#WorldRadioDay: मैं आकाशवाणी हूं .....

पवन कुमार पाण्‍डेपोस्ट ऑफिस और रेल नेटवर्क के आगमन के बाद आम भारतीयों के जीवन में रेडियो का प्रवेश किसी परिकथा से कम नहीं है. करीब एक सदी तक लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका यह यंत्र, आज बदले हुए स्वरूप में सबके सामने है. गांव के चौपाल से निकलकर गाड़ी की स्टीयरिंग के […]

पवन कुमार पाण्‍डे

पोस्ट ऑफिस और रेल नेटवर्क के आगमन के बाद आम भारतीयों के जीवन में रेडियो का प्रवेश किसी परिकथा से कम नहीं है. करीब एक सदी तक लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका यह यंत्र, आज बदले हुए स्वरूप में सबके सामने है. गांव के चौपाल से निकलकर गाड़ी की स्टीयरिंग के में बगल में मौजूद यह यंत्र बदलाव का प्रतीक है. इन सब के बावजूद यह लोगों की स्मृतियों में जिंदा है. अलमीरा में बंद रेडियो सिर्फ एक अदद यंत्र न होकर, अपनी पीढ़ियों के साथ गुजाारे क्त की याद समेटे हुए है. उस जमाने में जिंदगी इतनी व्यस्त नहीं थी. समाचार, मनोरंजन और क्रिकेट कमेंट्री का जरिया रेडियो ही हुआ करता था.

अखबारों की पहुंच शहरों तक थी. टीवी आ चुका था, लेकिन वह अभी भी आम आदमी के पहुंच से बाहर की चीज थी. भारत में रेडियो की शुरुआत 1923 में हुई. 23 जुलाई 1927 को तय हुआ कि देश में दो रेडियो क्लब ऑपरेट होंगे – बम्बई और कलकत्ता. 1932 को इंडियन ब्रॉडकॉस्टिंग लिमिटेड (IBC) का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो कर दिया गया है. हिंदी में यह अकाशवाणी के नाम से मशहूर हुआ.
रेडियो ने देश को एकसूत्र में बांधने का किया काम
रेडियो मूलत एक समाचार स्त्रोत के रूप में विकसित हुआ. आगे चलकर मनोरंजन के साधन के रूप में भी इसका उपयोग होने लगा. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन की सरकार ने बीबीसी हिंदी सेवा की शुरुआत की. सरकारी सेवा से अलग इस हिंदी सेवा के निष्पक्षता और शैली ने लोगों को प्रभावित किया. वहीं मनोरंजक कार्यक्रम और गानों के लिए लोग विविध भारती सुना करते थे. रेडियो के साथ कई खासियत जुड़ी हुई थी. इसे सुनते हुए दूसरा काम किया जा सकता है. सबसे सस्ता और एक जगह से दूसरे जगह तक आसानी से इसे ले जाने के विशेष गुणों की वजह से यह अत्यंत लोकप्रिय हुआ. भारत के प्रधानमंत्री युद्ध व कई असामान्य परिस्थितियों में अपनी बात पहुंचाने के लिए रेडियो को ही चुनते थे. स्वतंत्रता दिवस, क्रिकेट की लाइव कमेंट्री, एशियन गेम्स, चुनावी नतीजे और मौसम समाचार के लिए लोग रेडियो पर निर्भरता थी.
एफएम और इंटरनेट का दौर
अब बदलते वक्त में रेडियो एफएम और इंटरनेट रेडियो के रूप में बदल चुका है. ऐसे वक्त में अनूठे प्रयोगों की वजह से रेडियो आज जिंदा है. नीलेश मिसरा की ‘यादों का इडियट बॉक्स’ ने अपार लोकप्रियता हासिल की. अन्नू कपूर के ‘सुहाना सफऱ’ को भी श्रोताओं ने पसंद किया. लोगों की अच्छे प्रोग्राम सुनने की भूख आज भी है. रेडियो का विस्तार हुआ. शहर केंद्रित एफएम स्टेशन खुलने लगे हैं. रेडियो की व्यापकता और लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंटरनेट आने के बाद भी प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ के लिए रेडियो को चुना.

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