PM Modi @ 76: मोदी की विदेश नीति में धर्म, दर्शन और कूटनीति का संगम- Dr. Maheep

नरेंद्र मोदी के दौर में भारत की विदेश नीति में योग, वसुधैव कुटुम्बकम्, कर्मयोग और सभ्यतागत विरासत जैसे विचारों को नई वैश्विक भाषा मिली. क्या यह सिर्फ सांस्कृतिक पहचान है या भारत की बढ़ती कूटनीतिक शक्ति का हिस्सा?

23 मई 2023 को ऑस्ट्रेलिया के सिडनी स्थित क्यूडॉस बैंक एरिना में हजारों प्रवासी भारतीयों की मौजूदगी में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने नरेंद्र मोदी का परिचय कराते हुए उन्हें “द बॉस” कहा था.

यह सिर्फ एक मंचीय संबोधन नहीं था. इस एक वाक्य में मोदी की वैश्विक राजनीतिक दृश्यता, भारतीय प्रवासी समुदाय की बढ़ती भूमिका और भारत की बदलती कूटनीतिक छवि- तीनों की झलक दिखाई दी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 17 सितंबर के जन्मदिन पर भारत की विदेश नीति को यदि केवल रणनीतिक साझेदारियों, रक्षा समझौतों या व्यापारिक रिश्तों से समझा जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाती है.

मोदी युग की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू भारत की सभ्यतागत शक्ति (Civilizational Power) को वैश्विक कूटनीति से जोड़ना भी रहा है.

वसुधैव कुटुम्बकम् से G20 तक

भारत की विदेश नीति में प्राचीन भारतीय विचारों का प्रयोग नया नहीं है. लेकिन मोदी सरकार के दौरान इन विचारों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक स्पष्ट राजनीतिक और कूटनीतिक भाषा मिली.

2023 में भारत की G20 अध्यक्षता का आधिकारिक थीम था—

'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' (One Earth, One Family, One Future).

प्रवासी भारतीयों के साथ पीएम मोदी

इसका वैचारिक संबंध 'वसुधैव कुटुम्बकम्' से जोड़ा गया, जिसका सामान्य अर्थ है- पूरा विश्व एक परिवार है.

यहां भारतीय सभ्यतागत विचार केवल सांस्कृतिक परिचय नहीं रह जाता. इसे वैश्विक दक्षिण, विकास, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और बहुपक्षीय सहयोग जैसे समकालीन मुद्दों से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है.

G20 के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाए जाने का निर्णय भी भारत की अध्यक्षता की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल रहा.

लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी दार्शनिक विचार को विदेश नीति की वास्तविक शक्ति में बदला जा सकता है?

यही मोदी युग की कूटनीति को समझने का महत्वपूर्ण प्रश्न है.

योग से लेकर आयुर्वेद तक, संस्कृति बनी कूटनीति का माध्यम

21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकार किया जाना भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण है.

योग को भारत ने केवल एक पारंपरिक अभ्यास के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े विषय के रूप में प्रस्तुत किया.

(PTI Photo)

इसके साथ आयुर्वेद, मिलेट और भारतीय पारंपरिक ज्ञान से जुड़े अभियानों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में भूमिका निभाई.

यहां सॉफ्ट पावर की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है.

किसी देश की शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या तकनीक में नहीं होती. उसकी संस्कृति, विचार, जीवन-पद्धति और वैश्विक आकर्षण भी दूसरे देशों के समाजों और संस्थाओं पर प्रभाव डाल सकते हैं.

मोदी युग में भारत ने इसी सांस्कृतिक आकर्षण को विदेश नीति की व्यापक कहानी से जोड़ने की कोशिश की है.

काशी, अयोध्या और बौद्ध विरासत: पवित्र भूगोल की कूटनीति

भारत की सभ्यतागत कूटनीति का दूसरा पहलू उसका पवित्र भूगोल (Sacred Geography) है.

वाराणसी, अयोध्या, बोधगया, सारनाथ और नालंदा जैसे स्थान भारत की धार्मिक और ऐतिहासिक स्मृति के महत्वपूर्ण केंद्र हैं.

विशेषकर बौद्ध विरासत भारत को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों के साथ साझा सांस्कृतिक संबंधों की जमीन देती है.

भारत की विदेश नीति में बौद्ध कूटनीति के माध्यम से नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों के साथ ऐतिहासिक-सांस्कृतिक जुड़ाव को रेखांकित किया जाता रहा है.

इस दृष्टि से पर्यटन, तीर्थयात्रा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी कूटनीति के उपकरण बन जाते हैं.

मोदी की व्यक्तिगत छवि भी बनी कूटनीतिक पूंजी

मोदी की विदेश नीति की एक खास विशेषता उनका व्यक्तिगत राजनीतिक ब्रांड भी है.

विदेशी मंचों पर भारतीय परंपराओं से जुड़े परिधान, योग, ध्यान, मंदिर यात्राएं और भारतीय दार्शनिक विचारों का सार्वजनिक उल्लेख उनकी व्यक्तिगत छवि को भारत की सभ्यतागत पहचान से जोड़ता है.

इसके साथ सोशल मीडिया ने इस छवि को वैश्विक स्तर पर तेजी से प्रसारित किया.

अब किसी प्रधानमंत्री का विदेशी दौरा केवल राजनयिक बैठकों तक सीमित नहीं रहता. भाषण, प्रवासी भारतीय कार्यक्रम, तस्वीरें, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट मिलकर एक समानांतर डिजिटल कूटनीतिक मंच तैयार करते हैं.

यही वजह है कि मोदी की विदेश नीति को समझते समय डिजिटल डिप्लोमेसी और पर्सनल ब्रांडिंग को अलग करके देखना मुश्किल है.

आध्यात्मिकता के साथ सेमीकंडक्टर और AI भी

हालांकि भारत की सभ्यतागत शक्ति का अर्थ केवल संस्कृति या धर्म नहीं है.

मोदी युग की विदेश नीति में एक साथ दो स्तर दिखाई देते हैं.

एक ओर—

  • योग और आयुर्वेद
  • वसुधैव कुटुम्बकम्
  • बौद्ध विरासत
  • भारतीय संस्कृति
  • प्रवासी भारतीय

दूसरी ओर—

  • सेमीकंडक्टर
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
  • क्रिटिकल मिनरल्स
  • रक्षा तकनीक
  • हरित ऊर्जा
  • समुद्री सुरक्षा

यही संयोजन महत्वपूर्ण है.

भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को आर्थिक और तकनीकी क्षमता से जोड़ने की कोशिश कर रहा है.

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन से लेकर इंडियाएआई और सेमीकंडक्टर सहयोग तक, विदेश नीति में सॉफ्ट पावर और हार्ड पावर के बीच एक नया संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है.

‘कर्मयोग’ और भारत का मानवीय राजनय

भारत की विदेश नीति का एक और पहलू मानवीय सहायता और संकट के समय भारतीय नागरिकों की निकासी अभियानों में दिखाई देता है.

कोविड-19 के दौरान वैक्सीन मैत्री, यूक्रेन युद्ध के दौरान ऑपरेशन गंगा और सूडान संकट के दौरान ऑपरेशन कावेरी इसके प्रमुख उदाहरण हैं.

ऐसे अभियानों में भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा के साथ दूसरे देशों के लिए मानवीय सहायता की भूमिका भी निभाता है.

इसे भारतीय दार्शनिक परंपरा के कर्मयोग के लेंस से देखा जा सकता है—अर्थात कर्तव्य और कर्म पर जोर.

हालांकि विदेश नीति के विश्लेषण में यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि मानवीय सहायता से किसी देश की प्रतिष्ठा और रणनीतिक प्रभाव बढ़ सकता है. इसलिए इसे पूरी तरह निःस्वार्थ गतिविधि मानना भी विश्लेषण को अधूरा कर देगा.

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रूस-यूक्रेन युद्ध और ‘युद्ध का युग’

मोदी सरकार की विदेश नीति की सबसे कठिन परीक्षाओं में रूस-यूक्रेन युद्ध भी रहा है.

भारत ने रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध भी जारी रखे.

प्रधानमंत्री मोदी का यह युद्ध का युग नहीं है वाला संदेश वैश्विक स्तर पर व्यापक रूप से उद्धृत हुआ.

एक ही कार में पीएम मोदी और पुतिन, फोटो एक्स
भारत ने बातचीत और कूटनीति को समाधान का माध्यम बताते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी.

सितंबर 2023 में नई दिल्ली G20 घोषणा पर सहमति बनना भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसमें रूस और पश्चिम के बीच मतभेदों के बावजूद साझा भाषा तैयार की गई.

लेकिन भारत की इस नीति की व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जाती है.

कुछ विश्लेषक इसे रणनीतिक स्वायत्तता और संवाद-आधारित कूटनीति के रूप में देखते हैं, जबकि दूसरे इसे भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप व्यावहारिक संतुलन मानते हैं.

पश्चिम एशिया में संतुलन की परीक्षा

इजराइल के साथ भारत के बढ़ते रणनीतिक संबंधों के साथ पश्चिम एशिया की जटिल परिस्थितियों ने भी भारतीय कूटनीति की परीक्षा ली है.

भारत ने इजराइल के साथ अपने संबंधों को बनाए रखते हुए फिलिस्तीनी मुद्दे पर अपने पारंपरिक समर्थन को भी जारी रखा है.

यहां भारत की विदेश नीति का केंद्रीय प्रश्न यही है कि अलग-अलग और कभी-कभी परस्पर विरोधी हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.

यही रणनीतिक स्वायत्तता मोदी युग की विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता के रूप में सामने आती है.

‘विश्वगुरु’ की अवधारणा और उसकी चुनौती

मोदी युग की विदेश नीति के साथ “विश्वगुरु” शब्द भी सार्वजनिक विमर्श में काफी प्रचलित हुआ है.

लेकिन विश्वगुरु की स्थिति केवल स्वयं घोषित करने से हासिल नहीं होती.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश का प्रभाव दूसरे देशों की स्वीकृति, आर्थिक क्षमता, तकनीकी शक्ति, सैन्य क्षमता, संस्थागत प्रभाव और संकट के समय नेतृत्व—इन सभी से मिलकर बनता है.
भारत की सभ्यतागत विरासत निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण संसाधन है.

लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं.

दृश्यता हमेशा प्रभाव नहीं होती.

G20 की सफलता और वैश्विक दक्षिण में भारत की सक्रियता महत्वपूर्ण है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता अभी भी हासिल नहीं हुई है.

इसी तरह तकनीकी और आपूर्ति शृंखलाओं में बाहरी निर्भरता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की सीमाओं को भी सामने लाती है.

सभ्यतागत शक्ति की असली परीक्षा क्या है?

मोदी युग की विदेश नीति को केवल “सॉफ्ट पावर” या केवल “हार्ड पावर” के फ्रेम में देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा.

भारत की कोशिश एक व्यापक संयोजन बनाने की दिखाई देती है—

सभ्यतागत पहचान + सांस्कृतिक आकर्षण + प्रवासी शक्ति + डिजिटल कूटनीति + मानवीय सहायता + आर्थिक क्षमता + तकनीकी शक्ति + रणनीतिक स्वायत्तता।

यही वह मिश्रण है जिसने पिछले एक दशक में भारत की वैश्विक कूटनीतिक दृश्यता को नई दिशा दी है.

धर्म और दर्शन यहां विदेश नीति के औपचारिक सिद्धांत नहीं हैं, लेकिन वे भारत की वैश्विक पहचान और कूटनीतिक भाषा को आकार देने वाले महत्वपूर्ण संसाधन जरूर बन चुके हैं.

लेखक के विषय में

डॉ. महीप भारत की विदेश नीति के विश्लेषक हैं. वे अंतरराष्ट्रीय संबंधों और समकालीन विश्व-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों पर नियमित रूप से लेखन करते हैं. भारत की वैश्विक भूमिका, रणनीतिक स्वायत्तता और बढ़ती कूटनीतिक अभिकर्तृता उनके अध्ययन के प्रमुख क्षेत्र हैं.

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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, Geopolitical Analyst, UPSC Educator और 33 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं (जैसे Pratiyogita Darpan) में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. Winning Bengal: Inside West Bengal’s Electoral War of 2026 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  4. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  5. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  6. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  7. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  8. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  9. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  10. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  11. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  12. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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