संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता में जलवायु बचाने का मसौदा पूरा होने की तरफ

लीबुर्जे (फ्रांस): भारत और अमेरिका जलवायु समझौते के लिए ‘‘सकारात्मक दिशा’ में काम कर रहे हैं जो दोनों देशों के लिए सहज हो . यह जानकारी अमेरिका के एक शीर्ष अधिकारी ने दी. 195 देशों के वार्ताकार एक ऐसा खाका तैयार करने में जुटे हुए हैं जो दुनिया के सबसे जटिल समझौते का आधार होगा. […]

लीबुर्जे (फ्रांस): भारत और अमेरिका जलवायु समझौते के लिए ‘‘सकारात्मक दिशा’ में काम कर रहे हैं जो दोनों देशों के लिए सहज हो . यह जानकारी अमेरिका के एक शीर्ष अधिकारी ने दी. 195 देशों के वार्ताकार एक ऐसा खाका तैयार करने में जुटे हुए हैं जो दुनिया के सबसे जटिल समझौते का आधार होगा. जलवायु वार्ता के छठे दिन वार्ताकार विश्वस्त दिखे कि अगले सप्ताहांत से पहले किसी समझौते पर पहुंचा जा सकेगा और वे 2009 के कोपनहेगन शिखर सम्मेलन की विफलता को दोहराने नहीं देंगे.

बहरहाल जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका के विशेष दूत टोड स्टर्न ने कहा, ‘‘भारत और अमेरिका की साथ मिलकर काम करने का पुराना इतिहास रहा है. वह सही दिशा में चल रहा है.’ स्टर्न ने कहा कि पिछले एक हफ्ते में भारतीय समकक्षों के साथ उनकी चार से पांच बैठकें हुईं और दोनों देश ‘‘पेशेवर और सकारात्मक तरीके से’ काम कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि हम दोनों एक-दूसरे को समझते हैं. यहां समाधान पाने का काम चल रहा है जो प्रभावी हो और दोनों पक्ष सहज महसूस करें. वार्ता से पहले पेरिस में विदेश मंत्री जॉन केरी के बयान के परिप्रेक्ष्य में उनका बयान आया है. केरी ने कहा था कि भारत एक ‘‘चुनौती’ होगा.
पेरिस वार्ता के लिए कमजोर समझौता सबसे बडा खतरा है क्योंकि शिखर सम्मेलन अब अंतिम हफ्ते में प्रवेश कर रहा है. पूरी दुनिया के नेता सोमवार को पेरिस में इकट्ठा होंगे जो, खाका को बाध्यकारी समझौते में तब्दील करने का प्रयास करेंगे जो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन और वैश्विक तापमान पर लगाम लगा सके. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि गर्म होने पर यह धरती रहने लायक नहीं बचेगी, समुद्र का स्तर बढेगा और मौसम का रुख चरम पर होने से वर्तमान समय के यह बिल्कुल विपरीत होगा.
लेकिन जलवायु परिवर्तन को धीमा करने के लिए स्वच्छ उर्जा अपनाना होगा और कोयला, तेल और गैस का इस्तेमाल उर्जा के लिए नहीं करना होगा. भारत अपनी उर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए 2020 तक दुनिया का सबसे बडा कोयला आयातक देश बन सकता है. इस बैठक से पहले भारत की राष्ट्रीय जलवायु योजना से पता चलता है कि आगे कोयला की महत्वपूर्ण भूमिका होने वाली है.
भारत को जहां कोयला के इस्तेमाल के लिए निशाना बनाया जा रहा है वहीं नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट ने कहा कि केवल कोयला और भारत पर ध्यान केंद्रित करना ‘‘अनावश्यक ध्यान हटाना’ है और सम्मेलन में ‘‘कटुता’ पैदा करना है.सीएसई के उपनिदेशक चंद्रभूषण ने अमेरिका और अन्य विकसित राष्ट्रों पर प्रहार करते हुए कहा कि कोयला का इस्तेमाल हो रहा है और इसका इस्तेमाल विकसित और विकासशील देशों में होता रहेगा.भूषण ने कहा कि अमेरिका में कोयला का इस्तेमाल 1990 में जो था उससे 2014 में इस्तेमाल बढा है. उन्होंने कहा कि अमेरिका के लोग जैविक ईंधन का इस्तेमाल पहले की तुलना में ज्यादा कर रहे हैं.

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