-मुकुंद हरि-
विश्व व्यापार संगठन में भारत के वीटो पावर इस्तेमाल करने के साथ ही डब्ल्यूटीओ की वर्तमान बैठक बेनतीजा खत्म हो गयी.
पूरे बहुमत के साथ बनी मोदी सरकार ने अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी की भारत यात्रा के दौरान न सिर्फ केरी के माध्यम से अमेरिका और विकसित देशों को, भारत और अन्य विकासशील देशों के गरीब किसानों के हित की बात को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर दी बल्कि केरी के भारत प्रवास के दौरान ही डब्ल्यूटीओ में लाये गये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार को बढ़ावा देने वाले व्यापार सरलीकरण समझौते (टीएफए) के खिलाफ अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कर ये साबित कर दिया की भारत की ये सरकार विकसित देशों के दबाव में अपने हितों के साथ कोई अनावश्यक समझौता नहीं करेगी.भारत के इस कदम से अमेरिका और अन्य विकसित देश निराश हो गये हैं और उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया है.
क्या है भारत का रुख
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को अमेरिका को साफ-साफ कहा था कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार को बढ़ावा देने वाले इस ‘व्यापार सरलीकरण समझौतेह्ण (टीएफए) के खिलाफ नहीं है लेकिन उनकी सरकार की पहली जिम्मेदारी देश के गरीब लोगों के प्रति बनती है. प्रधानमंत्री मोदी की इसी सोच के साथ भारत ने डब्ल्यूटीओ में अपनी बात रखी और कहा कि भारत की यही सोच है कि भारत की ओर से इस व्यापार सरलीकरण समझौते पर तब तक दस्तखत नहीं किये जायेंगे जब तक खाद्य सब्सिडी का स्थायी हल नहीं ढूंढ लिया जाता है.
ये है तकरार की असल वजह
दरअसल, तकरार का मुद्दा ये है कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया समेत यूरोप के तमाम विकसित देश ये चाहते हैं कि खाद्य सामग्री पर भारत और अन्य विकासशील देश अपने देश के गरीब लोगों और किसानों को सब्सिडी देना बंद कर दें वरना ऐसा न होने की स्थिति में उन पर जुर्माना लगाया जाये जबकि भारत, दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों का ये कहना है कि ये नियम उनके देश के गरीबों के हितों के विरुद्ध तो हैं ही साथ ही विकसित देश इस मुद्दे पर दोहरी नीति अपना रहे हैं.
मसलन, एक तरफ अमेरिका खुद अपने देश में जहां खाद्य सब्सिडी के रूप में 120 अरब डॉलर देता है वहीं भारत जैसा बड़ी आबादी वाला देश अपने लोगों को सिर्फ12 अरब डॉलर की खाद्य सब्सिडी देता है. फिर भी विकसित देश इसे गलत ठहरा रहे हैं जो सही नहीं है.
डब्ल्यूटीओ के मौजूदा नियमों के तहत खाद्य सब्सिडी कुल खाद्यान्न उत्पादन के मूल्य का 10 प्रतिशत तक तय है, लेकिन इसकी गणना मौजूदा मूल्य के बजाय दो दशक पुराने मूल्य पर की जाती है यानी अब तक ये होता आ रहा था कि कोई भी जरूरतमंद देश दूसरे देश से सस्ता अनाज खरीदकर अपने देश की खाद्य जरूरतों की पूर्ति कर सकता था और अपने देश में इस अनाज पर सब्सिडी भी दे सकता था. लेकिन हाल के वर्षों में वैश्विक रूप से महंगाई ने खाद्य सामग्रियों के दाम बढ़ाये हैं लेकिन महंगाई के बावजूद पुरानी कीमतों को ही मानक बनाकर रखा गया है. इसलिए, भारत खाद्य सब्सिडी का आधार वर्ष (1986) बदलने की मांग कर रहा है.
इसके अलावा डब्ल्यूटीओ की पिछली बैठक में टीएफए लागू करने की समय सीमा 31 जुलाई 2014 तय की गयी थी और भारत जैसे देशों को खाद्य सुरक्षा के लिए दी गई छूट को चार साल तक की मोहलत दी गई थी.
इसको लेकर भारत का कहना है कि देश की गरीब जनता और किसानों के हितों के साथ इस समय सीमा के लिए समझौता नहीं किया जा सकता क्योंकि वर्तमान हालात में ऐसा करने से देश का खाद्य सुरक्षा कानून खतरे में पड़ जायेगा जिसकी वजह से सरकार गरीबों को सटे दर पर अनाज मुहैया नहीं कर पायेगी.
क्या है ‘व्यापार सरलीकरण समझौता (टीएफए)
पिछले साल दिसंबर में बाली, इंडोनेशिया में हुए पिछले सम्मलेन में यह बात भी कही गयी थी कि निर्यात को लेकर अलग-अलग देशों के जो अपने नियम बने हुए हैं उनमें एकरूपता नहीं है. जो माल किसी एक देश के नियमों के हिसाब से निर्यात के लिए सही होता है, वही माल दूसरे देश के नियमों के हिसाब से उपयुक्त नहीं होता जिसकी वजह से निर्यातक देश को परेशानी होती है. अमेरिका और अन्य विकसित देशों ने अपने यहां आयात किये जानेवाले माल के लिए कड़े नियम बना रखे हैं जिसकी वजह से विकासशील देशों को परेशानी होती है.
इसके अलावा, खाद्य सामग्रियों की दुलाई के लिए सभी देशों को यातायात के लिए सड़क और अन्य माध्यमों के ढांचे विकसित करने की बात कही गयी थी ताकि बंदरगाहों तक माल जल्दी और आसानी से पहुंच सके. इससे समान की लागत कम होगी और पूरी दुनिया में एक विकसित पैमाना तय हो जायेगा. इसके अतिरक्ति खाद्य सामग्रियों को लेकर लिए जाने वाले सीमा शुल्क में बदलाव का मुद्दा भी इसमें शामिल है.
डब्ल्यूटीओ की अगली बैठक सितंबर में होने वाली है और भारत को भरोसा है कि तब तक इस समस्या से निबटने के बेहतर तरीके ढूंढ लिये जायेंगे.महंगाई और भुखमरी की मार झेल रहे 125 करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश में विकसित और औद्योगिक देशों की दादागीरी के दबाव में आकर ऐसे किसी भी समझौते पर दस्तखत न करने की ताकत दिखाना कोई आसान काम नहीं है.
प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को ये बेहतर पता है कि ऐसा करने से ये देश उनके खिलाफ भड़क सकते हैं और डब्ल्यूटीओ के मार्फत भारत पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाने की कोशिश भी कर सकते हैं.
लेकिन इसके बावजूद मोदी के नेत्तृत्व में भारत ने अमेरिका और अन्य अमीर देशों के खिलाफ वीटो का इस्तेमाल करके ये दिखा दिया है कि देश के हालात अब बदल चुके हैं और उनके नेतृत्व में बनी भारत की ये नयी और मजबूत सरकार किसी के दबाव में काम नहीं कर सकती और ना ही अपने देश और जनता के हितों के विरुद्ध किसी और देश की धमकी या दादागीरी से डरने वाली है. आशा है कि भविष्य में भी मोदी अपने इसी रुख पर कायम रहेंगे ताकि भारत की छवि एक मजबूत देश के रूप में सामने आ सके.
