भारत समेत दक्षिण एशिया के कई देशों में आपने अक्सर देखा होगा कि महिलाएं बाइक या स्कूटर पर पीछे बैठते समय दोनों पैर एक ही तरफ रखती हैं. यह इतना आम दृश्य है कि ज्यादातर लोग कभी इसके पीछे की वजह जानने की कोशिश ही नहीं करते. दिलचस्प बात यह है कि यह तरीका किसी वैज्ञानिक नियम या सुरक्षा मानक से नहीं जुड़ा, बल्कि इसकी जड़ें सदियों पुराने सामाजिक नियमों और विदेशी सांस्कृतिक प्रभावों में छिपी हैं. अब इस पर नई चर्चा तब शुरू हुई जब बाइक राइडर और कंटेंट क्रिएटर जेनिथ इरफान ने इसके इतिहास को विस्तार से समझाया.
यूरोप की शाही परंपरा से जुड़ा है यह तरीका
जेनिथ इरफान के मुताबिक महिलाओं के साइड में बैठने की शुरुआत दक्षिण एशिया में नहीं हुई थी. इसका इतिहास मध्यकालीन यूरोप से जुड़ा है, जहां राजघरानों की महिलाएं घोड़े पर दोनों पैर एक तरफ करके बैठती थीं. उस दौर में महिलाओं के लिए पुरुषों की तरह घोड़े पर बैठना सामाजिक तौर पर उचित नहीं माना जाता था.
ऐसे में साइड-सैडल राइडिंग को महिलाओं के लिए सम्मानजनक और शालीन तरीका माना गया. बताया जाता है कि Anne of Bohemia जैसी शाही हस्तियां भी लंबे सफर के दौरान इसी अंदाज में घुड़सवारी करती थीं.
ब्रिटिश दौर में भारत पहुंची यह आदत
जब ब्रिटिश शासन भारत और दक्षिण एशिया में आया, तो उनके साथ कई सामाजिक आदतें और जीवनशैली भी यहां पहुंचीं. धीरे-धीरे महिलाओं के साइड में बैठने का तरीका भी स्थानीय समाज में अपनाया जाने लगा.
बाद में जब मोटरसाइकिल और स्कूटर आम हुए, तो यही आदत वाहनों पर भी जारी रही. समय के साथ यह इतना सामान्य बन गया कि कई पीढ़ियों की महिलाएं इसे बिना सवाल किए अपनाती रहीं. आज भी गांवों से लेकर बड़े शहरों तक यह दृश्य आम है.
रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण बताता है अलग कहानी
जेनिथ इरफान ने इस चर्चा में रानी लक्ष्मीबाई का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि भारतीय इतिहास में ऐसी कई महिलाएं रही हैं जो पुरुषों की तरह घोड़े पर बैठकर युद्ध लड़ती थीं. रानी लक्ष्मीबाई इसका सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती हैं.
इससे यह साफ होता है कि भारतीय समाज में महिलाएं पारंपरिक रूप से astride यानी दोनों तरफ पैर रखकर सवारी करने में सक्षम थीं. लेकिन औपनिवेशिक प्रभाव और सामाजिक सोच ने धीरे-धीरे साइड में बैठने की छवि को ज्यादा स्वीकार्य बना दिया.
Women Sitting Sideways Bike: आज भी क्यों जारी है यह परंपरा?
आधुनिक समय में बाइक और स्कूटर पूरी तरह अलग तकनीक वाले वाहन बन चुके हैं. इसके बावजूद कई महिलाएं अब भी साइड में बैठना पसंद करती हैं. इसके पीछे कपड़ों की सुविधा, सामाजिक आदत, पारिवारिक संस्कार और शालीनता जैसी धारणाएं बड़ी वजह मानी जाती हैं.
हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञ अक्सर मानते हैं कि दोनों तरफ पैर रखकर बैठना ज्यादा संतुलित और सुरक्षित हो सकता है, लेकिन सामाजिक व्यवहार कई बार तकनीकी सलाह से ज्यादा प्रभावशाली साबित होता है.
सोशल मीडिया पर शुरू हुई नई बहस
जेनिथ इरफान की इस जानकारी के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने हैरानी जताई कि रोजमर्रा की इतनी सामान्य दिखने वाली आदत का संबंध यूरोप के सदियों पुराने इतिहास से हो सकता है. कई यूजर्स ने माना कि वे आज तक इसे सिर्फ भारतीय परंपरा समझते थे.
यह चर्चा इस बात को भी दिखाती है कि इतिहास और सामाजिक प्रभाव हमारे रोजमर्रा के व्यवहार को कितनी गहराई से प्रभावित करते हैं. कई बार हम जिन आदतों को सामान्य मान लेते हैं, उनके पीछे लंबा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सफर छिपा होता है.
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