US Denmark Defence Deal : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा कूटनीतिक और रक्षा समझौता पूरा होने की घोषणा की है. ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच हुई इस त्रिपक्षीय सहमति से वॉशिंगटन को रणनीतिक रूप से अहम आर्कटिक द्वीप पर अपनी सैन्य पकड़ मजबूत करने का रास्ता मिल गया है. ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर इसे "अमेरिका के लिए एक सपना सच होने जैसा" करार दिया. हालांकि, यह समझौता ट्रंप की ग्रीनलैंड को सीधे तौर पर खरीदने की पुरानी इच्छा को पूरा नहीं करता, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से अमेरिका को पूरी छूट देता है.
रूस-चीन के सैन्य बेस और निवेश पर लगा ताला
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ किया कि इस समझौते ने ग्रीनलैंड को लेकर वॉशिंगटन की दशकों पुरानी राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है. डील की सबसे अहम शर्त यह है कि गैर-नाटो देशों (खासकर रूस और चीन) को ग्रीनलैंड में किसी भी तरह का सैन्य अड्डा बनाने की इजाजत नहीं होगी. इसके अलावा, अमेरिका की मंजूरी के बिना कोई भी विरोधी देश द्वीप के रणनीतिक और संवेदनशील प्रोजेक्ट्स में पैसे का निवेश नहीं कर सकेगा.
आजादी के बाद भी लागू रहेंगे अमेरिकी अधिकार
अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस डील से अमेरिकी सेना को द्वीप पर हमेशा के लिए बेस बनाने, आवाजाही और ऊपर से उड़ान भरने (ओवरफ्लाइट) के कानूनी अधिकार मिल गए हैं. सबसे बड़ा बिंदु यह है कि अगर भविष्य में ग्रीनलैंड डेनमार्क से अलग होकर पूरी तरह आजाद देश भी बनता है, तब भी सुरक्षा से जुड़े ये अमेरिकी अधिकार जस के तस लागू रहेंगे.
रणनीतिक महत्व और स्थानीय स्तर पर नजर
उत्तर-पश्चिम ग्रीनलैंड में अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस (पुराना थुले एयर बेस) पहले से ही एक्टिव है, लेकिन नए समझौते के बाद अमेरिका यहां अपनी सैन्य मौजूदगी का दायरा और बढ़ाने की तैयारी में है. डेनमार्क के प्रधानमंत्री कार्यालय ने माना है कि इससे नॉर्थ अटलांटिक इलाके में सुरक्षा मजबूत होगी. दूसरी ओर, ग्रीनलैंड के स्थानीय लोगों में अपनी स्वायत्तता और अमेरिकी दखल को लेकर पुरानी चिंताएं रही हैं, इसलिए इस समझौते की बारीकियों पर द्वीप के भीतर कड़ी नजर रखी जा रही है.
ये भी पढ़ें: Nithari Case : पहले दोषी, सजा और फिर बरी… फंदे से लटका मिला सुरेंद्र कोली, लगे थे 13 मासूमों की हत्या के आरोप
