Responsive Feeding: बच्चे को खाना खिलाना सिर्फ उसके सामने प्लेट रखने या हर कुछ घंटे में कुछ खिला देने तक सीमित नहीं है. खासकर 6 महीने के बाद जब बच्चे की डाइट में धीरे-धीरे ठोस और अर्ध-ठोस खाना शामिल किया जाता है, तब माता-पिता के लिए यह समझना भी जरूरी हो जाता है कि बच्चा कब भूखा है और कब उसका पेट भर चुका है.
इसी तरीके को रिस्पॉन्सिव फीडिंग कहा जाता है. आसान भाषा में समझें तो इसमें बच्चे को घड़ी देखकर या जबरदस्ती खिलाने के बजाय उसके भूख और पेट भरने के संकेतों को समझकर खाना दिया जाता है. WHO भी 6-23 महीने के बच्चों के लिए responsive feeding को उचित कॉम्प्लीमेंट्री फीडिंग का अहम हिस्सा मानता है
बच्चे के भूख और पेट भरने के संकेत कैसे पहचानें
हर बार बच्चा रोए तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे भूख लगी है. इसी तरह प्लेट में खाना छोड़ देना भी हमेशा खाने की पसंद न होने का संकेत नहीं होता. बच्चे के व्यवहार को देखकर धीरे-धीरे उसके भूख और पेट भरने के संकेत समझे जा सकते हैं. भूख लगने पर बच्चा खाने की तरफ हाथ बढ़ा सकता है, मुंह खोल सकता है, चम्मच या खाने को देखकर उत्साहित हो सकता है या खाने की ओर झुक सकता है.
वहीं पेट भरने पर वह मुंह बंद कर सकता है, सिर दूसरी तरफ कर सकता है, खाने को दूर कर सकता है या खाने में रुचि कम कर सकता है. ऐसे संकेतों को समझना जरूरी है क्योंकि responsive feeding में बच्चे की भूख और पेट भरने के संकेतों पर प्रतिक्रिया देने की सलाह दी जाती है.
6 महीने के बाद Solid Food शुरू करने का सही तरीका क्या है
WHO और UNICEF के अनुसार, पहले 6 महीने तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध देने की सलाह दी जाती है. करीब 6 महीने की उम्र में बच्चे की ऊर्जा और पोषक तत्वों की जरूरत बढ़ने लगती है, जिसे केवल ब्रेस्ट मिल्क से पूरा करना मुश्किल हो सकता है. इसलिए इस उम्र के आसपास कॉम्प्लीमेंट्री फूड्स शुरू किए जाते हैं और ब्रेस्टफीडिंग जारी रखी जाती है.
शुरुआत में बच्चे को बहुत ज्यादा खाना खिलाने की जरूरत नहीं होती. WHO के अनुसार 6-8 महीने की उम्र में complementary foods की शुरुआत छोटे हिस्सों से की जा सकती है और धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाई जाती है. इस उम्र में नरम, अच्छी तरह मैश किए हुए या semi-solid foods से शुरुआत की जा सकती है.
Responsive Feeding: 6 से 23 महीने के बच्चों के लिए एज-वाइज फीडिंग रूटीन
| उम्र | भोजन की आवृत्ति (Frequency) | खाने की बनावट |
| 6 से 8 महीने | दिन में 2-3 बार खाना + ब्रेस्टफीडिंग | • नरम • मैश किया हुआ • सेमी-सॉलिड |
| 9 से 11 महीने | दिन में 3-4 बार खाना + 1 बार न्यूट्रिशियस स्नैक | • थोड़ा गाढ़ा और बारीक कटा हुआ • सॉफ्ट फिंगर फूड्स |
| 12 से 23 महीने | दिन में 3-4 बार खाना + 1-2 बार हेल्दी स्नैक्स | • परिवार का सामान्य खाना • हल्का मैश किया या बारीक कटा हुआ |
बच्चे को खाना खिलाते समय ये गलतियां न करें
सबसे आम गलती है बच्चे के मना करने के बावजूद उसे जबरदस्ती खाना खिलाते रहना. Responsive feeding का मतलब ही है कि बच्चे के संकेतों को समझा जाए. WHO की जानकारी में भी बच्चे को धीरे और धैर्य से खिलाने तथा उसे जबरदस्ती खाना न खिलाने पर जोर दिया गया है.
कुछ और बातों का ध्यान रखें:
- बच्चा खाना मना करे तो हर बार उसे जबरदस्ती न खिलाएं.
- खाना खिलाते समय बच्चे को अकेला न छोड़ें.
- उसकी उम्र के हिसाब से ही खाने का टेक्स्चर रखें.
- खाना बनाने और खिलाने से पहले हाथ और बर्तन साफ रखें.
- खाने को सुरक्षित तरीके से तैयार और स्टोर करें.
- बच्चे को खाते समय पर्याप्त समय दें.
स्क्रीन के सामने खिलाना क्यों सही नहीं माना जाता?
बच्चे को मोबाइल या टीवी दिखाकर खाना खिलाना कई घरों में आसान तरीका लग सकता है, लेकिन इससे माता-पिता का ध्यान बच्चे के वास्तविक खाने के संकेत से हट सकता है. Responsive feeding में खिलाते समय बच्चे के साथ बातचीत करना, उसे देखना और उसके संकेतों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण माना जाता है.
WHO के मुताबिक, बच्चे को खाना खिलाने का समय सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं होता, बल्कि इस दौरान बच्चा बहुत कुछ सीखता भी है. इसलिए खाना खिलाते समय उससे बात करें, उसकी तरफ देखें और उसके साथ प्यार से interact करें. इससे बच्चा खाने के साथ-साथ आपके साथ जुड़ना भी सीखता है.
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