Pakistan Floods Case Against German Companies: पाकिस्तान के सिंध प्रांत के दादू जिले के बैद शरीफ गांव में रहने वाले किसान इनायतुल्लाह लग्हारी आज भी 2022 की भयानक बाढ़ को भूल नहीं पाए हैं. स्कूल की दीवार पर बना पानी का निशान उन्हें हर दिन याद दिलाता है कि उस समय पानी कितना ऊपर तक भर गया था. यह सिर्फ एक निशान नहीं, बल्कि एक ऐसी आपदा की कहानी है जिसने लाखों लोगों की जिंदगी बदल दी. अब पाकिस्तान के किसानों ने जर्मनी की कंपनी के खिलाफ केस दायर कर दिया है. आखिर क्या है मामला?
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबकि, साल 2022 में आई बाढ़ पाकिस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक थी. इस बाढ़ में करीब 3 करोड़ लोग बेघर हो गए, 1700 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और लाखों एकड़ खेती की जमीन पानी में डूब गई. एक मिलियन से ज्यादा घर या तो पूरी तरह टूट गए या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए. कुल नुकसान का अनुमान लगभग 40 अरब डॉलर लगाया गया. यह तब हुआ जब पाकिस्तान दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में 1% से भी कम योगदान देता है.
बचाव के बावजूद फसल बर्बाद हो गई
इस आपदा के पीछे जलवायु परिवर्तन को बड़ी वजह माना गया. उस समय की जलवायु मंत्री शैरी रहमान ने इसे ‘जलवायु से जुड़ी मानवीय त्रासदी’ बताया था, जबकि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इसे ‘मॉनसून का खतरनाक रूप’ कहा था. इनायतुल्लाह लग्हारी जैसे किसानों की हालत बहुत खराब हो गई. उन्होंने अपनी बची हुई फसल को बचाने के लिए एक सूखी जगह पर रखकर एक महीने तक वहीं सोकर उसकी रक्षा की, लेकिन बाद में वह भी खराब हो गई. सरकारी मदद बहुत कम मिली और ज्यादातर लोगों को खुद या गैर-सरकारी संस्थाओं के सहारे ही जीना पड़ा.
कंपनियों का क्या दोष है?
अब लग्हारी उन 39 किसानों में शामिल हैं, जिन्होंने जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार मानी जा रही दो जर्मन कंपनियों रिइनिश-वेस्टफैलिसचेस एलेक्ट्रिजिटैट्सवेर्क (RWE) और हाइडेल्बर्ग मटेरियल्स (Heidelberg Materials) के खिलाफ जर्मनी की अदालत में केस दायर किया है. इन किसानों का कहना है कि इन कंपनियों के कार्बन उत्सर्जन ने जलवायु परिवर्तन को बढ़ाया, जिससे ऐसी भयानक बाढ़ आई. उन्होंने इनसे 1 मिलियन यूरो यानी लगभग 10 करोड़ 83 लाख से ज्यादा का मुआवजा मांगा है.
क्या करती हैं दोनों कंपनियां
RWE यूरोप की बड़ी बिजली कंपनियों में से एक है, जबकि हाइडेल्बर्ग मटेरियल्स दुनिया की बड़ी निर्माण सामग्री बनाने वाली कंपनियों में शामिल है. हाइडेल्बर्ग मटेरियल्स सीमेंट, एग्रीगेट (बजरी, रेत, चट्टान), रेडी-मिक्स कंक्रीट, डामर और टिकाऊ, कम-कार्बन वाले निर्माण समाधान प्रदान करने वाले उत्पादों का उत्पादन और वितरण करती है. ‘कार्बन मेजर्स’ नाम के एक संगठन के अनुसार, ये कंपनियां उन 178 बड़ी कंपनियों में शामिल हैं, जो दुनिया के 70% कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं.
किसानों का यह केस जर्मनी के हाइडेलबर्ग शहर की अदालत में दायर किया गया है और अभी इसकी समीक्षा चल रही है. यूरोपियन सेंटर फॉर कॉन्स्टिट्यूशनल एंड ह्यूमन राइट्स (ECCHR) की वकील मिरियम सागे-माब के अनुसार, भले ही इन कंपनियों का पाकिस्तान में कोई सीधा काम नहीं है, लेकिन उनके उत्सर्जन का असर हजारों किलोमीटर दूर भी महसूस होता है.
पाकिस्तान का दावा- न्याय और जागरूकता, जर्मन कंपनी बोली यह तरीका गलत
इस केस में किसानों को पाकिस्तान की नेशनल ट्रेड यूनियन फेडरेशन मदद कर रही है. इसके महासचिव नासिर मंसूर का कहना है कि यह पाकिस्तान का पहला अंतरराष्ट्रीय जलवायु मुकदमा है और इसका मकसद सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि न्याय और जागरूकता भी है. हालांकि, कंपनियां इन आरोपों को मानने को तैयार नहीं हैं. RWE का कहना है कि ऐसे केस जर्मनी के उद्योगों को नुकसान पहुंचाते हैं और यह गलत तरीका है जलवायु नीति तय करने का.
पहले भी दर्ज हो चुके हैं ऐसे मामले
यह मामला 2015 में पेरू के एक किसान द्वारा RWE के खिलाफ दायर केस से प्रेरित है. हालांकि वह केस 2025 में खारिज हो गया था, लेकिन अदालत ने यह माना कि सिद्धांत रूप में कंपनियों को जलवायु नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.
पाकिस्तान में पहले भी विदेशी कंपनियों के खिलाफ केस हुआ है. 2012 में कराची की एक फैक्ट्री में आग लगने से 250 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. इसके बाद जर्मनी की कंपनी KiK के खिलाफ केस किया गया. भले ही केस खारिज हुआ, लेकिन कंपनी को मुआवजा देना पड़ा और इससे कॉर्पोरेट जिम्मेदारी पर बहस शुरू हुई. KiK टेक्सटाइल डिस्काउंट स्टोर है.
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पाकिस्तानी किसानों की उम्मीद
किसानों के लिए यह केस उम्मीद की एक किरण है. उनका मानना है कि अगर उन्हें मुआवजा मिला, तो इससे पूरे गांवों को फायदा होगा. लोग अपने घर फिर से बना सकेंगे और खेती सुधार सकेंगे. लेकिन अगर केस हार भी गए, तो भी वे चाहते हैं कि इससे दुनिया में जागरूकता बढ़े और कंपनियां अपने प्रदूषण को कम करें. लग्हारी का कहना है कि वे सिर्फ कोशिश कर सकते हैं. जीत या हार भविष्य पर निर्भर है, लेकिन उनकी जिंदगी अब भी उनकी जमीन से जुड़ी है. वही जमीन, जो कभी उनकी ताकत थी और आज उनकी सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.
