RAC Tickets Refund: संसद की लोक लेखा समिति (PAC) ने भारतीय रेलवे के कामकाज को लेकर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट पेश की है. ‘भारतीय रेलवे में ट्रेनों की समयबद्धता और यात्रा समय’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में यात्रियों की जेब और ट्रेनों की रफ्तार से जुड़े कई कड़े सवाल उठाए गए हैं. समिति ने साफ तौर पर कहा है कि रेलवे को अपनी कई पुरानी नीतियों में बदलाव करने की जरूरत है.
एक सीट पर दो लोग, फिर पूरा किराया क्यों?
समिति ने RAC (Reservation Against Cancellation) श्रेणी में यात्रा करने वाले यात्रियों के प्रति सहानुभूति जताते हुए कहा कि उनसे पूरा किराया वसूलना ‘अन्यायपूर्ण’ है. वर्तमान नियम के अनुसार, यदि चार्ट बनने के बाद भी टिकट RAC में रहता है, तो दो यात्रियों को एक ही लोअर बर्थ साझा करनी पड़ती है. समिति का तर्क है कि जब यात्री को पूरी बर्थ की सुविधा ही नहीं मिल रही, तो वह पूरी कीमत क्यों चुकाए? PAC ने रेल मंत्रालय को सुझाव दिया है कि वह ऐसी व्यवस्था बनाए जिससे RAC यात्रियों को उनके किराए का एक हिस्सा रिफंड के तौर पर वापस मिल सके.
सुपरफास्ट ट्रेनों के नाम पर ‘अतिरिक्त बोझ’
रिपोर्ट में सुपरफास्ट ट्रेनों के क्लासिफिकेशन (वर्गीकरण) को लेकर भी रेलवे को आड़े हाथों लिया गया है. समिति ने पाया कि रेलवे अभी भी 2007 के पुराने मानकों पर चल रहा है, जहाँ 55 किमी/घंटा की औसत रफ्तार वाली ट्रेन को ‘सुपरफास्ट’ मान लिया जाता है.
समिति ने ऑडिट के हवाले से बताया कि कुल 478 सुपरफास्ट ट्रेनों में से 123 ट्रेनें निर्धारित 55 किमी/घंटा की रफ्तार भी नहीं पकड़ पा रही हैं. रेलवे ने इसके पीछे ‘अत्यधिक स्टॉपेज’ का बहाना बनाया, जिसे समिति ने खारिज कर दिया.रिपोर्ट के अनुसार, कई ट्रेनों को सुपरफास्ट कैटेगरी में सिर्फ इसलिए रखा गया है ताकि यात्रियों से ‘सुपरफास्ट सरचार्ज’ के रूप में अधिक पैसे वसूले जा सकें.
वैश्विक मानकों से पीछे है रफ्तार
PAC ने 55 किमी/घंटा की बेंचमार्क गति को ‘पुराना और पिछड़ा’ बताया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जहाँ चीन और जापान जैसे देश बुलेट ट्रेनों के युग में हैं, वहाँ भारत में सुपरफास्ट का मानक बहुत कम है. समिति ने सिफारिश की है कि रेलवे को सुपरफास्ट ट्रेनों की औसत गति 100 किमी/घंटा के करीब ले जाने का लक्ष्य रखना चाहिए और साल 2030 तक इसे पूरे सफर में लागू करने की योजना बनानी चाहिए.
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