्शाती हैं. सूर्य पहाड़ के उत्तर में उजिर के चार गांव के पास ब्रह्मपुत्र और दुधनोई तथा कृष्णा नदियों के संगम का विहंगम दृश्य आपका मन मोहने के लिए काफी है. चूंकि सूर्य पहाड़ ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित है, ऐसे में माना जाता है कि यह स्थल अहोम युग से पहले एक समृद्ध व्यापारिक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में कार्य करता था. विभिन्न क्षेत्रों के यात्री और व्यापारी यहां आते थे, जिससे यह स्थल विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के मिलन का केंद्र बन गया. चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के वृत्तांत बताते हैं कि प्राचीन समय के प्रागज्योतिषपुर (जिसका वर्णन महाभारत में है) की भूमि का संबंध वर्तमान के श्री सूर्य पहाड़ के क्षेत्र से है.

पुरातत्वविदों ने यहां की पहाड़ियों के चारों ओर बिखरे विभिन्न आकृतियों और आकारों के कई लिंगों की खोज की है. एक किंवदंती के अनुसार, ऋषि वेद व्यास ने दूसरी काशी बनाने के लिए इस स्थल पर 99,999 शिवलिंग स्थापित किये थे. वर्तमान काशी (वाराणसी) में 100,000 लिंग स्थापित हैं. इसी कारण इसे दूसरा काशीधाम माना जा सकता है. यहां खुदाई में पहाड़ियों के आसपास घरों के निशान मिले हैं. क्षेत्र के भौगोलिक और मौसम संबंधी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, इन घरों का निर्माण ईंटों से किया गया था और इसे कलात्मक ढंग से सजाया गया था. इन खोजों से इस बात को बल मिलता है कि प्राचीन असम में सूर्य पहाड़ के आसपास एक संपन्न एवं उन्नत सभ्यता मौजूद थी.

बारह भुजाओं वाले विष्णु व दसभुज दुर्गा की प्रतिमा

श्री सूर्य पहाड़ की तलहटी में, हिंदू देवी-देवताओं की rock carvings देखी जा सकती है. इनमें भगवान शिव और भगवान विष्णु की मूर्तियों वाली पट्टियां (पैनल) हैं. यहां बारह भुजाओं वाले भगवान विष्णु की मूर्ति हैं, जिनके सिर पर सात फनों वाला छत्र है. यहां कमल के पुष्प पर खड़ी दसभुजाओं वाली देवी दुर्गा की प्रतिमा भी है, जिसकी आज भी पूजा होती है. यद्यपि, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इन्हें एक पुरुष देवता के रूप में चिह्नित किया है, परंतु अन्य विद्वान इन्हें मां मनसा का रूप मानते हैं. दक्षिण की तरफ ग्रेनाइट पत्थरों को काटकर बनाये गये विभिन्न आकारों के 25 मन्नत स्तूप हैं. क्षेत्र में इन स्तूपों की मौजूदगी बौद्ध धर्म के प्रभाव को स्पष्ट करती है. एएसआई की मानें, तो स्तूप की नक्काशी का आकार इस ओर संकेत करता है कि वे बौद्ध धर्म के हीनयान चरण के दौरान बनाये गये थे. इस स्थल पर जैन धर्म से संबंधित विभिन्न प्रकार की मूर्तियां और शिलालेख भी पाये गये हैं, जिनमें प्रथम जैन तीर्थंकर, आदिनाथ की नौवीं शताब्दी की मूर्ति भी शामिल है. जैन धर्म के अवशेष इस बात का प्रमाण देते हैं कि उत्तर-पूर्व भारत में भी जैन धर्म का अस्तित्व था.

सूर्य मंदिर में सूर्य चक्र की मौजूदगी

यहां के सूर्य मंदिर में सूर्य चक्र नामक एक नक्काशीदार पत्थर की स्लैब है, माना जाता है कि यह पुराने सूर्य मंदिर की छत का टूटा हुआ हिस्सा है, जिसकी पूजा भगवान सूर्य के रूप में होती थी. इस स्लैब के इनर सर्किल के अंदर बनी मुख्य आकृति (central figure ) को प्रजापति (प्राचीन भारत के वैदिक काल के निर्माण देवता) के रूप में पहचाना जाता है. स्लैब का आउटर सर्किल, यानी बाहरी घेरा कमल की 12 पंखुड़ियों के आकार में है और प्रत्येक कमल की पंखुड़ी में विभिन्न सौर देवताओं की एक बैठी हुई आकृति है, जिन्हें ‘आदित्य’ के नाम से जाना जाता है. यहां सूर्य चक्र के समान ही चंद्र चक्र भी है, जो अब खंडहर हो चुका है.

खुदाई में मिली 5वीं से 12वी शताब्दी की कलाकृतियां

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और असम पुरातत्व विभाग (Assam Archaeological Department) द्वारा श्री सूर्य पहाड़ की खुदाई में पांचवीं से बारहवीं शताब्दी तक की कई कलाकृतियों पायी गयी हैं. इस स्थल पर एक म्यूजियम है, जिसमें खुदाई में प्राप्त अधिकांश पुरावशेषों (Antiquities) को प्रदर्शित किया गया है. इन Antiquities में पत्थर की गजसिम्हा, महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति, एक शेर का डेकोरेटेड सिर, एक सांचे में ढली हुई मछली, मानव आकृतियों से युक्त फलक (plaques of the human figure), पौराणिक जानवर, कीर्तिमुख, फ्लोरल व ज्योमेट्रिक डिजाइनों से सजी टाइलें आदि शामिल हैं. सूर्य पहाड़ के नजदीक एक प्राचीन हनुमान मंदिर भी मौजूद है, जिसमें प्राचीन मूर्तियां हैं.

माघी पूर्णिमा पर लगता है मेला

सूर्य पहाड़ पर प्रतिवर्ष जनवरी में ‘श्री श्री सूर्य मेला’ लगता है. यह मेला माघी पूर्णिमा के दिन से शुरू होता है और तीन दिनों तक चलता है. मेले में शामिल होने हजारों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां आते हैं.

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