सेमीकंडक्टर में आत्मनिर्भरता भारत के लिए अब ‘चॉइस’ नहीं मजबूरी; 2035 तक $240 अरब पहुंच सकता है आयात का बोझ

NITI Aayog Report : ‘विकसित भारत 2047’ के लिए चिप में आत्मनिर्भरता जरूरी! नीति आयोग ने चेताया- अगर अभी कदम नहीं उठाए, तो 2035 तक ₹20 लाख करोड़ पार कर जाएगा सेमीकंडक्टर आयात का खर्च.

NITI Aayog Report : भारत को अपने आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और ‘विकसित भारत 2047’ के सपने को साकार करने के लिए घरेलू सेमीकंडक्टर (चिप) इकोसिस्टम के निर्माण में अपनी पूरी ताकत झोंकनी होगी. सरकारी थिंक-टैंक नीति आयोग (NITI Aayog) की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वैश्विक सप्लाई चेन तेजी से बदल रही है और भारत के पास इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए समय की खिड़की (विंडो) लगातार छोटी होती जा रही है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार के ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (ISM) से बदलाव तो आ रहा है और गुजरात के धोलेरा में देश का पहला कमर्शियल चिप फैब्रिकेशन प्लांट (Fab) साल 2028 तक उत्पादन शुरू भी कर देगा, लेकिन वैश्विक स्तर पर जारी रेस को देखते हुए भारत की मैन्युफैक्चरिंग अभी भी शुरुआती दौर में है.

चिप आत्मनिर्भरता क्यों है भारत के लिए ‘सुपर इमरजेंसी’?

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि स्मार्टफोन से लेकर मिसाइल डिफेंस सिस्टम तक, हर आधुनिक तकनीक की नींव ‘चिप’ ही है. भारत के लिए इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना इन 4 कारणों से बेहद जरूरी है:

  1. 95% तक आयात पर निर्भरता (सप्लाई चेन का खतरा) : वर्तमान में भारत की घरेलू चिप मांग का केवल 5 से 10 प्रतिशत हिस्सा ही देश के भीतर से पूरा होता है. बाकी का 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है. चूंकि चिप का वैश्विक उत्पादन केवल ताइवान और चीन जैसे कुछ चुनिंदा देशों में केंद्रित है, इसलिए वहां जरा सा भी तनाव या कोरोना जैसी महामारी ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और हेल्थकेयर सेक्टर को पूरी तरह ठप कर सकती है.
  2. विदेशी मुद्रा भंडार (Forex) पर भारी बोझ : रिकॉर्ड खर्च: भारत ने वित्त वर्ष 2017 से 2025 के बीच सेमीकंडक्टर आयात पर लगभग 150 अरब डॉलर (करीब ₹12.5 लाख करोड़) खर्च किए हैं. तेजी से बढ़ता ग्राफ: इस अवधि में चिप का आयात 23% की सालाना चक्रवृद्धि दर (CAGR) से बढ़ा है—जो वित्त वर्ष 2017 में 5.7 अरब डॉलर था, वह 2025 में बढ़कर 30.3 अरब डॉलर हो गया. नीति आयोग ने सचेत किया है कि अगर आयात की यही रफ्तार जारी रही, तो साल 2035 तक भारत को हर साल 240 अरब डॉलर (लगभग ₹20 लाख करोड़) सिर्फ चिप मंगाने पर खर्च करने होंगे.
  3. राष्ट्रीय सुरक्षा और डिफेंस को खतरा : डिफेंस सेक्टर को लेकर रिपोर्ट में बेहद गंभीर चिंता जताई गई है. भारत के एयरोस्पेस, नौसेना और ड्रोन (UAVs) कार्यक्रमों में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर सेमीकंडक्टर पार्ट्स विदेशी हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, “विदेशी चिप्स को हमारे सैन्य प्रणालियों में तैनात करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरों को बढ़ा रहा है.” रक्षा क्षेत्र की स्वायत्तता (Autonomy) बनाए रखने के लिए स्वदेशी चिप्स का होना अनिवार्य है.
  4. ग्रामीण भारत और 5G/6G क्रांति : देश में अगली पीढ़ी की 5G और 6G तकनीकों के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ना, रिमोट हेल्थकेयर (दूरदराज के इलाकों में इलाज) और मॉडर्न फार्मिंग (सटीक कृषि) तभी संभव है, जब इन तकनीकों से लैस स्मार्टफोन और डिवाइस सस्ते हों. ‘मेड इन इंडिया’ चिप्स हैंडसेट की कीमतों को कम करने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाएंगे.

भारत की मौजूदा ताकतें

इन चुनौतियों के बीच नीति आयोग ने भारत की उन ताकतों का भी जिक्र किया, जो हमें इस रेस में आगे रख सकती हैं.

  • ग्लोबल डिजाइन हब: दुनिया की दिग्गज सेमीकंडक्टर डिजाइन कंपनियों के कैप्टिव सेंटर भारत में हैं. दुनिया के कुल सेमीकंडक्टर डिजाइन वर्कफोर्स (इंजीनियर्स) का 20 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में है.
  • पैकेजिंग में निवेश: चिप असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग (ATMP/OSAT) के क्षेत्र में देश में तेजी से निवेश बढ़ रहा है.

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लेखक के बारे में

Published by: Abhishek pandey

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इस दौरान उन्होंने बिजनेस, शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, बैंकिंग, बजट, सरकारी योजनाएं, कृषि, MSME और अर्थव्यवस्था से जुड़े कई अहम विषयों पर रिपोर्टिंग और रिसर्च आधारित लेख लिखे हैं। इसके अलावा वे वीडियो स्क्रिप्टिंग, एक्सप्लेनर स्टोरी, डेटा स्टोरी और डिजिटल कंटेंट पर भी लगातार काम करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि जटिल आर्थिक और वित्तीय विषयों को आसान और भरोसेमंद भाषा में पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाया जाए।

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अभिषेक पाण्डेय ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से पत्रकारिता एवं जनसंचार की पढ़ाई की है। यहां उन्होंने रिपोर्टिंग, डिजिटल मीडिया, न्यूज़ राइटिंग, वीडियो प्रोडक्शन और मल्टीमीडिया जर्नलिज्म की बारीकियां सीखीं, जिनका इस्तेमाल वे आज अपनी पत्रकारिता में कर रहे हैं।

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