India External Sector Pressures: हाल ही में वित्त मंत्रालय की मार्च 2026 की रिपोर्ट ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कुछ चिंताजनक संकेत दिए हैं. दुनिया भर में जारी उथल-पुथल का असर अब भारत के बाहरी व्यापार और विदेशी मुद्रा के लेन-देन पर दिखने लगा है. सीधे शब्दों में कहें तो, भारत से बाहर जाने वाला सामान (एक्सपोर्ट) कम हो रहा है और बाहर से आने वाला सामान (इम्पोर्ट) तेजी से बढ़ रहा है, जिससे देश का ‘खर्च’ उसकी ‘कमाई’ से ज्यादा हो गया है.
व्यापार घाटा आखिर क्यों बढ़ रहा है?
रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2025 में व्यापार घाटा 14.4 अरब डॉलर था, जो फरवरी 2026 में लगभग दोगुना बढ़कर 27.1 अरब डॉलर हो गया है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारे एक्सपोर्ट में 0.8% की मामूली गिरावट आई है, जबकि इम्पोर्ट 24.1% की रफ्तार से बढ़ा है. इस बढ़ते बोझ के पीछे सबसे बड़ा हाथ सोने और चांदी की भारी खरीदारी का है. इसके अलावा, मिडिल ईस्ट में तनाव की वजह से कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी भारत के लिए सिरदर्द बन रही हैं.
विदेशी निवेश और रुपये पर क्या असर पड़ा?
ANI की रिपोट के अनुसार, दुनिया भर में बढ़ती अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशक अब जोखिम लेने से बच रहे हैं. यही वजह है कि मार्च 2026 में पोर्टफोलियो निवेश (Portfolio Flows) नेगेटिव रहा, यानी विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाला है. जब डॉलर बाहर जाता है, तो भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ता है. इसी कारण रुपये की कीमत में गिरावट (Depreciation) देखने को मिल रही है.
करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) क्यों है चिंता का विषय?
व्यापार में बढ़ते इस अंतर की वजह से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट भी बढ़ गया है. वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में यह जीडीपी का 1.3% पहुंच गया है, जो पिछले साल इसी समय 1.1% था. हालांकि भारत का ‘सर्विस सेक्टर’ अभी भी मजबूती से खड़ा है, लेकिन सामान के व्यापार में होने वाला घाटा इतना बड़ा है कि वह पूरी अर्थव्यवस्था के संतुलन को चुनौती दे रहा है.
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