Petrol-Diesel Price: दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से पश्चिम एशिया के संकट ने ग्लोबल अर्थव्यवस्था को हिला दिया है. इस युद्ध की सबसे बड़ी चोट कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ी है, जिसका असर अब भारत में पेट्रोल पंपों पर दिखने की आशंका जताई जा रही है.
कच्चे तेल की कीमतों में ‘आग’
अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस हफ्ते कच्चा तेल 126 डॉलर प्रति बैरल तक उछल गया, जो पिछले 4 सालों में सबसे महंगा स्तर है. फिलहाल यह 110 डॉलर के ऊपर बना हुआ है. ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) से जहाजों की आवाजाही में ईरान की बाधाओं ने सप्लाई चेन को और भी मुश्किल बना दिया है.
तेल कंपनियों का ‘भारी भरकम’ घाटा
सरकारी सूत्रों और तेल मंत्रालय के अनुसार, पिछले 4 सालों से भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें लगभग स्थिर बनी हुई हैं. इसका परिणाम यह है कि सरकारी तेल कंपनियों को हर लीटर की बिक्री पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है:
- पेट्रोल पर नुकसान: लगभग ₹20 प्रति लीटर
- डीजल पर नुकसान: लगभग ₹100 प्रति लीटर
क्या है मौजूदा स्थिति ?
भले ही घाटा बढ़ रहा है, लेकिन 1 मई को इंडियन ऑयल (IOC) ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी (14.2kg) की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. हालांकि, कंपनियों ने अन्य क्षेत्रों में कीमतें बढ़ा दी हैं:
- कमर्शियल गैस सिलेंडर महंगे हुए हैं.
- औद्योगिक डीजल की कीमतों में वृद्धि हुई है.
- हवाई ईंधन (Jet Fuel) के दाम बढ़ा दिए गए हैं.
कब तक बनी रहेगी राहत ?
सवालों के घेरे में सबसे बड़ी बात यही है कि तेल कंपनियां कब तक इस घाटे को सह पाएंगी? सरकारी सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्ट्स के अनुसार, अगले कुछ दिनों में कीमतों में वृद्धि से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता. यदि शांति वार्ता सफल नहीं होती और कच्चे तेल के दाम ऊंचे बने रहते हैं, तो आम जनता पर महंगाई की मार पड़ना तय है.
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