Sherdil The Pilibhit Saga Movie Review: सशक्त विषय पर बनी कमजोर फिल्म शेरदिल

पंकज त्रिपाठी की फिल्म शेरदिल 2017 की एक असल घटना पर आधारित है. कहानी जुंढाव नामक गांव के एक सरपंच गंगाराम( पंकज त्रिपाठी) की है. जंगल के नज़दीक उसका गांव है.

By कोरी | June 25, 2022 7:03 AM

फ़िल्म-शेरदिल-पीलीभीत सागा (Sherdil The Pilibhit Saga movie review)

निर्माता-रिलायंस एंटरटेनमेंट

निर्देशक-सृजित

कलाकार-पंकज त्रिपाठी,सयानी गुप्ता,नीरज काबी और अन्य

प्लेटफार्म-सिनेमाघर

रेटिंग-दो

निर्माता-रिलायंस एंटरटेनमेंट

निर्देशक-सृजित

कलाकार-पंकज त्रिपाठी,सयानी गुप्ता,नीरज काबी और अन्य

प्लेटफार्म-सिनेमाघर

रेटिंग-दो

Sherdil The Pilibhit Saga movie review: नेशनल अवार्ड विनर निर्देशक सृजित और पॉपुलर एक्टर पंकज त्रिपाठी जब फ़िल्म शेरदिल से जुड़े, तो उम्मीदें थी कि फ़िल्म एंटरटेनमेंट के साथ साथ मैसेज देने में भी सक्षम रहेगी, लेकिन इंसान और जानवर के बीच के संघर्ष की यह व्यंग्यात्मक कहानी दोनों ही मोर्चों पर विफल रह गयी है.

असल घटना से प्रेरित कहानी

यह फ़िल्म 2017 की एक असल घटना पर आधारित है. जब पीलीभीत के लोग सरकारी मुआवजे के लालच में अपने घर के बुजुर्गों को जंगल में छोड़ आने लगे थे,ताकि बाघ उनका शिकार कर लें और वह सरकारी मुआवजे के हकदार बन जाए. यह घटना जब चर्चा में आयी,तो लोगों ने गरीबी की इसकी वजह बताया था. इस कहानी में भी बाघ है, गरीबी भी है, लेकिन कहानी में थोड़ा ट्विस्ट है. कहानी जुंढाव नामक गांव के एक सरपंच गंगाराम( पंकज त्रिपाठी) की है. जंगल के नज़दीक उसका गांव है. जंगली जानवर गांव की फसलों को आए दिन नष्ट कर रहे हैं. गांव भुखमरी के कगार पर पहुंच चुका है. गंगाराम सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता रहता है कि कोई ऐसी सरकारी स्कीम मिल जाए, जिससे उसके गांववालों का भला हो सके,लेकिन उसे निराशा ही मिलती है. सरकारी दफ्तरों के इसी चक्कर में उसे मालूम पड़ता है कि कोई व्यक्ति अगर टाइगर के हमले में मारा जाता है तो उसके परिवार को 10 लाख का मुआवजा मिलेगा फिर क्या था वह अपनी कुर्बानी देने को तैयार हो जाता है, ताकि उसके गांव का भला हो जाए और उसे वह महानता हासिल हो सके. जिसका वह सपना हमेशा से देखा करता था. क्या वह कुर्बानी दे पाएगा? क्या गांव का भला होगा. यही कहानी है.

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यहां हो गयी चूक

फ़िल्म की कहानी प्रकृति,गरीबी,इंसान,विकास सहित कई मुद्दों को अपनी सशक्त बात रखना चाहती है लेकिन मुद्दों की अधिकता और कमज़ोर लेखन किसी भी विषय के साथ पूरी तरह से न्याय नहीं होने दे पाती है. फ़िल्म बहुत स्लो है. असल मुद्दे पर आने में वक़्त लेती है।सृजित गांव की गरीबी और भुखमरी को उस तरह से कहानी में नहीं ला पाए हैं. जो इस फ़िल्म की सबसे बड़ी जरूरत थी. स्क्रिप्ट के साथ साथ एडिटिंग भी फ़िल्म की कमज़ोर रह गयी है. दृश्यों का दोहराव है.

यहां जमा है मामला खूब

इस फ़िल्म की सबसे बड़ी यूएसपी पंकज त्रिपाठी का अभिनय है. उन्होंने बहुत मासूमियत के साथ अपने किरदार को जिया है,जिससे स्क्रिप्ट की खामियों के बावजूद आपको उनके किरदार से प्यार हो ही जाता है. नीरज काबी मेहमान भूमिका में भी याद रह जाते हैं. पंकज त्रिपाठी के साथ उनके बीच के दृश्य रोचक बनें हैं.अभिनय के अलावा इस फ़िल्म की दूसरी खूबी इसका गीत-संगीत है. जो इसके विषय के साथ ना सिर्फ न्याय करता है बल्कि एक रंग भी भरता है. संत कबीर,गुलज़ार से लेकर सोशल मीडिया में ट्रेंड हुए राहगीर के गाने इस फिल्म में है. फ़िल्म की खूबियों में इसकी सिनेमेटोग्राफी का भी जिक्र ज़रूरी है. जंगल के दृश्य फ़िल्म की खूबसूरती को बढ़ाते हैं.

चलते चलते

अगर आप पंकज त्रिपाठी के जबरदस्त फैन हैं,तो यह फ़िल्म आप उनके अभिनय के लिए देख सकते हैं.

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