7 रुपये का अंडा 3.5 रुपये में क्यों बेच रहे किसान? देश के एग सिटी पर आया संकट

Egg Prices Down: भारत की एग सिटी नमक्कल इन दिनों गहरे संकट में है. लाल सागर में जारी तनाव के चलते एक्सपोर्ट ठप हो गया है, जिससे 3.5 करोड़ अंडे समंदर में फंसे हैं. भारी स्टॉक के दबाव में किसान 7 रुपये का अंडा महज 3.5 रुपये में बेचने को मजबूर हैं.

Egg Prices Down: तमिलनाडु का नमक्कल जिला, जिसे पूरे भारत में एग सिटी के नाम से पहचाना जाता है, इन दिनों गहरे वित्तीय संकट से जूझ रहा है. लाल सागर और मिडिल ईस्ट में चल रहे अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण यहां का पोल्ट्री उद्योग पूरी तरह डगमगा गया है. स्थिति इतनी गंभीर है कि विदेशों के लिए निकला करोड़ों का माल बीच रास्ते में ही फंसा हुआ है.

क्यों फंसा है 16 करोड़ का माल?

नमक्कल से खाड़ी देशों के लिए करीब 3.5 करोड़ अंडे 70 अलग-अलग कंटेनरों में लादकर भेजे गए थे. लेकिन युद्ध और असुरक्षित समुद्री रास्तों के चलते ये जहाज अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सके हैं. एक अनुमान के मुताबिक, हर अंडे की कीमत 4.80 रुपये है, इस हिसाब से लगभग 16-17 करोड़ रुपये का माल इस वक्त समंदर में फंसा है. कंटेनर का किराया और अन्य खर्चों को जोड़ दें तो किसानों का नुकसान और भी बड़ा है.

घरेलू बाजार में कीमतों में भारी गिरावट

नमक्कल भारत का सबसे बड़ा अंडा निर्यातक केंद्र है, जो देश के कुल एक्सपोर्ट का लगभग 95% हिस्सा संभालता है. जब विदेशों में अंडे नहीं जा पा रहे, तो सारा स्टॉक घरेलू बाजार में खपाने की कोशिश हो रही है.

  • अचानक सप्लाई बढ़ने से स्थानीय बाजार में अंडों की भरमार हो गई है.
  • अंडों की शेल्फ लाइफ (खराब होने की अवधि) बहुत कम होती है, इसलिए किसान इन्हें जल्दी से जल्दी बेचने को मजबूर हैं.
  • इसी जल्दबाजी और ओवर-सप्लाई के कारण अंडों के दाम बुरी तरह गिर गए हैं.

लागत से भी कम दाम में बिक्री

पोल्ट्री मालिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती प्रोडक्शन कॉस्ट और सेलिंग प्राइस के बीच का अंतर है. एक अंडा तैयार करने में लगभग 5 रुपये का खर्च (दाना, देखरेख, बिजली) आता है, लेकिन फिलहाल किसानों को इसे महज 3.50 रुपये में बेचना पड़ रहा है. यानी हर अंडे पर किसानों को करीब डेढ़ रुपये का सीधा घाटा हो रहा है.

छोटे पोल्ट्री फार्म बंद होने की कगार पर

विशेषज्ञों के अनुसार, नमक्कल में रोजाना 7 करोड़ अंडे पैदा होते हैं. इस एक्सपोर्ट ठप होने से पोल्ट्री सेक्टर को हर दिन लगभग 10.5 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है. यदि जल्द ही शिपिंग के लिए सुरक्षित रास्ता नहीं मिला या एक्सपोर्ट फिर से शुरू नहीं हुआ, तो कई छोटे और मंझोले पोल्ट्री फार्म हमेशा के लिए बंद हो सकते हैं. एक्सपोर्टर्स अब वैकल्पिक रास्ते तलाशने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन शिपिंग कंपनियां जोखिम लेने से अभी भी कतरा रही हैं.

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लेखक के बारे में

By Anshuman Parashar

अंशुमान पराशर पिछले दो वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल के लिए बिजनेस की लेटेस्ट खबरों पर काम कर रहे हैं. इसे पहले बिहार की राजनीति, अपराध पर भी इन्होंने खबरें लिखी हैं. बिहार विधान सभा चुनाव 2025 में इन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग और विस्तृत राजनीतिक कवरेज किया है.

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