सेंसेक्स 285 अंक नीचे, Nifty भी लाल, क्रूड ऑयल 90 डॉलर के पार पहुंचते ही बाजार पर बढ़ा दबाव

सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली का माहौल दिखा. वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी.

कारोबार के दौरान BSE सेंसेक्स 284.52 अंक यानी 0.37 फीसदी गिरकर 76,979.99 पर रहा. वहीं, NSE निफ्टी 50 58.10 अंक यानी 0.24 फीसदी टूटकर 24,117.55 पर कारोबार करता दिखा.

बाजार पर दबाव की वजहें क्या हैं?

मार्केट एक्सपर्ट अजय बग्गा के मुताबिक, ग्लोबल मार्केट्स इस समय एक साथ कई बड़े घटनाक्रमों का असर झेल रहे हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नए सिरे से तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों में फिर से तेजी आई है. इसके अलावा, जैक्सन होल में अमेरिकी फेडरल रिजर्व चेयर केविन वॉर्श की महंगाई को लेकर सख्त टिप्पणियों ने भी बाजार का मूड बिगाड़ा. उन्होंने 2 फीसदी के इन्फ्लेशन टारगेट को दोहराते हुए कहा कि फेड को इस बात का भरोसा होना चाहिए कि महंगाई साफ तौर पर और पर्याप्त तेजी से तय लक्ष्य की ओर बढ़ रही है.

मार्केट ने इस रुख को हॉकीश यानी सख्त माना है, जिससे 16 सितंबर की फेड मीटिंग में इंटरेस्ट रेट बढ़ने की उम्मीद बढ़ी है. ऊंची ब्याज दरें भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स के लिए दबाव पैदा कर सकती हैं.

एशियाई बाजारों में कैसा रहा माहौल?

भारतीय बाजार अकेले दबाव में नहीं थे। सोमवार को ज्यादातर एशियाई मार्केट्स भी लाल निशान में रहे.

बाजारबदलाव
साउथ कोरिया कोस्पी-1.46%
ताइवान वेटेड इंडेक्स-1.17%
जापान निक्केई 225-1.08%
गिफ्ट निफ्टी-0.61%
स्ट्रेट्स टाइम्स+0.45%
थाईलैंड सेट कंपोजिट+0.18%

अमेरिकी मार्केट्स से भी कमजोर संकेत मिले. डाउ जोन्स फ्यूचर्स में गिरावट रही, जबकि एसएंडपी 500 और टेक-हेवी नैस्डैक भी लाल निशान में बंद हुए.

भारत के लिए महंगा क्रूड ऑयल क्यों चिंता की बात है?

रिपोर्टिंग के समय ब्रेंट क्रूड 2.27 फीसदी चढ़कर 90.10 डॉलर प्रति बैरल और WTI क्रूड ऑयल 2.03 फीसदी बढ़कर 85.09 डॉलर पर पहुंच गया. भारत दुनिया के बड़े क्रूड ऑयल इम्पोर्टर्स में शामिल है, इसलिए लंबे समय तक तेल महंगा रहने से देश की इकोनॉमी पर दबाव बढ़ सकता है.

बग्गा के मुताबिक, भारत वित्त वर्ष 2027 की दूसरी छमाही में तीन तरफ से दबाव का सामना कर रहा है. ऊंचा क्रूड ऑयल, सामान्य से कम मानसून और हॉकीश अमेरिकी फेड के साथ ईरान कॉन्फ्लिक्ट से बढ़ा ग्लोबल तनाव. ऐसे में रुपये पर दबाव और इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन बढ़ने की चिंता रहती है.

निवेशकों के लिए आगे क्या संकेत हैं?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि मौजूदा हालात में पूरे बाजार को लेकर ज्यादा आशावादी होने के बजाय सेलेक्टिव पोजिशनिंग बेहतर हो सकती है. भारतीय बाजार में अर्निंग्स सीजन भी मिला-जुला रहा है और पिछले चार हफ्तों से प्रमुख इंडेक्स सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव के साथ कंसोलिडेशन में हैं.

हालांकि, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स यानी डीआईआई बाजार को सहारा देते दिखे. देवार्श वकिल के अनुसार, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स यानी एफआईआई करीब 150 करोड़ रुपये के नेट सेलर रहे, जबकि डीआईआई ने लगभग 12,500 करोड़ रुपये का निवेश किया. यानी विदेशी बिकवाली के बीच घरेलू खरीदारी फिलहाल बाजार के लिए एक अहम सहारा बनी हुई है.

सोने में भी गिरावट दर्ज की गई और यह 0.68 फीसदी फिसलकर 4,422.93 डॉलर पर रहा. अब निवेशकों की नजर वेस्ट एशिया के हालात, कच्चे तेल की चाल और अमेरिकी फेड के अगले फैसले पर रहेगी.

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लेखक के बारे में

By सौम्या शाहदेव

सौम्या शाहदेव प्रभात खबर डिजिटल में बिजनेस कंटेंट राइटर हैं. वह शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, टैक्स, सरकारी योजनाओं, बैंकिंग और रोजमर्रा की आर्थिक खबरों को सरल और सटीक भाषा में पाठकों तक पहुंचाती हैं. उनका फोकस ऐसी खबरें लिखने पर रहता है जो सीधे आम लोगों की जिंदगी और जेब पर असर डालती हैं.

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