Petrol Diesel Price: बीते कुछ दिनों से लगातार ऊंचाई पर बनी हुई कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में अब नरमी देखने को मिल रही है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) का भाव 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे फिसल गया. इस गिरावट के बाद तेल की कीमतें फिर से उस स्तर के करीब पहुंच गई हैं, जहां वे अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने से पहले थीं. कीमतों में आई इस कमी का सबसे बड़ा कारण होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के जरिए तेल आपूर्ति का फिर से सामान्य हो जाना है. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि देश में एक बार फिर पेट्रोल और डीजल की बढ़ी हुई कीमत कम होंगी. लेकिन, गुरुवार को तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी नहीं की.
क्यों नहीं घटे पेट्रोल-डीजल के दाम?
ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में रोजाना होने वाले उतार-चढ़ाव के आधार पर तय नहीं की जातीं हैं. आमतौर पर पिछले दो सप्ताह या एक महीने की औसत कच्चे तेल की कीमतों को आधार बनाया जाता है. ऐसे में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहती हैं, तभी इसका फायदा पेट्रोल पंपों तक पहुंच सकता है. इससे पहले वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद भी करीब ढाई महीने तक खुदरा कीमतें स्थिर रखी थीं, और उसके बाद ही कीमतों में बढ़ोतरी की गई.
होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही शुरु होने से मिली राहत
तेल की कीमतों में गिरावट का एक बड़ा कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल सप्लाई का सामान्य होना है. इस जलमार्ग से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की आवाजाही होती है. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, पिछले 24 घंटों में इस रास्ते से करीब दो करोड़ बैरल तेल की आवाजाही हुई है और सप्लाई का स्तर युद्ध के पहले की स्थिति के करीब पहुंच गया है.
भारत के आयातित कच्चे तेल की कीमत क्या है?
पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, 24 जून को भारत की ओर से आयात किए गए कच्चे तेल की औसत कीमत 70.71 डॉलर प्रति बैरल रही. तुलना करें तो 27 फरवरी को यह कीमत 71.17 डॉलर प्रति बैरल थी. वहीं जून महीने के दौरान औसत कीमत 86.31 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई.
घट सकती है महंगाई
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का सीधा असर ट्रांसपोर्ट, विनिर्माण (Manufacturing) और ईंधन की लागत (Fuel Cost) पर पड़ता है. इससे तीजों की लागत कम हो सकती है, जिसके कारण खुदरा महंगाई पर दबाव घटने की संभावना है, यानी चीजों की कीमतों में कमी आ सकती है.
कई उद्योगों को मिलेगा फायदा
तेल की कीमतों में नरमी से कई उद्योगों को सीधा लाभ हो सकता है. इनमें…
- विमानन क्षेत्र
- लॉजिस्टिक्स और परिवहन
- पेंट उद्योग
- रसायन उद्योग
- उपभोक्ता वस्तु (FMCG) क्षेत्र शामिल हैं.
रुपये को भी मिल सकती है मजबूती
कच्चे तेल की कीमतों में कमी होने से ऊर्जा खरीद के लिए डॉलर की मांग घटती है. इससे भारतीय रुपये को मजबूती मिल सकती है. कम आयात बिल से आयातित महंगाई (Imported inflation) काबू में रहती है और घरेलू खपत को बढ़ावा मिलता है, जो आर्थिक विकास के लिए अहम माना जाता है. ऐसे में अगर तेल की कीमतें नियंत्रित बनी रहती हैं और महंगाई दर कम रहती है तो आरबीआई के लिए उदार मौद्रिक नीति बनाए रखना आसान हो सकता है. इसके अलावा कम ब्याज दर और बेहतर आर्थिक माहौल से निवेश और खपत दोनों को बढ़ावा मिल सकता है.
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