कोविड-2019 यानी सामाजिक समरसता

लगातार आ रही दूरस्थ खबरे कब अपने आस पड़ोंस में आकर हाहाकार सा मचा देगी, जबकि इसके लिए कोई मचान तो बना ही नहीं

लगातार आ रही दूरस्थ खबरे कब अपने आस पड़ोंस में आकर हाहाकार सा मचा देगी, जबकि इसके लिए कोई मचान तो बना ही नहीं. खैर आ गई है तो सत्कार में कमी क्यूं, दिल में दर्द को मर्ज भी खत्म, कम व्यय में ही मौके का भांप कर सत्कार कर ही देता! वैसे तो शास्त्र संमत है कि भूख धर्म-अधर्म का मर्म नहीं जाने है. हर बुराई को अच्छाई से, कष्ट को मस्ट(जीवटता) से जीत ही लेगें.

अचानक से पानी सिर के पास आही गया तो किया क्या जावे,बुजुर्ग कह गये कि अकाल पड़ें तो कई चिजे-खेजड़ी खूब हरी-गहरी हो ही जाती है, सभी दोस्तों में निर्णय सुबह षाम खाने की व्यवस्था की जावे, कारण भी शहर में बाहर के मजदूरो के साथ स्थानीय लोगों में कुछ असहाय भी है. तुरन्त पेपर वर्क कर लिया प्रषासन को यह सारी आवाजाही का ईमल कर कमदताल करी, समस्या सामग्री की आई, पर क्या कमाल है वाट्सअप टेक का टूल जो कि जरूरतमंद और सेवादार को एक आवाज में ढंूढ लावे! वास्तव में सब्जियों की इन दिनों बहार है, खूब मिले है, थोक में प्याज 10रू किलो,औसतन सब्जी घर पर डिलीवरी 20-30रू से अधिक नहीं, आटा मिल मालिक ने 19रू किलो में देना निष्चित किया, एक बार में 200 किलों का आर्डर होतो इच्छित स्थान पर सुपुर्द करेगा भी. 28मार्च,2020 शहर के दसेक स्थानों पर भोजन व्यवस्था सांयकाल से सूचारू हो गई. प्रत्येक व्यक्ति को यह प्रण लिया गया सूखा राषन की जिसे भी आवष्यक हो दिया किसी भी व्यक्ति मनाही नहीं दी जावे. 50व्यक्तियों के भोजन से शूरू यह व्यवस्था लगातार जारी है, जो कि 1500 अनुमानित खाना प्रत्येक टाइम का बन कर सुबह 11.00बजे शाम को 6.30 बजे बदस्तूर निर्विघ्न जारी है. प्रत्येक व्यक्ति अपने घर से टिफीन/बर्तन लेकर आवे उसे ही खाना दिया जा रहा है, तथा प्लास्टिक की थैली बिलकुल बंद है, या कोई वही खाना चाहे तो थाली में भोजन परोस दिया जाता है. धन की कोई कमी आई नहीं न ही दानदाताओं की! अमूमन महिलाएॅ घर से खाना लेने निकलती है तो एक घण्टे भर पहले आकर कोई सब्जी काट देती है तो कोई रोटी बेल देती है आज करीब एक माह होने जा रहा है, अभी तक कोई षिकवा-षिकायत भी नहीं, भोजनषाला-सार्वजनिक किचन में कोई दान करना चाहे, सहयोगी बन श्रम,धन,समय का स्थान बिलकुल खुला है बिना भेदभाव-केवल सामाजिक समरसता. 

मुझे खुशी इस बात कि 10से बढ कर आज करीब पाॅंच सौ ज्यादा लोग हर समय कुछ न कुछ दे रहे है तो इन्हीं मेसे निशुल्क दवा की व्यवस्था कर रहे है, डाक्टर की हैल्प दिलवा कर कुछ न कुछ परेषानी-कष्ट के समय में कुछ खुषी को जरूर बिखेर रहे है, अनथक पर सन्तोष है कि बुजुर्ग-जरूरतमद खाना घर भी पहुंच रहा है.

 बचपन में दादा-दादी कहते थे अन्धेरे में मत जाना वहाॅं चमचेड़(चमगादड़) है नाक को चबा जावेगी, आज 40साल बाद यह याद आती हैतो सही भी जान पड़ती है. मुह पर मास्क हर वक्त लगाये यह सोच रहे है कि चमगादड़ से दुरी ठीक है नहीं कभी भी नाक(संास के जरिये वायरस) पर हमला न कर दे.

jugal kishore sharma

Bikaner

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Author: UGC

Published by: Prabhat Khabar

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