प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए जल्द एक अहम बदलाव हो सकता है. वित्त मंत्रालय ने कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) की अनिवार्य वेतन सीमा ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. अब इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला केंद्रीय कैबिनेट को लेना है. अगर मंजूरी मिलती है तो पहली बार करीब 12 साल बाद EPF की अनिवार्य सीमा बदलेगी और ज्यादा कर्मचारियों को PF और पेंशन का फायदा मिलेगा.
₹25,000 की नई सीमा से किसे होगा फायदा?
फिलहाल जिन कर्मचारियों का बेसिक वेतन ₹15,000 या उससे कम है, उनके लिए EPF और कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) में शामिल होना अनिवार्य है. अगर नई सीमा लागू होती है तो ₹15,000 से ₹25,000 तक बेसिक सैलरी पाने वाले कर्मचारियों को भी EPF और EPS के दायरे में लाना जरूरी होगा. यानी इस वेतन वर्ग के कर्मचारियों को रिटायरमेंट के लिए बचत और पेंशन का लाभ मिल सकेगा.
अभी नियम क्या कहते हैं?
मौजूदा व्यवस्था में ₹15,000 से ज्यादा बेसिक सैलरी पाने वाले कर्मचारी EPF में तभी शामिल होते हैं, जब कर्मचारी और कंपनी दोनों सहमत हों. ऐसे मामलों में कंपनी के लिए EPF में रजिस्ट्रेशन कराना कानूनी रूप से जरूरी नहीं होता. नई सीमा लागू होने के बाद यह विकल्प नहीं रहेगा और तय वेतन सीमा तक आने वाले कर्मचारियों के लिए EPF में शामिल होना अनिवार्य होगा.
कंपनियों और सरकार पर क्या असर पड़ेगा?
नई व्यवस्था लागू होने से संगठित निजी क्षेत्र की कंपनियों पर PF और पेंशन के लिए ज्यादा कर्मचारियों का योगदान जमा कराने की जिम्मेदारी बढ़ेगी.
मौजूदा नियमों के तहत:
- नियोक्ता(employer) कर्मचारी के बेसिक वेतन का 8.33% कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) में जमा करता है.
- केंद्र सरकार 1.16% का योगदान देती है.
चूंकि EPF और EPS के दायरे में ज्यादा कर्मचारी आएंगे, इसलिए सरकार का खर्च भी बढ़ेगा. वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में कर्मचारी पेंशन योजना के लिए ₹11,144 करोड़ का प्रावधान किया गया है.
यह बदलाव कब से लागू हो सकता है?
यह नियम उन संस्थानों पर लागू होगा जहां 20 या उससे अधिक कर्मचारी काम करते हैं. इससे छोटे संस्थान चाहें तो स्वेच्छा से EPF में पंजीकरण करा सकते हैं. वहीं, केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि वे अलग पेंशन व्यवस्था के तहत आते हैं.
कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद भी नया नियम तुरंत लागू नहीं होगा. कंपनियों को अपने पेरोल सिस्टम और अन्य प्रक्रियाओं में बदलाव करने के लिए समय दिया जाएगा. फिलहाल इसे 1 अप्रैल 2027 से लागू किए जाने की संभावना जताई गई है, हालांकि अंतिम तारीख कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही तय होगी.
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