Israel Dragged US into Iran War: अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के ऊपर हमला करके युद्ध छेड़ दिया. इस युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में तेल और गैस संकट पैदा हो गया है. आखिर यह युद्ध छिड़ा क्यों, जब इससे एक दिन पहले ओमान की मध्यस्ता में ईरान और अमेरिका के बीच न्यूक्लियर हथियारों को लेकर सहमति चर्चा चल रही थी. ओमान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने आरोप लगाया है कि इजरायल ने अमेरिका को ईरान के खिलाफ युद्ध में उतरने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने इस संघर्ष को ‘गंभीर भूल’ और ‘एक तबाही’ बताया है.
द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, अलबुसैदी ने द इकोनॉमिस्ट में लिखे अपने लेख में कहा कि अमेरिका ने अपनी विदेश नीति पर नियंत्रण खो दिया. उनके मुताबिक इजरायल ने अमेरिका को इस संघर्ष में खींच लिया गया, जबकि ईरान के साथ परमाणु समझौते की संभावना बनी हुई थी. उन्होंने बताया कि फरवरी में जिनेवा में हुई परमाणु वार्ता के दौरान ईरान और अमेरिका किसी समझौते के काफी करीब थे. उन्होंने लिखा, ‘यह झटका जरूर था, लेकिन हैरानी की बात नहीं थी.’
अलबुसैदी के अनुसार, ईरान ने प्रतिबंधों में राहत के बदले यूरेनियम संवर्धन पर सीमाएं लगाने जैसी रियायतें देने की पेशकश की थी. आगे की बातचीत भी प्रस्तावित थी, शांति की उम्मीद ‘वास्तव में संभव’ लग रही थी, लेकिन इसके तुरंत बाद सैन्य कार्रवाई शुरू हो गई.
अमेरिका की ओर से हुई बातचीत में डोनाल्ड ट्रंप के खास दूत स्टीव विटकॉफ, और उनके दामाद जेरेड कुशनर शामिल थे. सूत्रों के अनुसार, ईरान ने समझौते के तहत कई अहम रियायतें देने की सहमति जताई थी. इनमें यूरेनियम संवर्धन को कम करना या कुछ समय के लिए रोकना भी शामिल था.
इसके बदले ईरान चाहता था कि उस पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं, उसकी जमी हुई संपत्तियां वापस की जाएं. ईरान ने वादा किया था कि भविष्य के नागरिक परमाणु कार्यक्रम में अमेरिका को शामिल होने का मौका दिया जाएगा. बातचीत का अंतिम चरण अगले हफ्ते वियना में होना था, लेकिन वार्ता खत्म होने के करीब 48 घंटे के भीतर ही अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी.
इजरायल पर आरोप
ओमान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने आरोप लगाया कि इजरायल के नेतृत्व ने ट्रंप को यह कहकर युद्ध में शामिल होने के लिए मनाया कि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान बिना शर्त आत्मसमर्पण करने को तैयार है, जो उनके मुताबिक एक गलत दावा था. उन्होंने कहा कि अमेरिका की सबसे बड़ी गलती यह रही कि उसने खुद को इस युद्ध में उलझने दिया. उन्होंने यह भी कहा कि यह ‘अमेरिका का युद्ध नहीं’ है और ऐसा कोई स्पष्ट परिणाम नजर नहीं आता, जिसमें अमेरिका और इजरायल दोनों अपने लक्ष्य हासिल कर सकें.
युद्ध को बताया खाड़ी देशों की ‘तबाही’
अलबुसैदी ने आगे कहा कि इस युद्ध का सबसे ज्यादा असर खाड़ी देशों पर पड़ा है, क्योंकि ईरान की जवाबी कार्रवाई का बोझ उन्हें उठाना पड़ रहा है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दोनों पक्ष फिलहाल बातचीत के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं.
उनका मानना है कि इजरायल को अपने घोषित लक्ष्य हासिल करने के लिए लंबा सैन्य अभियान चलाना पड़ेगा, जिसमें अमेरिका को जमीनी स्तर पर भी शामिल होना पड़ सकता है. इससे एक और लंबा युद्ध शुरू हो सकता है, जबकि ट्रंप पहले ऐसे युद्धों को खत्म करने का वादा कर चुके थे.
अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन
इस संघर्ष के बीच ओमान का रुख अन्य खाड़ी देशों से अलग नजर आ रहा है. ओमान अब खुलकर अमेरिका की आलोचना कर रहा है, जबकि आमतौर पर अमेरिका को इस क्षेत्र में सबसे अहम सहयोगी माना जाता है.
पिछले हफ्ते पत्रकारों से बातचीत में अलबुसैदी ने कहा कि अमेरिका और इजरायल के सैन्य हमले ‘गैरकानूनी’ हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून को नुकसान पहुंचा सकते हैं. उनके अनुसार, अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमले गैरकानूनी हैं. जब तक ये हमले जारी रहेंगे, तब तक इसमें शामिल देश अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते रहेंगे.
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इजरायल ने किया खंडन
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इन आरोपों को खारिज किया. उन्होंने कहा, ‘क्या कोई सच में सोचता है कि कोई राष्ट्रपति ट्रंप को बता सकता है कि उन्हें क्या करना है?’
कूटनीतिक समाधान की अपील
ओमान उन खाड़ी देशों में शामिल है, जो इस संकट का कूटनीतिक समाधान चाहते हैं. क्षेत्र के अन्य देशों ने भी चेतावनी दी है कि यह युद्ध ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा को अस्थिर कर सकता है. लेकिन अब इस संघर्ष को लेकर अलग-अलग देशों के नजरिए में गहरे मतभेद सामने आ रहे हैं, जबकि युद्ध अभी भी जारी है.
