Crude Oil Price: बुधवार को कच्चे तेल की कीमतों में 5% से ज्यादा की भारी गिरावट आई थी, लेकिन यह राहत ज्यादा देर नहीं टिकी. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण इंटरनेशनल मार्केट में तेल की कीमतें एक बार फिर बढ़ गई हैं. सुबह के कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड 2% बढ़कर 96.21 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी क्रूड (WTI) 1.9% की तेजी के साथ 90.36 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया.
अमेरिका और ईरान के बीच नया विवाद क्या है?
ताजा तनाव की मुख्य वजह अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के सैन्य ठिकानों पर किए गए हवाई हमले (Airstrikes) हैं. अमेरिकी अधिकारियों ने इन हमलों को ‘आत्मरक्षा’ (Defensive) बताया है. इसके अलावा अमेरिकी सेना ने एक कमर्शियल जहाज पर दागे गए ड्रोन्स को भी मार गिराया. दोनों देशों के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने को लेकर गंभीर मतभेद हैं. फिलहाल ईरान और अमेरिका दोनों की तरफ से की गई नाकेबंदी (Double Blockade) के कारण यह रास्ता प्रभावित है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा है कि यह जलमार्ग सभी के लिए खुला रहेगा और अमेरिका इस पर नजर रखेगा.
बातचीत में कहां फंस रहा है पेंच?
सप्लाई रुकने के डर से बाजार को उम्मीद थी कि दोनों देश जल्द ही किसी अंतरिम समझौते (Interim Deal) पर पहुंच जाएंगे, जिससे कीमतें इस हफ्ते दूसरी बार गिरने की कगार पर थीं. लेकिन समझौते की राह में कई बड़ी चुनौतियां हैं:
- परमाणु कार्यक्रम: ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर मतभेद बरकरार हैं.
- रास्ते पर कंट्रोल: ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है.
- प्रतिबंध (Sanctions): ईरान चाहता है कि अमेरिका उस पर लगे वित्तीय प्रतिबंध हटाए और हमले रोके, जबकि राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वे किसी खराब समझौते पर राजी नहीं होंगे और प्रतिबंधों में ढील नहीं देंगे.
यह युद्ध अब अपने चौथे महीने में प्रवेश कर चुका है, जो इस साल फरवरी के अंत में शुरू हुआ था. ट्रंप पर अपनी ही पार्टी (रिपब्लिकन) के कट्टरपंथियों का भी दबाव है कि वे इस युद्ध को जारी रखें.
एक्सपर्ट्स की क्या है चेतावनी?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि बाजार अभी इस उम्मीद में शांत है कि कोई न कोई डील हो जाएगी, लेकिन अगर बातचीत टूटती है तो खतरा बहुत बड़ा है. राबोबैंक के ग्लोबल एनर्जी स्ट्रैटेजिस्ट जो डेलौरा के मुताबिक, अभी बाजार में तेल की कमी इसलिए महसूस नहीं हो रही है क्योंकि अमेरिका अपने इमरजेंसी रिजर्व (SPR) से तेल निकाल रहा है और चीन ने भी अपनी तेल की खरीद कम कर दी है. लेकिन जुलाई के मध्य तक स्थिति बदल सकती है. जब अमेरिका का इमरजेंसी रिजर्व से तेल निकालना बंद होगा और चीन दोबारा बड़ी मात्रा में इम्पोर्ट शुरू करेगा, तो तेल और उससे जुड़े रिफाइंड प्रोडक्ट्स (जैसे पेट्रोल-डीजल) की कीमतें अचानक आसमान छू सकती हैं.
इसका दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?
फरवरी से जारी इस विवाद के कारण तेल सप्लाई में आ रही रुकावटों ने वैश्विक महंगाई (Inflation) को दोबारा हवा दे दी है. इस महंगाई की वजह से बॉन्ड यील्ड (ब्याज दरों का एक पैमाना) में भारी उछाल आया है. इसके असर को काबू में करने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ समेत दुनिया के कई केंद्रीय बैंक आने वाले समय में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकते हैं, जिससे कर्ज महंगा हो सकता है.
साथ ही अमेरिका में तेल का स्टॉक भी कम हुआ है. अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) के मुताबिक, पिछले हफ्ते कच्चे तेल के स्टॉक में 28 लाख बैरल की गिरावट आई है, जिसमें ओक्लाहोमा के कुशिंग हब की गिरावट भी शामिल है. इसके आधिकारिक आंकड़े आज देर रात जारी होंगे.
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