International Women’s Day Special: ब्रेक द वॉयस, यानी धारणाओं को तोड़ें. धारणाएं जो महिलाओं को कमतर आकती हैं, धारणाएं जो उनकी शक्तिरूपेण संस्थिता की अवधारणा को कमतर बनाती हैं, धारणाएं जो कहती है महिलाएं, पुरुषों जैसा काम नहीं कर सकती हैं. स्त्री-पुरुष के जेंडर बायनरी और पूर्वाग्रह आधारित सोच ने महिलाओं को कमतर बनाने का काम किया है. यह सोच की जड़े इतनी गहरी है कि इन धारणाओं को तोड़ना, न ही पढ़ी-लिखी आधुनिक महिलाओं के लिए आसान होता है ,न ही आम घरेलू महिलाओं के लिए और न ही उन महिलाओं के लिए उन महिलाओं के लिए जो हाशिये पर आभाव में जीवन-संघर्ष कर रही है.
श्रम आसान भाषा में कहें तो काम का कोई जेंडर नहीं होता है. इस बीज-मंत्र को पढ़ी-लिखी आधुनिक और हर दूसरी आम महिलाओं ने संकल्प-सूत्र मानकर हर दूसरी महिलाएं जेंडर समानता के संवैधानिक अधिकार को नये सिरे से परिभाषित ही नहीं कर रही हैं, बल्कि हर रोज नया आख्यान भी रच रही हैं. 8 मार्च महिला दिवस के अवसर पर जानते है ऐसी महिलाओं के बारे में, जिन्होंने धारणाओं को तोड़ कर न केवल अपने जीवन को बेहतर किया…कई महिलाओं के लिए प्रेरणा-स्त्रोत बनने का काम भी किया है. कुछ करने का जुनून हो, तो हर समस्या बौनी साबित हो जाती हैं. इन महिलाओं ने हर परेशानियों को दरकिनार कर लगन और साहस से आधी-आबादी की अस्मिता को नयी पहचान दी है.
जीवन की नकारात्मकताओं को फ्यूज करते हुए आगे बढ़ रहीं इलेक्ट्रीशन सीता देवी
सीता देवी कहती है कि वह नकारात्मक बातों को दरकिनार कर ही आज आत्मनिर्भर बन पायी हैं. उनका कहना है कि जब वह अनपढ़ होकर आत्मनिर्भर बन सकती हैं तो शिक्षित महिलाएं तो अपनी मंजिल को हासिल कर ही सकती हैं. सीता देवी के पति साल 1985 से फुटपाथ पर बनी दुकान में इलेक्ट्रीशियन का काम करते थे, लेकिन वर्ष 2005 में जब उनकी तबीयत खराब हुई जिसके बाद सीता देवी ने खुद दुकान चलाने की ठान ली. वह दुकान पर अपने बीमार पति को लेकर आने लगी और खुद ही एलइडी बल्ब, पंखा, कूलर, इन्वर्टर आदि का सारा काम सीख गयीं. पति की आंख की रोशनी भी धीरे-धीरे चली गयी और घर पर ही रहने लगे. आज सीता देवी, अपनी कड़ी मेहनत के दम पर, एक सफल इलेक्ट्रीशियन बन गयीं. वह गया के राय काशी नाथ मोड़ पर बैठकर पिछले 15 साल से बिजली का सारा काम कर रही हैं. अनपढ़ सीता देवी अब इलेक्ट्रीशियन बनकर एक दिन में एक हजार से 1500 रुपये तक की कमाई कर लेती हैं. इसी कमाए हुए पैसे से वह घर का खर्च चला रही हैं. साथ ही अपने पति का भी इलाज करा रही हैं.
राजमिस्त्री का काम करनेवाली नजमुल खातून
बिहार की नजमल ख़ातून बताती है कि उनके हाथ में हुनर है, आज उसके नीचे पुरुष भी काम करते है आस-पास के कई गांवों में उसने लोगों के आशियाने को बनाने का काम किया है. राजमिस्त्री का काम आमतौर पर पुरुषों का माना जाता है, परंतु नजमल ख़ातून ने इस धारणा को तोड़ कर न केवल अपने जीवन को पटरी पर लाने का काम किया है, इस बात को सिद्ध किया है कि हुनर का कोई जेंडर नहीं होता है. नज़मुल खातून आज बिहार के मधुबनी जिला में न सिर्फ पुरुषों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर काम ही नहीं कर रही है. एक-एक ईंट जोड़ कर उसने अपना आशियाना भी खड़ा किया है और पांच बच्चों का भरण पोषण करके परिवार भी चला रही है. 2007 में पति के जाने के बाद पूरी तरह से टूट जाने वाली नज़मा ने छोटे-छोटे बच्चों का मुंह देखकर खुद को संभाला और घर के बाहर मज़दूरी करने निकल पड़ी। तीन साल तक मजदूरी का काम करने के साथ-साथ, नजमा ने राजमिस्त्री का काम सीखना शुरु किया. आज नज़मा दुनिया समाज की परवाह किए बिना वह रोज काम पर जाती है. शुरुआत में ईटा ढ़ोने का काम किया धीरे-धीरे सीमेंट-बालू का मसाला बनाना सीखा और धीरे-धीरे करके राज मिस्त्री के काम में खुद को निपुण बनाया.
बंदूक लेकर की ठेकेदारी करने वाली लीलाबाई
हर महिलाओं को सलाह देते हुए ठेकेदार लीलाबाई कहती है- जो आपकी चिंता नहीं करता है तो उसकी बात सुनकर समय बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है. मध्यप्रदेश के राजगढ़ की लीलाबाई, ठेकेदार के नाम से मशहूर हैं। 1999 में वह जलपा माता मंदिर में मिस्त्री का काम कर रही थीं. वहां जिला कलेक्टर ने लीलाबाई का काम देखकर कुछ छोटे-मोटे काम दिया. इसके बाद वह सड़कों के लिए ठेके लेने लगीं. लीलाबाई बताती है –जब तक मैं लेबर थी तो परिजनों को कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन मिस्त्री बनी तो नाते-रिश्तेदारों का विरोध शुरू हो गया. बच्चों को बेहतर जिंदगी देने के लिए ठेकेदारी शुरू की तो पुरुष ठेकेदार मेरा काम खराब कर देते, शिकायत करते थे. कभी-कभी समान चोरी कर लेते थे। काम और पैसा को लेकर कई बार मुझपर हमला भी हुआ. इसके बाद 2001 में बंदूक लेकर हर जगह आने-जाने लगी तो एक अलग छवि बनने लगी.
पति बीमार हुआ, तो बाईक दीदी बन गई पूनम
गाजियाबाद के पटेल नगर में स्कूटी-बाइक रिपेयरिंग की दुकान चलाने वाली पूनम कहती है-मन में लगन और इच्छाशक्ति हो तो कठिन से कठिन काम सीखा जा सकता है फिर स्कूटी-बाइक तो बस मशीन ही है. मुश्किल हालात इंसान को बहुत कुछ सिखाते हैं. कुछ लोग हार जाते हैं और कुछलोग इससे लड़ते है. गाजियाबाद में पूनम का जीवन एक मिसाल है, पति राजेश एक निजी कंपनी में मोटर मैकेनिक था, राजेश को हड्डी गलने की बीमारी (एवैस्कुलर नेक्रोसिस) हो गयी और एक हाथ काम करना बंद कर दिया, नौकरी छूट गयी. घर-बच्चे और पति का जीवन संभालने के लिए पति से बाइक रिपेयरिंग का काम सीखना शुरू किया. पहले पति काम सीखाने को तैयार नहीं थे लेकिन कुछ दिन के बाद उन्होंने हामी भर दी. शुरुआत में एक ठेले पर औजार लेकर जीटी रोड पर बैठ गयी. जब काम चल निकला और पैसा जुट गया तो अब दुकान लेकर काम कर रही है. आज वह घर, बच्चों और दुकान सबों के बीच सामंजस्य बिठाकर एक आत्मनिर्भर महिला बन चुकी है. गाजियाबाद के पटेल नगर में पूनम ने पति राजेश से बाइक मैकेनिक का काम सीखा, धीरे-धीरे वह बाइक रिपेयरिंग में एक्सपर्ट हो गयीं. अब पति-पत्नी दोनों दुकान और घर दोनों एक साथ संभालते है. पूनम बताती है शुरुआत में जब काम शुरू किया था तो लोग सोचते थे कि महिला है बाइक स्कूटर की सर्विस करेगी, लेकिन जब भी कोई एक बार काम करात तो काम देखकर तारीफ करता और दोबारा सर्विस करने के लिए आता. इस तरह उनका काम चल पड़ा.
सुबह चार बजे से लेकर रात के 10 बजे तक है सुनीता की ड्यूटी
पांच वर्षों से कर रही हैं. पति और देवर भी न्यूजपेपर हॉकर हैं. घर के काम-काज के साथ सुबह चार बजे जग कर न्यूजपेपर बांटना, फिर घर में आकर खाना पका कर बच्चों को स्कूल भेजना, घर की साफ-सफाई करना और अन्य जरूरी कामों को निपटाना और उसके बाद बैट्री रिक्शा चलाना- ये तमाम काम कई अलग-अलग लोग नहीं करते, बल्कि एक ही महिला करती है जिसका नाम है- सुनीता कच्छप. सुनीता बूटी मोड़ से कांटा टोली के बीच बैट्री रिक्शा भी चलाती हैं. इंटर उत्तीर्ण सुनीता कहती हैं कि शुरुआत में जब अखबार बांटने का काम शुरू किया था, तो कई बार मुश्किल भी होती थी, खास कर तब जबकि कोई साथी हॉकर छुट्टी पर चला जाता था. ऐसे में मुंह अंधेरे घर से निकलने में थोड़ा डर भी लगता था, पर अब आदत हो गयी है. ‘’ पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में घुसपैठ करने की वजह से क्या उन्हें कोई दिक्कत भी हुई, इस बात के जबाव में सुनीता कहती हैं- ‘’न्यूजपेपर बांटने के दौरान अपने पुरुष समकक्षियों से एरिया या कलेक्शन को लेकर थोड़ी-बहुत नोंक-झोंक भले होती हो, लेकिन एक महिला होने के नाते मुझे कभी उनकी ओर से लैंगिक भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा है. सब यथासंभव मदद करते हैं. अगर रास्ते में कभी वॉशरूम वगैरह की जरूरत भी लगे, तो कस्टमर भी सपोर्ट करते हैं.’’ भविष्य में सुनीता का सपना कुछ पैसे जमा करके अपना कोई छोटा-मोटा रोजगार शुरू करने की है. कारण, जिस तरह से युवाओं में अखबार पढ़ने की प्रवृति कम होती जा रही है, उसे देखते हुए अखबार का भविष्य सीमित नजर आता है. सुनीता कहती हैं- ‘’वर्तमान में युवाओं को अखबार या खबरों से कोई विशेष लेना-देना नहीं है. अधिकतर के हाथ में स्मार्टफोन है. ऐसे में अगर उन्हें खबरों को जानने की इच्छा होती भी है, तो वे ऑनलाइन अखबार या न्यूज पढ़ लेते हैं. ऑफलाइन अखबार पढ़ना एक आदत है और यह आदत जिनको है, वे भले ही पुरा अखबार न पढ़ें, लेकिन एक बार उसे अलट-पलट कर देखेंगे जरूर. ऐसे लोगों में प्रौढ़ या बुजुर्ग ही है. वे जब तक हैं, तभी तक मानिए कि अखबार का भविष्य भी है.’’ हालांकि सुनीता यह भी कहती हैं कि बच्चों और युवाओं को अखबार पढ़ने की आदत डलवानी चाहिए, क्योंकि इसमें कई तरह की महत्वपूर्ण जानकारियां होती हैं.
जमीन से जुड़े रह कर जमीनी स्तर पर काम करने का है जुनून
एमएससी कंप्लीट करने के बाद मुझे दो एनजीओ के साथ जुड़ कर सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर डॉक्यूमेंट्री बनाने का मौका मिला. इससे मुझे ग्रामीण जीवन और परिस्थिति को करीब से जानने-समझने का मौका मिला. उनके काम से प्रभावित होकर एनजीओ द्वारा स्वाति को लैंगिक मुद्दों पर होनेवाले काम के चयन एवं संपादन की जिम्मदारी सौंप दी. इस भूमिका में स्वाति को डेस्क पर बैठ कर काम करना था, जो कि उन्हें अधिक दिनों तक रास नहीं आया. उनकी मानें, तो उस समय तक मुझे जमीनी कार्यों की अच्छी-खासी जानकारी हो गयी थी, इसलिए मैंने बंद कमरे में बैठ कर काम करने के बजाय अपने तरीके से फील्ड को एक्सप्लोर करने का फैसला किया. मूल रूप से गांव- दुरडीह, जिला- लक्खीसराय, बिहार की रहनेवाली स्वाति इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर्स करने के बाद पिछले चार वर्षों से खेती से जुड़ कर किसानों को कृषि वानिकी (Agro-Farming) के लिए जागरूक और प्रशिक्षित कर रही हैं. वह बताती हैं कि उनके परिवार में भी खेती-बाड़ी की परंपरा रही है. ऐसे में इस क्षेत्र के प्रति उनका रुझान स्वभाविक था. वर्तमान में अपने भाई के साथ मिल कर ‘खेती’ संस्था के तहत किसानों को प्रशिक्षित, जागरूक तथा आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने का कार्य कर रही हैं. स्वाति का मुख्य फोकस किसानों को कृषि-वानिकी के लिए प्रोत्साहित करने का है. उल्लेखनीय है कि फसलों के साथ-साथ पेड़ों एवं झाड़ियों को समुचित प्रकार से लगाकर दोनो के लाभ प्राप्त करने को कृषि वानिकी (Agroforestry) कहा जाता है. इसमें जैविक विधि के जरिये कृषि और वानिकी की तकनीकों का मिश्रण करके विविधतापूर्ण, लाभप्रद, स्वस्थ एवं टिकाऊ भूमि-उपयोग सुनिश्चित किया जाता है. स्वाति की मानें, तो उन्होंने अब तक करीब एक हजार छोटे-बड़े किसानों को इस कृषि परंपरा से जोड़ने में सफलता प्राप्त की है, जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक है. भविष्य में स्वाति का सपना अधिक-से-अधिक लोगों को जैविक कृषि विधि तथा कृषि वानिकी अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने का है.
अगर मैं लाशों में चीरा नहीं लगाती , तो मेरे बच्चे भूखे मर जाते
”मेरा काम पोस्टमॉर्टम रूम में रखी लाशों में चीरा लगाने का है. जब मैंने सबसे पहला पोस्टमार्टम किया था, तो उस दिन हलक से खाना नीचे नहीं उतार पायी थी. बाद में करते-करते आदत-सी हो गयी.” यह कहना है ‘बिहार की पोस्टमॉर्टम लेडी’ मंजू देवी का. बिहार के समस्तीपुर जिला अस्पताल में पोस्टमार्टम सहायिका हैं. ये शव में चीरा लगाना, उसे सीलना और पैक करने का काम करती हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में इस काम की शुरुआत की थी. यानी वह बीते 23 वर्षों से यह काम कर रही हैं. एक निजी चैनल को दिये अपने इंटरव्यू में मंजू देवी ने बताया कि उनके परिवार में चार पीढ़ियों से ये काम हो रहा है. वर्ष 2001 में पति की मौत के बाद अपना और अपने बच्चों को पेट पालने के लिए मंजू के पास कोई और चारा नहीं था. सो उन्होंने अपने पति के काम को ही अपना लिया. बता दें कि जिस रोज मंजू देवी के पति का देहांत हुआ था, उस रोज भी अस्पताल से पोस्टमार्टम का एक केस आ गया था. ऐसी स्थिति में हृदय को बांध कर मंजू ने पहले अपना फर्ज निभाया और फिर घर आकर पति का दाह-संस्कार किया. मंजू की मानें, तो शुरुआत में उन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी उन सब पर ध्यान नहीं दिया. वह कहती हैं- ”कौन क्या कहता है, मैंने कभी भी इन बातों पर ध्यान नहीं देती. बस अपने काम पर फोकस करती हूं.” बता दें कि इतने वर्षों तक काम करने के बावजूद मंजू देवी की नौकरी कभी स्थायी नहीं हुई. इसके लिए उन्होंने लंबी कानूनी लड़ाई भी लड़ी है. उन्हें दिन में अगर कोई एक शव आया, तो 380 रुपये मिल जाते हैं. अगर एक से ज्यादा शव आते हैं, तो भी 380 रुपये ही दिन के मिलते हैं. अगर किसी दिन शव नहीं आया, तो कुछ नहीं मिलता. जिस कमरे में वह काम करती हैं, वहां चारों ओर सिर्फ लाशें ही रहती हैं. फिर भी वहां एसी, पानी, बिजली और शौचालय की समुचित व्यवस्था भी नहीं है. लाशों से भरे कमरे की बदबू असहनीय होती है. एक आम आदमी के लिए घंटे भर भी उसके आसपास खड़ा होना मुश्किल होता है, पर मंजू देवी अब इन सबकी आदी हो चुकी हैं. वह कहती हैं- ”मैं रोजाना आठ से दस घंटे पोस्टमॉर्टम रूम में मुर्दा लाशों के साथ अकेले रहती हूं. डॉक्टर साहब रिपोर्ट लिख कर चले जाते हैं. मैं अकेले लाशों में चीरा लगाती हूं और फिर उनकी सिलाई भी अकेले ही करती हूं. मुझे कभी डर नहीं लगा. मुझे दुनिया में किसी चीज से डर नहीं लगता.” आंध्र प्रदेश के वाईएसआर कड़पा ज़िले के प्रोद्दटूर सरकारी अस्पताल में पगडाला वरालू नाम की एक महिला भी यही काम कर रही हैं.
