खतरनाक इबोला से बचाव के लिए इन दवाओं से है उम्मीद

-मुकुंद हरि- 40 साल पहले साल 1976 में अफ्रीका में पहली बार इबोला संक्रमण का पता चलने के बाद से अब तक दुनिया यही मानती आयी है कि इबोला वायरस के संक्रमण का कोई इलाज नहीं है. अब तक इबोला से बचने का कोई टीका या वैक्सीन भी हमारे पास मौजूद नहीं था. इसी वजह […]

-मुकुंद हरि-

40 साल पहले साल 1976 में अफ्रीका में पहली बार इबोला संक्रमण का पता चलने के बाद से अब तक दुनिया यही मानती आयी है कि इबोला वायरस के संक्रमण का कोई इलाज नहीं है. अब तक इबोला से बचने का कोई टीका या वैक्सीन भी हमारे पास मौजूद नहीं था. इसी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला वायरस को बेकाबू करार दे दिया है.

लेकिन ना-उम्मीदी के इस दौर में इलाज की उम्मीद अब उन दवा बनाने वाली कंपनियों से मिली है जो पिछले कई बरसों से इबोला के इलाज़ पर काम करती रही हैं और अब ऐसा लगता है जल्द ही उन दवाओं का इंसानी प्रयोग संभव हो पायेगा क्योंकि खतरनाक ढंग से बढ़ते इबोला को देखकर अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अगले हफ्ते उन दवाइयों के इंसानी उपयोग किये जाने के मुद्दे पर सार्थक बहस का वादा किया है जिन्हें अभी तक एक बार भी इंसानों पर टेस्ट नहीं किया गया है. यानी इलाज़ की संभावनाओं पर अब पहल होनी शुरू हो चुकी है.इबोला के इलाज की जानकारी से पहले इबोला से जुड़े नीचे दिये कुछ जानकारी भरे तथ्यों पर भी नज़र डाल लीजिये.

इंसानों के अलावा जानवर भी फैलाते हैं इबोला

इंसानों के अलावा जानवरों के जरिए भी इबोला का संक्रमण होता है. चमगादड़ों को इबोला की सबसे बड़ी वजहों में से एक माना गया है. इसलिए, किसी भी अनजान और बाहरी जानवर से बचिए और मरे हुए जानवरों के शरीर के पास जाने की कोशिश न करें. बेहतर है ऐसी किसी स्थिति में स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं की मदद लें.

संक्रमित व्यक्ति के खून के अलावा पसीने से भी फैलता है इबोला

इसका संक्रमण, केवल संक्रमित व्यक्ति के खून से या उस व्यक्ति को छूने से ही नहीं फैलता है बल्कि संक्रमित मरीज के पसीने से भी यह वायरस फैल सकता है और तो और मरीज की मौत के बाद भी वायरस सक्रिय रहता है. सबसे अहम बात ये है कि फ्लू के इन्फेक्शन की तरह यह सांस के जरिए नहीं फैलता बल्कि इसका संक्रमण तभी होता है जब कोई व्यक्ति मरीज या मरीज के मृत शरीर से सीधे संपर्क में आता है.

इसी कारण, अस्पतालों में इसके फैलने की सबसे बड़ी वजह ये होती है कि मरीज की मौत के बाद जब उसके रिश्तेदार वहां पहुंचते हैं तो अंतिम संस्कार से पहले संक्रमित व्यक्ति के शव को छूने लगते हैं. संक्रमण के लिए इतना काफी होता है.

यही वजह है कि अफ्रीका के जिन देशों में इबोला फैला हुआ है, वहां की सरकारें लोगों को अंतिम संस्कार के लिए शव नहीं दे रही हैं.

इबोला से बचाव के लिए क्या है उम्मीद की किरण

इबोला के इलाज के लिए फिलहाल दुनिया की नजर उन टीकों और इंजेक्शन पर होगी जो कई बरस की मेहनत के बाद कुछ कंपनियों ने तैयार किये हैं. कुछ ने तो बंदरों पर उसके सफल प्रयोग भी पूरे कर लिए हैं. बाज़ार में उतारने से पहले उन्हें सिर्फ इसे इंसानों पर प्रयोग की अनुमति का इंतजार है और इबोला के बढ़ते कहर की वजह से ऐसा लगता है कि अमेरिका और विश्व स्वास्थ्य संगठन जल्द ही उन्हें इसकी इजाजत दे देंगे क्योंकि इन दवाओं के अब तक के परिणाम आशाजनक रहे हैं.

कौन-कौन सी दवाएं करेंगी इबोला का इलाज

इलाज के लिए दवा बनाने वाली कंपनी के तौर पर सबसे पहला नाम आता है एक बहुराष्ट्रीय कंपनी मैप बायोफार्मास्यूटिकल का जिसने तकरीबन एक दशक पहले ही इबोला के टीके पर काम शुरू कर दिया था. इसकी बनायी ये अनूठी दवा दवा मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का मिक्स है.

इसमें ऐसे प्रोटीन हैं जो सीधे इबोला वायरस पर असर करते हैं और सबसे रोचक बात ये है कि इबोला के विषाणुओं से लड़ने के लिए इन प्रोटीन्स को बायोइंजीनियरिंग से बनाये गये तंबाकू के पौधे से निकाला जाता है. इस कंपनी ने बड़ी मेहनत के बाद बायोइंजीनियरिंग तकनीक की मदद से तंबाकू के ऐसे पौधे तैयार किये हैं जिनसे ये खास तरह का प्रोटीन निकाला जा सकता है.

इसी कड़ी में मैप बायोफार्मास्यूटिकलने पिछले साल इस वैक्सीन का इबोला से संक्रमित बंदरों पर परीक्षण पूरा कर लिया है और उससे मिले उत्साहजनक परिणामों के मुताबिक इस दवा को देने के 104 से 120 घंटे के अंदर 45 फीसदी बंदर इबोला की बीमारी से ठीक हो गए.

इसी तरह टेकमिरा नाम की कंपनी भी इबोला की दवा पर काम कर रही है. इसका इंजेक्शन आरएनए इंटरफेरेंस नाम की जेनेटिक तकनीक पर आधारित है. इसमें इंजेक्शन के माध्यम से दवा मरीज के अन्दर जाकर वायरस के डीएनए पर हमला करती है बीमारी से बचाने में मदद करती है.

इसके अलावा एक और कंपनी प्रोफेक्टस बायोसाइंसेस ने भी इबोला की वैक्सीन का बंदरों पर टेस्ट किया जिसका नतीजा काफी अच्छा आया है.

अब तक जब भी इबोला का कहर पैदा हुआ है, हर बार कुछ तय सावधानियां और तौर-तरीके अपना कर इबोला को महमारी बनने से रोकने में सफलता पायी जा चुकी है. साल 2012 में भी युगांडा में अस्पताल के आसपास असुरक्षित आवाजाही रोक कर और दूसरी सावधानियों के जरिये इबोला संक्रमण को रोका गया था लेकिन ये पहली बार है जब लाइलाज समझी जाने वाली इस बीमारी के इलाज को लेकर आशा की सार्थक किरण के रूप में कई तरह की दवाओं का नाम सामने आया है. उम्मीद है अब इबोला का डर जल्द ही दूर होगा.

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