“फूड सेफ्टी की पोस्टिंग को कभी ‘पनिशमेंट पोस्टिंग’ यानी सजा वाली पोस्टिंग समझा जाता था. लेकिन अब इस सोच को बदलने की जरूरत है.” यह कहना है FSSAI के CEO राजित पुनहानी का. उन्होंने महाराष्ट्र FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे के काम की तारीफ करते हुए कहा कि हर राज्य में एक डेडिकेटेड फूड सेफ्टी कमिश्नर होना चाहिए.
तुकाराम मुंढे ने मई 2026 में महाराष्ट्र FDA कमिश्नर का पद संभाला. इसके बाद राज्य में फूड कारोबार, होटल, रेस्टोरेंट और डेयरी समेत कई जगहों पर बड़े स्तर पर जांच शुरू हुई. खास बात यह रही कि यह कार्रवाई मौजूदा टीम के साथ की गई.
लेकिन सवाल यह है कि क्या फूड सेफ्टी का मतलब सिर्फ छापेमारी, सामान जब्त करना और लाइसेंस सस्पेंड करना है? या इसके पीछे एक बड़ा सिस्टम काम करता है? इसे समझने के लिए पहले महाराष्ट्र की कार्रवाई पर नजर डालते हैं.
महाराष्ट्र में आखिर हुआ क्या?
25 मई से 31 जुलाई 2026 के बीच महाराष्ट्र FDA ने 3137 फूड कारोबारों की जांच की. इनमें से 764 को सुधार के नोटिस दिए गए और 165 के लाइसेंस सस्पेंड किए गए.
इस दौरान करीब 28.66 लाख किलो फूड प्रोडक्ट जब्त या नष्ट किए गए, जिनकी कीमत करीब 55.72 करोड़ रुपये थी. 658 आउटलेट्स से करीब 15.11 करोड़ रुपये का गुटखा और पान मसाला भी पकड़ा गया.
इन आंकड़ों से एक बात साफ है कि हर जांच का मतलब सीधे कार्रवाई नहीं है. गड़बड़ी मिलने पर उसकी गंभीरता के हिसाब से सुधार का नोटिस, लाइसेंस सस्पेंशन या दूसरी कार्रवाई की जाती है.
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सिर्फ कार्रवाई नहीं, तरीका भी मायने रखता है
तुकाराम मुंढे की कार्रवाई की तारीफ हुई, लेकिन कुछ मामलों में उनकी टीम की कार्यशैली पर सवाल भी उठे. कुछ कारोबारियों ने FDA की कार्रवाई को कोर्ट में चुनौती दी. इससे यह भी सामने आया कि फूड सेफ्टी में सख्ती के साथ तय नियम और सही प्रक्रिया का पालन जरूरी है.
यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है - आखिर फूड सेफ्टी होती क्या है?
WHO के 2026 के अनुमान के मुताबिक असुरक्षित खाना हर साल करीब 86.6 करोड़ लोगों को बीमार करता है और करीब 15 लाख मौतों से जुड़ा है. यानी यह सिर्फ किसी एक दुकान या किसी एक शहर की समस्या नहीं है.
भारत में फूड सेफ्टी का कानून क्या कहता है?
भारत में फूड सेफ्टी के लिए सबसे बड़ा कानूनी आधार है Food Safety and Standards Act, 2006. इस कानून के तहत FSSAI बनाई गई. इसका मकसद देश में खाने के लिए वैज्ञानिक आधार पर मानक तय करना और फूड के निर्माण, स्टोरेज, वितरण, बिक्री और आयात को रेगुलेट करना है. इस कानून में अलग-अलग तरह की गड़बड़ियों के लिए अलग प्रावधान हैं.
असुरक्षित खाने के मामलों में सजा नुकसान की गंभीरता के हिसाब से बढ़ सकती है. अगर किसी मामले में मौत होती है तो कानून में कम से कम 7 साल की सजा से लेकर उम्रकैद और कम से कम 10 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है.
FSSAI और राज्य का FDA क्या करते हैं?
यहां अक्सर लोगों को भ्रम होता है कि फूड सेफ्टी की हर जांच FSSAI खुद करती है. ऐसा नहीं है. FSSAI देश के लिए फूड सेफ्टी के मानक और नियम बनाने वाली मुख्य संस्था है.
वहीं जमीन पर फूड कारोबारों की जांच और कानून लागू करने की बड़ी जिम्मेदारी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की फूड सेफ्टी अथॉरिटी की होती है. यानी महाराष्ट्र में जो कार्रवाई दिख रही है, उसमें महाराष्ट्र FDA की फील्ड मशीनरी की बड़ी भूमिका है.
यही वजह है कि FSSAI CEO का हर राज्य में डेडिकेटेड फूड सेफ्टी कमिश्नर होने की बात करना महत्वपूर्ण है. अब जानते है किसी फूड कारोबार पर कार्रवाई के बारे में.
हर फूड कारोबार के लिए लाइसेंस जरूरी क्यों है?
कानून के तहत फूड कारोबार चलाने वालों के लिए लाइसेंस या रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था है. इसका मकसद सिर्फ फीस लेना नहीं है. इससे सरकार को यह पता रहता है कि कौन खाना बना रहा है, बेच रहा है, स्टोर कर रहा है या सप्लाई कर रहा है. इसके साथ फूड कारोबारियों को तय हाइजीन और फूड सेफ्टी नियमों का पालन करना होता है.
यानी सिस्टम का पहला सवाल यही है:
आप खाना बेच रहे हैं, तो सरकार के रिकॉर्ड में आपका कारोबार है या नहीं?
फिर इतनी बड़ी व्यवस्था के बावजूद समस्या क्यों बनी हुई है?
यहीं भारत की फूड सेफ्टी व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है. कानून की कमी ही पूरी कहानी नहीं है. असल सवाल है - इतने बड़े देश में कानून को जमीन पर लागू कैसे किया जाए?
मार्च 2026 में संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, देश में फूड सेफ्टी ऑफिसर की 4,208 पोस्ट मंजूर थीं. लेकिन इनमें से 2,997 पोस्ट ही भरी हुई थीं. डेजिग्नेटेड ऑफिसर्स की 718 मंजूर पोस्ट में 668 भरी हुई थीं. वहीं FSSAI की 822 सैंक्शंड ऑफिसर पोस्ट में 1 जनवरी 2026 तक 320 वैकेंसी थीं.
इस डाटा को देखने से यह बात तो साफ हो गई कि फील्ड से लेकर केंद्रीय स्तर तक मैनपावर का गैप मौजूद है. जब निगरानी का काम पूरे देश के करोड़ों कंज्यूमर्स और बहुत बड़े फूड कारोबार से जुड़ा हो, तो यह गैप मामूली बात नहीं है.
सिर्फ अधिकारी नहीं, लैब भी जरूरी है
फूड सेफ्टी अधिकारी किसी खाने को देखकर हमेशा यह तय नहीं कर सकता कि उसमें कौन सा रसायन या माइक्रोबियल खतरा मौजूद है. इसके लिए लैब टेस्टिंग जरूरी होती है.
अगस्त 2026 तक देश में 259 NABL-एक्रेडिटेड फूड टेस्टिंग लैब और 24 रेफरल लैब थीं. इसके अलावा 305 मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब भी तैनात की गई थीं.
मोबाइल लैब का फायदा यह है कि कई जगहों पर मौके पर ही शुरुआती टेस्टिंग की जा सकती है. लेकिन बड़ी समस्या सिर्फ लैब की संख्या नहीं है. सैंपल सही तरीके से लेना, उसे समय पर लैब भेजना, टेस्टिंग की क्वालिटी बनाए रखना और रिपोर्ट के आधार पर समय पर कार्रवाई करना भी उतना ही जरूरी है.
देश में हर साल कितने फूड सैंपल फेल होते हैं?
13 मार्च 2026 को जारी सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बड़े पैमाने पर सैंपल की जांच होती है. लेकिन हर साल हजारों सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरते.
पिछले वर्षों का फूड टेस्टिंग डेटा
| वित्त वर्ष | जांचे गए सैंपल | मानकों पर खरे नहीं |
| 2020-21 | 1,07,829 | 28,347 |
| 2021-22 | 1,44,345 | 32,934 |
| 2022-23 | 1,77,511 | 44,626 |
| 2023-24 | 1,70,513 | 33,808 |
| 2024-25 | 1,70,535 | 34,388 |
2024-25 में करीब 1.70 लाख सैंपल की जांच हुई और 34,388 सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे. उसी साल 1,265 मामलों में दोष साबित हुई और करीब 38.77 करोड़ रुपये की पेनल्टी लगाई गई. (Press Information Bureau)
यहां एक बात समझना जरूरी है.
नॉन-कन्फॉर्मिंग का मतलब हर मामले में खाना जानलेवा होना नहीं है. इसमें अलग-अलग तरह की गड़बड़ियां शामिल हो सकती हैं. जैसे घटिया क्वालिटी, लेबलिंग की कमी या दूसरी तय शर्तों का पालन न करना.
अब सवाल आता है - इतनी जांच के बाद भी मिलावट क्यों दिखती है?
भारत का फूड मार्केट बहुत बड़ा और बिखरा हुआ है. एक तरफ बड़ी कंपनियां हैं, तो दूसरी तरफ छोटे निर्माता, डेयरी, मिठाई की दुकानें, ढाबे, रेस्टोरेंट और स्ट्रीट फूड कारोबारी हैं. सभी तक एक जैसा निगरानी सिस्टम पहुंचाना आसान नहीं है.
इसीलिए FSSAI Risk Based Inspection System यानी RBIS पर जोर देता है. इसमें हर कारोबार को एक जैसा नहीं देखा जाता. ज्यादा रिस्क वाले कारोबारों में ज्यादा निगरानी और जांच की जरूरत होती है. दूध और डेयरी जैसे सेक्टर इसका उदाहरण हैं.
दूध से लेकर नकली लेबल तक, समस्या कितनी अलग है?
फूड सेफ्टी की समस्या सिर्फ मिलावट तक सीमित नहीं है. महाराष्ट्र में हाल में इसके अलग-अलग मामले सामने आए.
एनालॉग पनीर: FDA के मुताबिक 308 सैंपल में 89 घटिया और 38 असुरक्षित पाए गए. इसके बाद एनालॉग पनीर पर एक साल की रोक लगाई गई.
नकली लेबल: नवी मुंबई में ब्रांडेड प्रोडक्ट्स की एक्सपायरी डेट और न्यूट्रिशन लेबल बदलने की कथित व्यवस्था सामने आई. इसमें Lay’s, Maggi और Thums Up जैसे प्रोडक्ट्स के पैकेजिंग से जुड़ी सामग्री मिली.
खुला एडिबल ऑयल: महाराष्ट्र में खुले तेल पर सख्ती शुरू हुई, लेकिन छोटे कारोबारियों ने अचानक बदलाव पर चिंता जताई. सरकार ने उन्हें नियमों के मुताबिक ढलने के लिए एक साल का समय दिया.
यानी फूड सेफ्टी में कंज्यूमर की सेफ्टी और कारोबारियों पर पड़ने वाले असर, दोनों का संतुलन जरूरी है.
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दुनिया के दूसरे देशों में फूड सेफ्टी कैसे संभाली जाती है?
अब भारत की व्यवस्था को दूसरे बड़े सिस्टम से समझते हैं. यहां तुलना का मकसद यह कहना नहीं है कि कोई एक देश पूरी तरह सही है और दूसरा गलत. हर देश की आबादी, बाजार और कानून अलग हैं. फिर भी कुछ बड़े अंतर समझना जरूरी है.
दूसरे देशों से भारत क्या सीख सकता है?
USA: यहां जोर समस्या होने के बाद कार्रवाई से ज्यादा उसे पहले रोकने पर है. FSMA (Food Safety Modernization Act) के तहत फूड कारोबार को संभावित खतरों की पहचान, प्रिवेंटिव कंट्रोल, मॉनिटरिंग और रिकॉर्ड रखने पर ध्यान देना होता है.
EU: यहां ट्रेसबिलिटी अहम है. किसी प्रोडक्ट में गड़बड़ी मिलने पर यह पता लगाया जा सकता है कि वह कहां बना, कच्चा माल कहां से आया और किन जगहों तक पहुंचा. RASFF (Rapid Alert System for Food and Feed) जैसे सिस्टम से अलग-अलग देशों के बीच फूड सेफ्टी अलर्ट तेजी से शेयर किए जाते हैं.
Japan: यहां फूड सेफ्टी में साइंस-बेस्ड रिस्क असेसमेंट पर जोर है. पहले वैज्ञानिक तरीके से खतरे का असर समझा जाता है, फिर उसके आधार पर नियम और कार्रवाई तय होती है.
भारत के लिए सीख
भारत में भी FSSAI, राज्य की फूड सेफ्टी अथॉरिटी, लैब, सैंपलिंग और RBIS (Real-time Beneficiary Identification System) जैसी व्यवस्थाएं हैं. बड़ी चुनौती इन्हें देशभर में लगातार और एक जैसी मजबूती से लागू करना है. दूसरे देशों की तरह प्रिवेंशन, ट्रेसबिलिटी और रिस्क-बेस्ड सिस्टम को और मजबूत करना इसमें मदद कर सकता है.
और यहीं से तुकाराम मुंढे का मामला महत्वपूर्ण हो जाता है
FSSAI CEO राजित पुनहानी का बयान इसी वजह से अहम है. मुंढे की कार्रवाई ने दिखाया कि मौजूदा सिस्टम को गंभीरता से लागू किया जाए तो बड़े स्तर पर काम हो सकता है.
लेकिन फूड सेफ्टी की असली सफलता सिर्फ छापेमारी, लाइसेंस सस्पेंड करने या सामान जब्त करने में नहीं है. फूड सेफ्टी की सबसे बड़ी सफलता यह होनी चाहिए कि असुरक्षित खाना बाजार तक पहुंचे ही नहीं और लोगों की सेहत खतरे में न पड़े.
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