भारत में पहली बार मिजिल्स के केस में 43 प्रतिशत की भारी गिरावट देखने को मिली है. हाल में जारी हुए डब्ल्यूएचओ के रिपोर्ट के मुताबिक 2015 और 16 के बीच मिजिल्स के मामलों में यह कमी दर्ज की गयी है और आगे भी इसी दर से गिरावट बनी रहेगी.
भारत में पोलियो के खिलाफ लगातार चलायी गयी मुहिम के बाद पोलियो के पूरी तरह खत्म हो जाने से उत्साहित स्वास्थ्य विभाग ने अब 2020 तक मिजिल्स को भी भारत से पूरी तरह खत्म करने का बीड़ा उठाया है. इस दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाते हुए इस साल 40 करोड़ बच्चों को मिजिल्स का टीका (MMR) लगाने का लक्ष्य रखा गया है. इसके बेहतर नतीजे सामने भी आ रहे हैं. 2015 में जहां भारत में इसके 30,168 मामले देखे गये, वहीं यह आंकड़ा 2016 में घटकर 17,250 हो गया.
प्रमुख कारण और लक्षण : मिजिल्स को आम बोलचाल की भाषा में खसरा कहते हैं, जो पैरामिक्सो वायरस के कारण होनेवाली बीमारी है. कुछ देशों में इसका एक वैकल्पिक नाम रुबेओला है, जिसे रुबेला (जर्मन खसरा) भी कहते हैं. ज्यादातर मामले मौसम बदलने के दौरान सर्दियों और गर्मियों की शुरुआत में देखे जाते हैं. यह संक्रामक रोग है, जो खांसने, छींकने और शारीरिक संपर्क से फैलता है. यह ज्यादातर 3 से 5 वर्ष के बच्चों में देखने को मिलता है.
संक्रमण के 2-4 दिनों के अंदर इसके लक्षण दिखने लगते हैं. इसमें अचानक 101 डिग्री से ज्यादा बुखार, नाक-आंख से पानी आना, उल्टी, दस्त, आवाज भारी होना जैसे लक्षण दिखते हैं. बुखार आने के 4-5 दिन बाद सबसे पहले मुंह के अंदर और फिर शरीर पर छोटे-छोटे लाल दाने निकलने लगते हैं. असर 14 दिनों तक बना रहता है. इस बीमारी में रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से कम होती जाती है तथा मौत भी हो सकती है. जिसे टीका न लगा हो, उसे ज्यादा खतरा रहता है.
भारत की क्या स्थिति
भारत में भी मिजिल्स से हर साल काफी बच्चों की मौत हो जाती है. फिलहाल दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में से अकेले भारत में मिजिल्स के सबसे ज्यादा मामले देखने को मिलते हैं. 2016 में संपूर्ण विश्व मे इससे 1,34,200 मौत हुई, जिसमें से 54500 मामले दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से और 49,200 अकेले भारत से थे.
जो पूरे विश्व में रूबेला और मिजिल्स से होने वाली मौत के कुल मामलों का 36% है. इससे सबक लेकर भारत ने इस दिशा में सकारात्मक प्रयास करते हुए 2016 में अपने टीकाकरण के दायरे को 88% तक बढ़ाया है. इससे अन्य देशों के मुकाबले यहां इस बीमारी के मामलो में तेजी से कमी आ रही है. इस संकेत से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि 2020 तक इस रोग के खात्मे का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे.
