क्या हफ्ते में 4 दिन काम करने से बढ़ जाती है प्रोडक्टिविटी? जानें कितना सही है ये फॉर्मूला

4-Day Work Week: क्या हफ्ते में सिर्फ 4 दिन ऑफिस जाने से काम का प्रेशर कम हो सकता है और जिंदगी थोड़ी आसान हो सकती है? 5 दिन की नौकरी को 4 दिनों में बदलने का आइडिया सुनने में तो काफी अच्छा लगता है, लेकिन क्या सच में इससे काम बेहतर हो सकता है?

4-Day Work Week: सोचिए, अगर आपको हफ्ते में 5 दिन की जगह सिर्फ 4 दिन काम करना पड़े और आपकी सैलरी में कोई कटौती भी न हो, तो कैसा लगेगा? जाहिर है, ज्यादातर लोगों को यह सुनकर अच्छा ही लगेगा. लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी है. अगर कर्मचारी एक दिन कम काम करेंगे, तो क्या कंपनी का काम समय पर पूरा होगा? क्या इससे काम की रफ्तार और कंपनी की कमाई पर असर नहीं पड़ेगा?

पिछले कुछ सालों में कई देशों की कंपनियों और सरकारों ने इसी सवाल का जवाब जानने के लिए 4 दिन के काम वाले हफ्ते को लेकर कई ट्रायल किए हैं. इन ट्रायल में कई जगह कर्मचारियों के काम के घंटे कम किए गए, लेकिन उनकी सैलरी में कोई कटौती नहीं की गई. इन ट्रायल के नतीजे काफी दिलचस्प रहे. कई जगह कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें पहले के मुकाबले कम स्ट्रेस और कम थकान महसूस हुई. उन्हें परिवार और अपनी पर्सनल लाइफ के लिए भी ज्यादा समय मिला. कुछ कंपनियों में काम और कमाई पर भी कोई बड़ा बुरा असर नहीं दिखा.

लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हर कंपनी में 4 दिन काम करने से काम अपने आप बेहतर हो जाएगा. असली बात यह है कि अगर काम के घंटे कम किए जाते हैं, तो काम करने का तरीका भी बदलना पड़ता है.

4 दिन का काम वाला हफ्ता आखिर होता क्या है?

4 दिन के काम वाले हफ्ते का आसान मतलब है कि कर्मचारी हफ्ते में 5 दिन की जगह 4 दिन काम करें. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि 5 दिन का पूरा काम जबरदस्ती 4 दिनों में करवा दिया जाए. अगर ऐसा किया गया तो कर्मचारी को कम समय में ज्यादा काम करना पड़ सकता है. इससे काम का प्रेशर और थकान बढ़ सकती है. कई बड़े ट्रायल में ऐसा तरीका अपनाया गया जिसमें कर्मचारियों के काम के कुल घंटे कम किए गए, लेकिन उनकी सैलरी पहले जैसी ही रखी गई. साथ ही कंपनियों ने काम करने के तरीके में भी बदलाव किया, ताकि कम समय में जरूरी काम पूरा किया जा सके.

इसे आसान भाषा में 100-80-100 मॉडल से समझ सकते हैं. इसका मतलब है 100 प्रतिशत सैलरी, करीब 80 प्रतिशत काम का समय और कोशिश यह कि काम का नतीजा करीब 100 प्रतिशत बना रहे. हालांकि, हर 4 दिन के काम वाले मॉडल में यही तरीका अपनाया जाए, यह जरूरी नहीं है. यानी बात सिर्फ एक दिन की एक्स्ट्रा छुट्टी की नहीं है. इसमें यह भी देखना पड़ता है कि कर्मचारियों का समय कहां बेवजह जा रहा है और उसे कैसे बचाया जा सकता है. उदाहरण के लिए, अगर रोज होने वाली लंबी मीटिंग को छोटा किया जा सकता है, गैर जरूरी मीटिंग हटाई जा सकती हैं या किसी काम को करने का आसान तरीका खोजा जा सकता है, तो कर्मचारी कम समय में भी जरूरी काम पूरा कर सकता है.

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ब्रिटेन में करीब 2,900 कर्मचारियों पर हुआ बड़ा ट्रायल

4 दिन के काम वाले हफ्ते को लेकर ब्रिटेन में 2022 में एक बड़ा ट्रायल किया गया था. इसमें 61 कंपनियां और करीब 2,900 कर्मचारी शामिल हुए थे. इस ट्रायल के दौरान कर्मचारियों के काम के घंटे 20 प्रतिशत कम किए गए. खास बात यह थी कि उनकी सैलरी में कोई कटौती नहीं की गई. यह ट्रायल 6 महीने तक चला. ट्रायल के बाद सामने आए नतीजे काफी दिलचस्प थे. करीब 71 प्रतिशत कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें पहले के मुकाबले काम से होने वाली थकान यानी बर्नआउट कम महसूस हुई. वहीं, 39 प्रतिशत कर्मचारियों ने बताया कि वे पहले के मुकाबले कम स्ट्रेस में थे. बीमारी की वजह से कर्मचारियों की ली गई छुट्टियों में भी करीब 65 प्रतिशत की कमी देखी गई. इसके अलावा कंपनी छोड़कर जाने वाले कर्मचारियों की संख्या भी करीब 57 प्रतिशत कम रही.

यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है, 71 प्रतिशत का मतलब यह नहीं है कि सभी कर्मचारियों की काम से होने वाली थकान 71 प्रतिशत कम हो गई. इसका मतलब यह है कि 71 प्रतिशत कर्मचारियों ने खुद बताया कि उन्हें काम से होने वाली थकान पहले के मुकाबले कम महसूस हुई.

क्या कंपनियों की कमाई कम हुई?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कर्मचारी कम घंटे काम करेंगे तो कंपनियों की कमाई का क्या होगा? इस ट्रायल में शामिल 23 कंपनियों की कमाई के आंकड़े उपलब्ध थे. इन कंपनियों में एवरेज कमाई करीब 1.4 प्रतिशत बढ़ी. यानी कम काम के घंटे होने के बावजूद इन कंपनियों की कमाई में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई. लेकिन इस आंकड़े को सही तरीके से समझना जरूरी है. इसका मतलब यह नहीं है कि 4 दिन का काम वाला हफ्ता अपनाने वाली हर कंपनी की कमाई 1.4 प्रतिशत बढ़ जाएगी. 1.4 प्रतिशत का आंकड़ा केवल उन 23 कंपनियों की एवरेज कमाई में बदलाव था, जिनके आंकड़े अवेलेबल थे.

ट्रायल खत्म होने के बाद 61 में से 56 कंपनियों ने कहा कि वे इस तरीके को आगे भी जारी रखना चाहती हैं. यानी करीब 92 प्रतिशत कंपनियां इसे जारी रखने के फेवर में थीं. इनमें से 18 कंपनियां उस समय तक इसे हमेशा के लिए लागू करने की कन्फर्म कर चुकी थीं.

माइक्रोसॉफ्ट जापान ने भी किया 4 दिन काम का ट्रायल

4 दिन के काम वाले हफ्ते का एक जाना-माना उदाहरण माइक्रोसॉफ्ट जापान का भी है. 2019 में कंपनी ने अगस्त महीने के सभी 5 शुक्रवार को ऑफिस बंद रखा. कर्मचारियों को इन दिनों के लिए स्पेशल पेमेंट वाली छुट्टी दी गई. इस तरह कर्मचारियों ने 4 दिन काम किया और 3 दिन आराम किया. इस ट्रायल के दौरान कई बदलाव देखने को मिले. बिजली की खपत में करीब 23.1 प्रतिशत की कमी हुई और वहीं, प्रिंट किए जाने वाले पन्नों की संख्या करीब 58.7 प्रतिशत कम हो गई. कंपनी ने जब कर्मचारियों से इस तरीके के बारे में पूछा तो 92.1 प्रतिशत कर्मचारियों ने 4 दिन काम और 3 दिन आराम वाले तरीके को अच्छा बताया.

कंपनी ने काम के तरीके में भी बदलाव किए. मीटिंग को छोटा करने और डिजिटल मीडियम्स से काम करने पर जोर दिया गया, ताकि कम समय में काम को ज्यादा ऑर्गनाइज्ड तरीके से किया जा सके.

क्या माइक्रोसॉफ्ट में काम करने की कैपिसिटी 40 प्रतिशत बढ़ी थी?

माइक्रोसॉफ्ट जापान के इस ट्रायल के बारे में अक्सर कहा जाता है कि कंपनी की काम करने की कैपिसिटी करीब 40 प्रतिशत बढ़ गई थी. दरअसल, कंपनी ने उस दौरान प्रति कर्मचारी बिक्री के आधार पर 39.9 प्रतिशत ज्यादा काम की कैपिसिटी का आंकड़ा दर्ज किया था. लेकिन यहां भी एक जरूरी बात है. बाद में माइक्रोसॉफ्ट ने खुद साफ किया कि यह आंकड़ा सही था, लेकिन इस बढ़ोतरी का पूरा कारण सिर्फ 4 दिन काम करने के तरीके को नहीं माना जा सकता. इसके पीछे कई दूसरे कारण भी हो सकते थे.

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि '4 दिन काम करने से माइक्रोसॉफ्ट की काम करने की कैपेसिटी 40 प्रतिशत बढ़ गई.' सही बात यह है कि ट्रायल के दौरान प्रति कर्मचारी सेल्स के आधार पर 39.9 प्रतिशत ज्यादा काम की कैपिसिटी का आंकड़ा दर्ज हुआ था, लेकिन माइक्रोसॉफ्ट ने इसे सिर्फ 4 दिन काम करने की वजह से हुई बढ़ोतरी नहीं माना.

आइसलैंड में भी कम किए गए काम के घंटे

आइसलैंड में काम के घंटे कम करने को लेकर दो बड़े ट्रायल हुए. इनमें एक रेक्याविक शहर प्रशासन का ट्रायल था, जो 2015 से 2019 तक चला. दूसरा आइसलैंड की सरकारी व्यवस्था में 2017 से 2021 के बीच चला. इन ट्रायल में अलग-अलग फेज में कर्मचारियों की संख्या बढ़ती गई और सरकारी क्षेत्र वाले ट्रायल में यह संख्या करीब 2,500 तक पहुंची थी. इन ट्रायल में कर्मचारियों के काम के घंटे कम किए गए, लेकिन उनकी सैलरी में कटौती नहीं की गई. ट्रायल के बाद काम और पर्सनल लाइफ के बीच बेहतर तालमेल जैसे फायदे सामने आए.

इन ट्रायल के बाद हुए सामूहिक समझौतों के जरिए करीब 86 प्रतिशत आइसलैंडिक कामगारों को कम काम के घंटे या अपने काम के घंटे कम करने का अधिकार मिला. लेकिन यहां भी एक बात ध्यान रखने वाली है. इसका मतलब यह नहीं है कि आइसलैंड के 86 प्रतिशत कामगार सिर्फ 4 दिन काम करने लगे. इसका सही मतलब यह है कि इतनी बड़ी संख्या में कामगारों को कम काम के घंटे रखने या अपने काम के घंटे कम करने की सुविधा या अधिकार मिला.

पुर्तगाल में भी हुआ 4 दिन काम का ट्रायल

पुर्तगाल ने भी 2023 में 4 दिन काम करने के तरीके को लेकर 6 महीने का एक ट्रायल किया. इसके फाइनल फेज में 41 कंपनियां और 1,000 से ज्यादा कर्मचारी शामिल थे. इस ट्रायल के दौरान कंपनियों ने कर्मचारियों के एवरेज वीकली काम के घंटे 39.3 घंटे से घटाकर 34 घंटे कर दिए. यानी काम के समय में करीब 13.7 प्रतिशत की कमी हुई. हर कंपनी ने 4 दिन काम करने के तरीके को एक ही तरह से लागू नहीं किया. करीब 58.8 प्रतिशत कंपनियों ने हफ्ते में एक पूरा दिन छुट्टी देने का तरीका चुना. वहीं, 41.5 प्रतिशत कंपनियों ने 14 दिनों में 9 दिन काम करने का तरीका अपनाया.

ट्रायल के बाद करीब 95 प्रतिशत कंपनियों ने इसे अच्छा एक्सपीरियंस बताया. कर्मचारियों ने भी कहा कि उन्हें काम और निजी जिंदगी के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिली. करीब 65 प्रतिशत कर्मचारियों ने बताया कि इस तरीके से उन्हें परिवार के साथ ज्यादा समय मिला. काम से होने वाली थकान में 19 प्रतिशत, चिंता में 21 प्रतिशत और फिजिकल या मेंटल थकान में 23 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. इनके अलावा नींद से जुड़ी परेशानियों में भी 19 प्रतिशत की कमी बताई गई.

आखिर कम दिन काम करने से फायदा कैसे हो सकता है?

अब सवाल है कि जब काम के घंटे कम होंगे तो काम पूरा कैसे होगा? इसका एक बड़ा जवाब है काम करने के तरीके में बदलाव. जब कर्मचारियों के पास काम पूरा करने के लिए कम समय होता है तो वे जरूरी काम को पहले करने पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं. कंपनी भी ऐसे काम कम कर सकती है जिनमें समय ज्यादा जाता है, लेकिन फायदा कम होता है.

ब्रिटेन के ट्रायल में भी कंपनियों ने काम करने के तरीके में बदलाव किए. मीटिंग और काम के दूसरे तरीकों को ज्यादा ऑर्गनाइज किया गया, ताकि कम समय में जरूरी काम पूरा किया जा सके. उदाहरण के लिए, अगर किसी मीटिंग को एक घंटे की जगह 30 मिनट में पूरा किया जा सकता है तो बचे हुए 30 मिनट में कर्मचारी अपना जरूरी काम कर सकता है. इसी तरह बार-बार होने वाली मीटिंग, गैर जरूरी ईमेल, एक ही काम को बार-बार करने और ऐसी दूसरी चीजों को कम किया जा सकता है जिनमें कर्मचारी का समय चला जाता है. एक एक्स्ट्रा छुट्टी का फायदा यह भी हो सकता है कि कर्मचारी अपने निजी काम उसी दिन निपटा लें. जैसे बैंक का काम, डॉक्टर से मिलना, बच्चों का काम या घर के दूसरे जरूरी काम. इससे ऑफिस के काम के समय में निजी काम के लिए समय निकालने की जरूरत कम हो सकती है.

हर कंपनी के लिए 4 दिन का काम वाला हफ्ता सही नहीं

यह समझना भी जरूरी है कि 4 दिन काम करने का तरीका कोई ऐसा फॉर्मूला नहीं है जो हर कंपनी में एक जैसा काम करेगा. अस्पताल, पुलिस, होटल, कस्टमर सर्विस, ट्रांसपोर्टेशन, फैक्ट्रीज और ऐसी कई जगहें हैं जहां हर दिन काम चलता है. कुछ जगहों पर 24 घंटे सेवाएं भी देनी होती हैं. ऐसे में सभी कर्मचारियों को एक साथ तीन दिन की छुट्टी देना आसान नहीं होगा. इन जगहों पर अलग-अलग कर्मचारियों के लिए अलग शिफ्ट बनानी पड़ सकती है.

दूसरी बड़ी समस्या तब हो सकती है जब कंपनी काम के घंटे कम तो कर दे, लेकिन 5 दिन का पूरा काम 4 दिनों में ही पूरा करने का प्रेशर कर्मचारियों पर डाल दे. अगर ऐसा हुआ तो कर्मचारी को रोज ज्यादा काम करना पड़ सकता है. इससे काम का प्रेशर और थकान बढ़ सकती है. इसलिए सिर्फ एक दिन ऑफिस कम जाना ही 4 दिन के काम वाले हफ्ते की पूरी तस्वीर नहीं है. अगर इसे सही तरीके से लागू करना है तो काम करने का तरीका भी बदलना जरूरी है.

तो क्या 4 दिन काम करने से काम बेहतर होता है?

इसका सीधा जवाब है कि हर कंपनी में जरूरी नहीं, लेकिन कई बड़े ट्रायल में इसके अच्छे नतीजे जरूर सामने आए हैं.

  • ब्रिटेन के ट्रायल में कर्मचारियों ने कम थकान और स्ट्रेस की बात कही. बीमारी की छुट्टियों और कर्मचारियों के कंपनी छोड़ने की दर में भी कमी देखी गई. वहीं, जिन 23 कंपनियों की कमाई के आंकड़े मिले थे, उनमें एवरेज कमाई 1.4 प्रतिशत बढ़ी.
  • माइक्रोसॉफ्ट जापान के ट्रायल में बिजली की खपत और प्रिंटिंग में बड़ी कमी देखने को मिली. ज्यादातर कर्मचारियों ने 4 दिन काम वाले तरीके को भी अच्छा बताया. हालांकि, 39.9 प्रतिशत ज्यादा काम की कैपेसिटी वाले आंकड़े को सिर्फ 4 दिन काम करने के तरीके का नतीजा नहीं माना जा सकता.
  • आइसलैंड और पुर्तगाल के ट्रायल में भी कम काम के घंटे और काम के साथ-साथ पर्सनल लाइफ के बीच बेहतर तालमेल से जुड़े अच्छे नतीजे सामने आए.

इसलिए 4 दिन के काम वाले हफ्ते को सिर्फ एक दिन की एक्स्ट्रा छुट्टी समझना सही नहीं होगा. यह काम के घंटे कम करने के साथ-साथ काम करने के तरीके को बेहतर और ऑर्गनाइज्ड बनाने की कोशिश है.

अगर कोई कंपनी सही तरीके से काम बांटती है, गैर जरूरी काम कम करती है और कर्मचारियों को कम समय में जरूरी काम पूरा करने की सुविधा देती है, तो 4 दिन काम करने का तरीका उसके लिए अच्छा ऑप्शन हो सकता है. लेकिन हर कंपनी, हर नौकरी और हर कर्मचारी की स्थिति अलग होती है. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हफ्ते में 4 दिन काम करने से हर जगह काम करने की कैपिसिटी अपने आप बढ़ जाएगी. असली सवाल यह नहीं है कि कर्मचारी कितने दिन ऑफिस आया. असली सवाल यह है कि कम समय में वह कितना जरूरी और अच्छा काम कर पाया.

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लेखक के बारे में

By सौरभ पोद्दार

सौरभ पोद्दार एक लाइफस्टाइल जर्नलिस्ट हैं और पिछले 4 सालों से डिजिटल मीडिया में एक्टिव हैं. उन्होंने रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है. फिलहाल, सौरभ 'प्रभात खबर' के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रहे हैं. सौरभ को उन टॉपिक्स पर लिखना सबसे ज्यादा पसंद है, जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं. उनके आर्टिकल्स में आपको हेल्थ, फिटनेस, स्किन-हेयर केयर, पेरेंटिंग, हेल्दी रेसिपीज, घरेलू नुस्खे, रिलेशनशिप और वास्तु शास्त्र जैसी उपयोगी जानकारियां मिलेंगी. फिटनेस और अच्छी सेहत सौरभ की निजी जिंदगी का भी अहम हिस्सा हैं. वे जिन विषयों पर लिखते हैं, उन्हें अपनी रूटीन में फॉलो भी करते हैं. उनका मानना है कि जब आप किसी चीज को खुद एक्सपीरियंस करते हैं, तभी दूसरों तक सही और प्रैक्टिकल जानकारी पहुंचा सकते हैं. उनकी हमेशा यही कोशिश रहती है कि वे ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर बिल्कुल आसान और आम बोलचाल की हिंदी में लिखें, ताकि हर पाठक उसे आसानी से समझ सके. यही वजह है कि उनके लिखे आर्टिकल्स काफी एंगेजिंग और SEO-फ्रेंडली होते हैं.

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